ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Monday, April 30, 2012

वे ठिठके पल...


देर तक  मुट्ठी  में बंद, उस 
चिपचिपी चॉकलेट का स्वाद 
गेट से लौटती  नज़र
घड़ी की टिकटिक और 
कदमों तले चरमराते 
सूखे पत्तों की आवाज़

वो बेख्याली में आ जाना 
परेशान करती, 
सूरज की किरणों के बीच 
और मेरे चेहरे से उछल कर 
तुम्हारे काँधे पर जा बैठना  
खरगोश के छौने सा 
उस  धूप के टुकड़े का 
जरा सी तेज आवाज 
और हडबडा कर,  उड़ जाना 
उस पतली डाल से 
झूलती बुलबुल का

नामालूम सा 
अटका....पीला पत्ता 
निकाल  देना बालों से
अनजाने ही,ले लेना
भारी बैग...हाथों से 

ठिठका पड़ा है वहीँ, वैसा ही  सब

अंजुरी में उठा, 
ले आऊं उन लमहों   को 
पास  रखूँ
बतियाऊं उनसे, दुलराऊ उन्हें 
पर वे उँगलियों  से फिसल 
पसर  जाते हैं, फिर से
उन्हीं लाइब्रेरी  की सीढियों पर

नहीं आना उन्हें, 
इस सांस लेने को 
ठौर तलाशती 
सुबह-ओ-शाम में 
नहीं,बनना हिस्सा 
कल के सच का
झूठे  आज में 

सिर्फ 
आती है,खिड़की से, हवा की लहर
लाती है 
अपने साथ
हमारी हंसी की खनक 
नल से झरझर बहते पानी में 
गूंज जाता  है,
अपनी बहस का स्वर  
गैस की नीली लपट से 
झाँक जाती है, 
आँखों की शरारती चमक
 
सब कुछ तो है,साथ 
वो हंसी..वो बहस...वो शरारतें
फिर क्या रह गया वहाँ..
अनकहा,अनजाना,अनछुआ सा 
किस इंतज़ार में....


रश्मि  रविजा 
मुंबई , महाराष्ट्र 

आत्मकथ्य:
"पढने का शौक तो बचपन से ही था। कॉलेज तक का सफ़र तय करते करते लिखने का शौक भी हो गया. 'धर्मयुग',' साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'मनोरमा ' वगैरह में रचनाएँ छपने भी लगीं .पर जल्द ही घर गृहस्थी में उलझ गयी और लिखना,पेंटिंग करना सब 'स्वान्तः सुखाय' ही रह गया . जिम्मेवारियों से थोडी राहत मिली तो फिर से लेखन की दुनिया में लौटने की ख्वाहिश जगी.मुंबई आकाशवाणी से कहानियां और वार्ताएं प्रसारित होती हैं..यही कहूँगी "मंजिल मिले ना मिले , ये ग़म नहीं मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है" 

Saturday, April 28, 2012

मेरे कन्धे पर....

 
मेरे कन्धे पर
श्मसान के रास्ते झूल रहे है
और सभी लाशेँ
कोल्हू के बैल सा
उन रास्तोँ मेँ घुमते चले जा रहे है

पूर्वजोँ की आहेँ
जिनसे टकराकर इतिहास
अर्थी बन गये हैँ
और खाली पेट मेँ वे
एक द्वीप मेँ तब्दील हो गये हैँ
फिरभी खामोशी के चित्कार मेँ
मेरे वे बोझ
इतिहास के पन्नोँ को
कब से छोड़ चुके हैँ

तपिश के ऊँचे टीले पर खड़ी
आज की पीढ़ी
अपनी जमीन को छोड़
इतिहास को जलाएँगे
और सेकेगेँ हाथ
उन बोझो से त्रस्त होकर
जिसे पूर्वजोँ के कन्धोँ ने
यहाँ तक ढोकर ला दिया है

शक्ति व धर्म की बातेँ
यदि हम छोड़ देँ
उन कुटियोँ की छांह
तब भी संवेदनाओँ के इस
इक्कसवीँ पीढी मेँ
क्या हम झांक पाएगेँ
अपने ही कालरोँ मेँ
कि गन्दगी की पर्तेँ
आखिर रसोई तक
कैसे चली आयी

मेरे कन्धे गवाह हैँ
उन भूली स्मृतियोँ के
उन भूले श्रमोँ के
उन भूले समर्पणोँ के
जहाँ से रास्ते
श्मसान के बीच से
जरुर निकलती है
पर मिटाने की लौ को
दूर से भी छुआ नहीँ है ।

* मोतीलाल/राउरकेला

Friday, April 27, 2012

बुद्ध .........कौन ? ........एक दृष्टिकोण


बुद्ध .........कौन ?  सिर्फ एक व्यक्तित्व या उससे भी इतर कुछ और ?

एक प्रश्न जिसके ना जाने कितने उत्तर सबने दिए. यूँ तो सिद्धार्थ नाम जग ने भी दिया और जिसे उन्होंने सार्थक भी किया । सिद्ध कर दे जो अपने होने के अर्थ को बस वो ही तो है सिद्धार्थ। और स्वयं को सिद्ध करना और वो भी अपने ही आईने में सबसे मुश्किल कार्य होता है मगर मुश्किल डगर पर चलने वाले ही मंजिलों को पाते हैं और उन्होंने वो ही किया मगर इन दोनों रूपों में एकरूपता होते हुए भी भिन्नता समा ही गयी जब सिद्धार्थ खुद को सिद्ध करने को अर्धरात्रि में बिना किसी को कुछ कहे एक खोज पर चल दिए  अपनी खोज को पूर्णविराम भी दिया मगर क्या सिर्फ इतने में ही जीवन उनका सार्थक हुआ ये प्रश्न लाजिमी है . यूँ तो दुनिया को एक मार्ग दिया और स्वयं को भी पा लिया मगर उसके लिए किसी आग को मिटटी के हवाले किया , किसी की बलि देकर खुद को पूर्ण किया जिससे ना उनका अस्तित्व कभी पूर्ण हुआ। हाँ पूर्ण होकर भी कहीं ना कहीं एक अपूर्णता तो रही जो ना ज़माने को दिखी मगर बुद्ध बने तो जान गए उस अपूर्णता को भी और नतमस्तक हुए उसके आगे क्यूँकि बिना उस बेनामी अस्तित्व के उनका अस्तित्व नाम नहीं पाता , बिना उसके त्याग के वो स्वयं को सिद्ध ना कर पाते। इस पूर्णता में , इस बुद्धत्व में कहीं ना कहीं एक ऐसे बीज का अस्तित्व है जो कभी पका ही नहीं , जिसमे अंकुर फूटा ही नहीं मगर फिर भी उसमे फल फूल लग ही गए सिर्फ और सिर्फ अपने कर्त्तव्य पथ पर चलने के कारण , अपने धर्म का पालन करने के कारण ........नाम अमर हो गया उसका भी । हाँ .......उसी का जिसे अर्धांगिनी कहा जाता है। आधा अंग जब मिला पूर्ण से तब हुआ संपूर्ण वो ही थी वास्तव में उनके पूर्णत्व की पहचान। एक दृष्टिकोण ये भी है इस पूर्णता का , इस बुद्धत्व का जिसे हमेशा अनदेखा किया गया 




पूर्णत्व की पहचान हो तुम





यधोधरा
तुम सोचोगी
क्यो नही तुम्हे
बता कर गया
क्यो नही तुम्हे
अपने निर्णय से
अवगत कराया
शायद तुम ना
मुझे रोकतीं तब
अश्रुओं की दुहाई भी
ना देतीं तब
जानता हूँ
बहुत सहनशीलता है तुममे
मगर शायद
मुझमे ही
वो साहस ना था
शायद मै ही
कहीं कमजोर पडा था
शायद मै ही तुम्हारे
दृढ निश्चय के आगे
टिक नही पाता
तुम्हारी आँखो मे
देख नही पाता
वो सच
कि देखो
स्त्री हूँ
सहधर्मिणी हूँ
मगर पथबाधा नही
और उस दम्भ से
आलोकित तुम्हारी मुखाकृति
मेरा पथ प्रशस्त तो करती
मगर कहीं दिल मे वो
शूल सी चुभती रहती
क्योंकि
अगर मै तुम्हारी जगह होता
तो शायद ऐसा ना कर पाता
यशोधरा
तुम्हे मै जाने से रोक लेता
मगर तुम्हारा सा साहस ना कहीं पाता
धन्य हो तुम देवी
जो तुमने ऐसे अप्रतिम
साहस का परिचय दिया
और मुझमे बुद्धत्व जगा दिया
मेरी जीवत्व से बुद्धत्व तक की राह में
तुम्हारा बलिदान अतुलनीय है
गर तुम मुझे खोजते पीछे आ गयीं होतीं
तो यूँ ना जन कल्याण होता
ना ही धर्म उत्थान होता
हे देवी !मेरे बुद्धत्व की राह का
तुम वो लौह स्तम्भ हो
जिस पर जीवों का कल्याण हुआ
और मुझसे पहले पूर्णत्व तो तुमने पा लिया
क्योंकि बुद्ध होने से पहले पूर्ण होना जरूरी होता है
और तुम्हारे बुद्धत्व में पूर्णत्व को पाता सच
या पूर्णत्व में समाहित तेजोमय ओजस्वी बुद्धत्व
तुम्हारी मुखाकृति पर झलकता
सौम्य शांत तेजपूर्ण ओज ही तुम्हारी
वो पहचान है जिसे गर मैं
तुम्हारी जगह होता
तो कभी ना पा सकता था
हाँ यशोधरा ! नमन है तुम्हें देवी
धैर्य और संयम की बेमिसाल मिसाल हो तुम
स्त्री पुरुष के फर्क की पहचान हो तुम
वास्तव में तो मेरे बुद्धत्व का ओजपूर्ण गौरव हो तुम
नारी शक्ति का प्रतिमान हो तुम
बुद्ध की असली पहचान हो तुम ........सिर्फ तुम



वन्दना गुप्ता 

Thursday, April 26, 2012

तुम न होगी तो....


आज सुबह अचानक किताबों के पन्ने पलटते हुए  मेरी निगाह अपने एक ऐसे मित्र की रचनाओं पर पडी, जिसे पढ़ते हुए मैं खो गया पुरानी स्मृतियों में । मेरे ये बुजुर्ग मित्र नवगीत के स्थापित हस्ताक्षर हैं । नाम है हृदयेश्वर  सीतामढ़ी में साथ-साथ रहते हुए 1991 से 1994 तक मुझे इनके सान्निध्य का सुख प्राप्त हुआ। फिर एक दिन अचानक इनका स्थानान्तरण हाजीपुर हो गया और उसके कुछ महीनों बाद मैं भी वाराणसी आ गया । फिर उनसे मुलाक़ात नहीं हुयी   ‘आँगन के ईच-बीच’, ‘बस्ते में भूगोल’ व ‘धाह देती धूप’ (गीत संग्रह) तथा ‘मुंडेर पर सूरज’ (काव्य संग्रह) इनकी प्रकाशित कृतियाँ है  बिहार सरकार के प्रतिष्ठित राजभाषा सम्मान से ये सम्मानित भी हो चुके हैं  आज मैं उनका एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मुझे बहुत पसंद है : रवीन्द्र प्रभात 
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तुम न होगी तो....


मैं सुबह के चाँद का एहसास लेकर क्या करूंगा 
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा   


हो तरल कुछ तो 
जिसे मन-प्राण-कंठों में उतारें 
धुप की संवेदना 
जल की मछलियों को दुलारे 


यह नहीं तो उस तरफ संन्यास लेकर क्या करूंगा  
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा   


एक गोकुल प्राण में हो
एक गोकुल प्राण ऊपर 
मन कहीं पर रह गया हो
पोर भर का स्पर्श होकर 


दिक् तुम्हारा, मैं उधर कम्पास लेकर क्या करूंगा 
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा   


जो न लिखना तो 
कहे क्या ख़ाक गूंगी व्यंजनाएँ
सात रंगों में ढली 
उनचास पवनों की व्यथाएँ


गर बेमौसम तो वहां बसंताभास्  लेकर क्या करूंगा 
तुम न होगी तो वहां आकाश लेकर क्या करूंगा   






हृदयेश्वर 
‘गीतायन‘, प्रेमनगर, रामभद्र (रामचौरा), हाजीपुर-844101, वैशाली 

Wednesday, April 25, 2012

अपंग


आज फिर सुबह 
चाय के साथ 
अखबार  पढ़ रही थी ,
उफ्फ्फ फिर वही खबर 
एक औरत की अस्मत लुटी गयी.....
फिर उसके पुरे एहसास को 
कुचल दिया गया ,
चंद लोग अपनी वेह्शत 
को अंजाम देने के लिए 
न जाने कितनी बहनों
के साथ यह घिनोनी 
हरकत करते है ......
पढ़ कर मन आक्रोश से भर गया 
इतना गुस्सा आया की 
पता नहीं क्या कर दू ,
पर फिर लगा यह सब बेकार ,
पढ़ा दुःख हुआ 
गुस्सा भी आया ,
पर कुछ दिनों मे
सब भूल जाएंगे ,
फिर ज़िन्दगी वैसे हि चलने लगेगी ,
आज खुद को पहली बार 
अपंग महसूस कर रही थी.....

  
  रेवा 

Tuesday, April 24, 2012

बेबाक मंज़र याद करते हैं.


ग़ज़ल

मुझे मुस्कान के, बेबाक मंज़र याद करते हैं.
मुसाफिर बेवतन हूँ, सैकड़ों घर याद करते हैं.

जिन्हें आँगन बहुत प्यारे, उन्हीं के भाग्य में राहें,
जिन्हें राहों से निस्बत है, उन्हें दर याद करते हैं.

तुम्हारी सिम्त से आकर, जिन्होंने जिस्म ये चूमा
अभी तक सिसकियाँ लेकर, वो पत्थर याद करते हैं.

नदी हो तुम, तुम्हारे सामने, औकात क्या मेरी,
मैं कतरा हूँ मगर मुझको समंदर याद करते हैं.

अभी तक हिचकियाँ सी आ रहीं हैं लाश को मेरी,
सुना है, मारने के बाद, खंजर याद करते हैं.

उन्हीं का आसमां, जिनमें, कलेजा है परिंदों का,
वो रह जाते हैं जो टूटे हुए पर याद करते हैं.


सुनोगे तुम ज़माने बाद भी, सबसे यही यारों,
"तरुण" की शायरी के, लोग, तेवर याद करते हैं.




तरुण प्रकाश http://7tarunprakash.blogspot.in

Monday, April 23, 2012

करेंसी नोट पर मुद्रित बापू ...


व्यंग्य 

चलो अच्छा हुआ बापू की कुछ अंतिम निशानियाँ भी बिक गईं। हमारे मुल्क के लिए तो वैसे भी ये चीजें उनके विचारों की तरह बेकार ही थीं। इन फालतू चीज़ों के बिक जाने पर जो लोग हो हल्ला मचा रहे हैं वे वास्तव में हमारी उदात्त आर्थिक सोच से चिढ़ते हैं। अब यदि बाज़ार में महात्मा गाँधी के सिद्धांतों और विचारों की कोई मांग नहीं है तो इसमें सरकार क्या कर सकती है। वो उनके उस आउटडेटिड ऐनक और चरखे का क्या करती, जिसे लंदन में नीलाम किया गया। वैसे भी वह सरकार, जिसकी इज्जत की आये दिन तमाम अरबों रुपए के महाघोटालों के चलते सरेआम बोली लगती हो, वो ऐसे दो कौड़ी के पचड़े में भला क्यों पड़े। आखिर सरकार का भी एक स्तर होता है। हमारे यहाँ की आम जनता के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह या तो भविष्य के सपनों में खोयी रहती है या अतीत की धरोहर को लेकर रोती -बिसुरती रहती है। वह वर्तमान की धरती पर कभी कभार ही लौटती है और जब आती है तो उसके पास सरकार का गरियाने का एकमात्र शगल होता है।

 वास्तव में समस्या सरकार की करनी में नहीं वरन जनता की उस भावुक सोच में है जो कभी शिवाजी की तलवार के विदेश में बिकने से व्यथित हो जाती है तो कभी महाराणा प्रताप के भाले पर जंग लग जाने को लेकर आन्दोलित हो जाती है। जनता की समझ में ये बात क्यों नहीं आता है कि अत्याधुनिक हथियारों और प्राविधि से लैस इस समय में ये तलवार, भाला, चश्मा और चरखा किस काम का है और जो चीज़ बेकार है वह बिके, उस पर जंग लगे या फिर कूड़ेदान में सडती रहे उससे फर्क ही क्या पड़ता है। हमारी पुरातन को लेकर अतिशय भावुकता ही है जो हमारी तरक्की के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। भावुकता से भय का संचार होता है। हम इस सोच से आगे क्यों नहीं निकलते। इसके आगे वैसी ही जीत है जैसी एक विशिष्ट ब्रांड की कोल्ड ड्रिंक पीने से मिलती है। अब यह बात तो सबको पता है कि महात्मा गाँधी की इस देश के लिए उतनी ही उपादेयता है जितनी किसी खुदाई में मिली हडप्पाकालीन मिट्टी के किसी अलंकृत पात्र की, जो हमें रोमांचित तो करता है, पर रहता है निष्प्रयोज्य ही। बापू का इतिहास हमें गौरवान्वित करता है पर उस गौरव का केवल सांकेतिक और भावनात्मक महत्व ही है। 

करेंसी नोट पर मुद्रित बापू अच्छे लगते हैं। सरकारी कार्यालयों और पुलिस थानों में टंगी गाँधी जी की तस्वीरें वहाँ की बेरंग दीवारों की शोभा तो बढ़ाती हैं और उसके मुलाजिमों को उसके जरिये रिश्र्वत के लिए संकेत करने की सुविधा भी देती हैं। पुलिस के इस अलिखित कानून को सब जान गए हैं कि बापू की मुद्रा वाला करारा नोट दो अन्यथा उनकी लाठी अपना काम करेगी। जगह जगह लगी उनकी प्रतिमाएं सारी दुनिया को यह संदेश देने के लिए हैं कि हम इतने कृतघ्न नहीं कि राष्ट्रपिता को भुला बैठें। साल में एकबार उनके जन्म दिन पर उनकी प्रशस्ति में गाल बजाना हम कभी नहीं भूलते। उनकी पुण्यतिथि पर गाने योग्य भजन हमें कंठस्थ हैं इसलिए खूब मगन होकर गाते हैं। इससे अधिक कोई क्या कर सकता है? बापू के नश्वर शरीर को इस धरती को त्यागे अरसा हुआ। वह अब इतिहास का हिस्सा हैं। उनके विचार और उनसे जुड़ी यादें अभी भी जनमानस को बेचैन कर देती है। सरकार शशोपंज में है कि उनके विचारों को खत्म करने के लिए क्या करे। विचार और भावनाएं इतनी आसानी से कहाँ मरते हैं।

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निर्मल गुप्त 

प. बंगाल की एक सैनिक छावनी पानागढ़ में जन्म .कलकत्ता में बचपन बीता .पढाई लिखाई मेरठ में हुई .पत्र-पत्रिकाओं में कहानी ,कविता ,बाल कथा ,व्यंग्य प्रकाशित .कुछ कहानिओं और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओँ में अनुवाद .

Saturday, April 21, 2012

वार्तालाप हुई जब हिंदी से



जिस तरह राष्ट्र गान के आगे खड़े होते हैं मौन , क्ष्रद्धान्वित
वैसे ही कुछ पल इस वार्तालाप को दें ...

रश्मि प्रभा

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वार्तालाप हुई जब हिंदी से

क) जिज्ञासा :
हे काव्य! तुम्हारा गुरु है कौन?

कुछ तो बोलो, क्यों हो तुम मौन?
कहाँ से पाई सूक्ष्मतर दृष्टि यह?
अतल - वितल तेरे रहता कौन?

कैसे करती शब्द श्रृंगार तुम?
यह विरह कहाँ से लाती हो?
रहस्य रोमांच का सृजन कैसे?
पल भर में तुम कर जाती हो.

कभी लगती हो तुतलाती बच्ची,
कभी किशो री बन जाती हो,
क्षणभर में तू रूप बदलती कैसे?
कैसे कुलांच भर जाती हो?

तेरी एक झलक पा जाने को,
कुछ नयन ज्योति बढ़वाते हैं.
कुछ तो हैं इतने दीवाने,
नित नए लेंस लगवाते हैं.

नजर नहीं आती फिर भी तुम,
क्या इतनी भी सूक्ष्म रूप हो?
दिखती फिर तुम सूर को कैसे?
तुलसी घर चन्दन क्यों घिसती हो?

बैठ के कंधे पर तुम रसखान के,
कबिरा के संग खूब घूमती हो.
रास रचाए तू संग बिहारी के,
घनानंद प्यारे को क्यों छलती हो?

नीर की बादल बनी है महादेवी,
यशोधरा गुप्त है दिनकर उर्वशी,
प्रसाद है खेलत संग कामायनी,
पन्त है छेड़े चिदंबरा रागिनी.

वीणा बजाये निराला के संग तू,
मीरा को खूब तू नाच नचाये है,
कालि के मेघ को नभ में नचावत,
श्याम का चेतक धूम मचाये है.

केशव बैठ के केश निहारत,
उम्र बढ़ी पर कवि ना कहायो,
रचा ग्रन्थ को हठ्वश अपने,
कठिन काव्य के प्रेत कहायो.

ग्रन्थ लिखाए तू व्यास के हाथ से,
राधा की तन पर कान्हा नचायो है,
जाना रहस्य ना कोई तुम्हारा,
उम्र तलक तुम नाच नचाये है.

क्या तुम महेश की मानस पुत्री?
अथवा विरंचि की भार्या हो?
या हो वाग्दत्ता बाल्मीकि की,
या हिंद की लाडली आर्या हो?

क्या 'क्रौंच आह' से जन्म तेरा?
अश्रु स्वरों तेरी धार बही?
अगणित है बधिक अब घूम रहे,
क्यों ना उनके अंतर कोई आह उठी?

याद करो! तू ने ही कहा था -
"सन्देश नहीं मै स्वर्ग लोक का लाई,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई."
संकल्प तेरा क्यों टूट रहा अब?
ये कौन सी रीति तुने अपनाई है,
सोचा बहुत पर सोंच न पाया.
बात क्या तेरे ह्रदय में समायी है?

जान न पाया तुम्हे अब भी मै,
गुरूद्वारे का अब तो मार्ग बताओ.
हे काव्य तुम्हारा गुरु है कौन?
कुछ तो बोलो, क्यों हो तुम मौन?


ख) उपालंभ :

छोड़ो परिचय की बातों को,
माँ-बाप बिना कोई परिचय क्या?
मैं क्या बोलूं ? मैं क्यों बोलूं?
तेरे आगे अपना मुंह क्यों खोलूं?

भारत भूमि का नाम भूल गए,
इंडिया - इंडिया अब जपते हो.
भूल गए जब प्यारे हिंद को,
हिंदी को कब पहचानोगे?

वेलकम - वेलकम तो खूब करते हो,
वन्देमातरम्, सुस्वागतम कभी कहते हो?
मैं क्या बोलूं ? मैं क्यों बोलूं?
तेरे आगे अपना मुंह क्यों खोलूं?

जब पूछा है तो कुछ कहना है,
पड़ रहा मुझे देना परिचय.
आह! निज गृह में ही अपना परिचय
परिचित को भी देना होगा परिचय?

परिचय यह, क्या सजा से कम है?
बदल गए मेरे घर वाले, यही बड़ा गम है.
जैसे रही न सदस्या इस घर की
क्या यह देश निकाले से कम है?

सॉरी - सॉरी कह करके फिर
दिन - रात वही सब करते हो.
मैं क्या बोलूं ? मैं क्यों बोलूं?
तेरे आगे अपना मुंह क्यों खोलूं?

ग) परिचय:

मैं तो हिंद की बेटी हूँ
और नाम मेरा है हिंदी.
भाल पर इसके सुशोभित है जो
हूँ मैं वही चमकती बिंदी.

यहीं से पाया नेह और दीक्षा,
यहीं से पाई प्रथ्निक शिक्षा.
पैदा हुयी संस्कृत की गोदी
पालि के संग खेला है.

ये प्राकृत और अपभ्रंश तो
मेरा ही पुराना चोला है.
जब भारत बन गया हिंदुस्तान
नाम पड़ गया मेरा हिंदी.

जब हुयी सयानी, बड़ी हुयी
ब्रज - अवधी चोला में खड़ी हुयी.
फिर निखर जो रोप्प, वह खड़ी बोली
पद्य के संग - संग अब गद्य चली.

मैं तो हिंद की बेटी हूँ
और नाम मेरा है हिंदी.
भाल पर इसके सुशोभित है जो
हूँ मैं वही चमकती बिंदी.


डॉ.जे.पी.तिवारी 

Friday, April 20, 2012

शोषण से लेकर सशक्तीकरण तक नारी

नारी विमर्श 


पितृसत्तात्मक समाज में नारी पुरुष की गुलाम और सामाजिक प्रताड़नाओं का शिकार रही है l नारी ही एक मात्र ऐसी जाति है जो कई हजारों वर्षों से पराधीन है l नारी-विमर्श स्त्री उत्पीड़न के विभिन्न पहलुओं की दिशा को उजागर करने में एक साकारात्मक प्रयास है , जो शोषण से लेकर सशक्तीकरण तक के सफर पर प्रकाश ड़ालता है l प्राचीन काल से लेकर आज तक नारी का प्रत्येक कदम घर से लेकर बाहर तक शोषित होता रहा है l उसे कभी देवी तो कभी दासी बना दिया गया,परन्तु उसे मानवी नहीं समझा गया l समाज में व्याप्त पर्दा -प्रथा,सती-प्रथा,विधवा-विवाह निषेध,बहुपत्नी विवाह,कन्या जन्म दुर्भाग्यपूर्ण माना जाना,शिक्षा एवं स्वावलंबन के आधारों से वंचित रखना,आजीवन दूसरों के नियंत्रण में रखना आदि मान्यताओं के द्वारा नारी को शोषित किया जाता रहा हैl शोषण के अन्तर्गत उसका दैहिक शोषण,आर्थिक ,शैक्षणिक व मानसिक शोषण तक किया जाता है , जैसे  'महादेवी वर्मा ' ने नारी की आर्थिक स्थिति को उजागर करते हुए कहा है,"समाज ने स्त्री के सम्बन्ध में अर्थ का ऐसा विषम विभाजन किया है कि साधारण श्रमजीवी वर्ग से लेकर सम्पन्न वर्ग की स्त्रियों तक की स्थिति दयनीय ही कही जाने योग्य है l वह केवल उत्तराधिकार से ही वंचित नहीं है वरन् अर्थ के सम्बन्ध में सभी क्षेत्रों में एक प्रकार की विवशता के बन्धन में बंधी हुई है " आर्थिक शोषण के अन्तर्गत दहेज के लिए नारी को सताना,अशिक्षा,परनिर्भरता,घर में पुरुषों के शासन में उसकी अधीनता पारिवारिक व कार्यक्षेत्र में पीड़ित करना आदि कई ऐसे स्तर हैं जिनसे नारी का आर्थिक शोषण किया जाता है l”

                   शोषण के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए नारी अथक प्रयास भी करती है ,जिसके लिए वह उन परम्परागत रूढ़ियों व बन्धनों से मुक्ति लेने के लिए प्रयास करती है जिसमें उसे जकड़कर उसके अधिकारों का हनन किया जाता है l पुरातन नारी के मुकाबले में आज की नारी आमूलचूल परिवर्तित हो गई है l अब नारी जीवन में ऐसी लहर आ गई है कि उस पर से सामन्ती बन्धन हट गए हैं और आज वह घूँघट निकालने,घर से बाहर न निकलने,नौकरी न करने,शिक्षा न ग्रहण करने,प्रेम-विवाह न करने,अविवाहित न रहने आदि किसी भी मान्यताओं के दायरे में बाधित नहीं की जाती है l इस परिवर्तन का कारण यही है कि नारी उस पुरातन मूल्यों को नकारने एवं सामाजिक आग्रहों को तोड़ने की चेष्टा में संघर्षरत हुई है जिन्होंने उसे मानवीय क्रूरता में जकड़ा है l निश्चित रूप से इन सब रूढ़िग्रस्त बन्धनों व परम्पराओं से मुक्ति लेने के लिए वह निरन्तर संघर्ष करती है ,कहने को तो नारी को पुरुषों के समान अधिकार दिए जाते हैं ,किन्तु नारी द्वारा उन अधिकारों को सिर्फ जानना और प्रयोग करने में बहुत अंतर होता है चूंकि वह सिर्फ अधिकारों से परिचित हो पर उनका प्रयोग न कर पाएं तो ऐसे अधिकारों का उसके जीवन में क्या फायदा l

              परिणामस्वरूप चिरकाल से दबती -पिसती आ रही अधिकारों से वंचित नारी द्वारा संघर्ष तभी शुरू होता है l जब उसे पुरुष की मात्र आश्रिता मानकर उसके मन-बहलाव एवं विविध विधि सेवा प्रयोजन को पूरा करने का साधन भर माना जाता है और जहाँ उसका कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व व अस्तित्व नहीं माना जाता l आधुनिक परिस्थितियों ने नारी को बहुत सचेत बना दिया है l आज नारी दो मोर्चों पर मुख्य रूप से संघर्ष करती है l एक मोर्चा तो परम्परागत व्यवस्था में अपनी भूमिका निभाते हुए स्वाधीनता तथा अधिकारों की माँग के लिए योजनाबद्ध प्रयास करने से सम्बन्धित है जबकि दूसरे मोर्चें द्वारा उस मानसिकता को बदलना है जो उसे आज भी भोग्या मानकर उसका शोषण करता है l

            आज विश्व भर में नारी-पुरुषों के बीच कड़ी प्रतियोगिता होती है l चाहें प्राचीनकाल से ही संसार पर पुरुषों का आधिपत्य रहा है लेकिन आज नारी जाति ने करवट बदलकर अपनी कमर कस ली है और वह अपने अधिकारों के लिए गुहार भी लगाती है l मुख्य रूप से आज नारी का संघर्ष उसकी अस्मिता एवं अस्तित्व की पहचान से है जोकि पितृसत्तात्मक समाज के विरुद्ध शुरू होता है l इसलिए आधुनिक नारी संघषर्रत होकर अपने स्वतंत्र अस्तित्व व व्यक्तित्व को आकारित करने वाली शक्ति के रूप में स्थापित हुई है l सच्चाई यह है कि नारी को परवश बनाने में पितृसत्तात्मक धर्म का आदर्श एक अमोघ अस्त्र है जिसका बार-बार पारायण करवाकर पुरुष-समाज ने नारी को तन-मन से ऐसा पराधीन बनाया कि वह कभी अपने स्वतंत्र अस्तित्व को महसूस ही नहीं कर पायी चूँकि ,“ हमारा समाज हमेशा से ही पुरुष प्रधान रहा है.उसकी हर व्यवस्था पुरुष का ही समर्थन करती रही है l

                      पितृसत्तात्मक समाज स्त्री के अधिकारों पर विविध वर्जनाओं व निषेधों का पैहरा बैठाता रहा है l परम्परा जहाँ नारी को पितृसत्ता की प्रभुता में रहने को बाध्य करती है,वहाँ आधुनिक नारी की चेतना उसे पितृसत्ता के सभी बन्धनों को तोड़ ड़ालने को प्रेरित करती है चाहे पुरुष समाज ने नारी-जीवन,उसकी कार्यशैली व उसकी सत्ता को निधार्रित की चेष्टा की है लेकिन अब नारी भी पुरुष की तरह एक अलग संवर्ग है lअब उसकी भी एक अलग कोटि व सामाजिक स्थिति है l आज वह उन मिथकों को तोड़ रही है जो उसके विरुद्ध रचे गए l आज नारी अपनी मुक्ति के लिए,पुरुष के समान अधिकार प्राप्ति के लिए और स्वयं को मनुष्य (पुरुष के समान ही ) के रूप में मान्यता दिए जाने के लिए व्यापक स्तर पर संघर्ष कर रही है l इससे यही ध्वनित होता है कि नारी स्वयं को पराधीन और पुरुष सत्ता के अधीन पा रही है,उसके व्यक्तित्व को पुरुष के समान स्वाभाविक रूप से विकसित होने का अवसर नहीं दिया गया और आज वह इतनी जागृत हो चुकी है कि वह अपने को किसी भी प्रकार के बन्धन में रखने के विरुद्ध ही नहीं अपितु पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था के हर फंदे को काटने का प्रयास कर रही है l स्त्री-चेतना पितृसत्ता के द्वारा गढ़ी गई और प्रचलित की गई उन धारणाओं या मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाती है जो स्त्रियों को स्वाभाविक रूप से पुरुष से हीन सिद्ध करने के लिए गढ़ी गई है l

                        आज नारी अस्मिता एवं अस्तित्व का प्रश्न अनेक आयामी है l एक लम्बी पुरानी स्थापित व्यवस्था को तोड़कर जन-संघर्ष से जुड़ना और कदम-कदम पर यथार्थ से मुठभेड़ करना ही अस्तित्व की पहचान का तकाज़ा है l यह नारी समाज की सच्चाई रही है कि परिवार में उसकी आवाज को दबाकर उसकी आकांक्षा को कुचल दिया जाता है l उसकी आवश्यकताओं की भी उपेक्षा की जाती रही है.उसे किसी भी अवस्था में मानवोचित स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त करने की सुविधा नहीं होती है l परन्तु अब आधुनिक नारी ने अपने वर्चस्व के लिए अपना समूचा कौशल दाँव पर लगा दिया है.नारी द्वारा अस्मिता व अस्तित्व की लड़ाई पितृसत्तात्मक समाज,शोषण,परम्पराओं,मान्यताओं,अधिकारों व आर्थिक,राजनैतिक,सामाजिक एवं शैक्षणिक क्षेत्रों की भागीदारी से है l वर्तमान समाज में नारी पुरुष-वर्ग से प्रतिस्पर्धा न कर केवल उसके समकक्ष एक मनुष्य होने के नाते प्राप्त होने वाले अधिकारों की माँग करती है l

                निश्चित रुप से जब नारी पितृसत्तात्मक समाज में शोषित होकर विद्रोहात्मक स्वर को प्रस्फुटित करते हैं तो समाज को उसके सशक्त व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं l आज नारी ने जीवन की सभी परिभाषाएँ ही बदल दी हैं l चूंकि सशक्तीकरण की प्रक्रिया अधिकार प्राप्त करने ,आत्मविकास करने तथा स्वयं निर्णय लेने की है,और यह चेतना का वह मार्ग है जो बृहत्तर भूमिका निभाने की क्षमता प्रदान करता है l इसलिए नारी जीवन में निरर्थक से सार्थक बनकर परीक्षाओं व प्रतियोगिताओं में स्वयं को सशक्त सिद्ध कर रही है l आज समाज के प्रत्येक क्षेत्र में कार्यरत सशक्त नारियों का यही कहना है ,“आधा आसमान हमारा,आधी धरती हमारी,आधा इतिहास हमारा है l”आधुनिक नारी यह जान चुकी है कि पुरुष निर्मित पितृसत्तात्मक नैतिक प्रतिमान,नियम,कानून,सिद्धांत,अनुशासन स्त्री को पराधीन उपेक्षिता,अन्य बनाने के लिए ही सुनियोजित ढ़ंग से गढ़े गये हैं l 


                    आज सशक्त नारी अपने पाँवों पर खड़ी होकर स्वाभिमानी जीवन व्यतीत कर रही है l वह अपने ज्ञान से गृहव्यवस्था को भी अच्छी तरह सम्भाल रही है तथा अपने बच्चों को भी सुसंस्कृत बना रही है l इसी कारण वर्ष 2001 को  नारी सशक्तीकरण के नाम से भी घोषित किया गया है l आज सशक्त नारी वर्षा की बूँदों की तरह विकासोन्मुख होकर बसंत के फूलों की महक को चारों ओर बिखेर रही है ,और मर्यादाशील नारी अपनी वरिष्ठता,पवित्रता व अदम्य जिजीविषा के बल पर आसमान में धूमकेतु नक्षत्र की भान्ति टिमटिमा रही है l

  • ड़ॉ प्रीत अरोड़ा
लेखिका परिचय : 



जन्म २७ जनवरी १९८५ को मोहाली पंजाब में। शिक्षा- एम.ए. हिंदी पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में दोनो वर्षों में प्रथम स्थान के साथ। कार्यक्षेत्र- अध्ययन एवं स्वतंत्र लेखन व अनुवाद। अनेक प्रतियोगिताओं में सफलता, आकाशवाणी व दूरदर्शन के कार्यक्रमों तथा साहित्य उत्सवों में भागीदारी, हिंदी से पंजाबी तथा पंजाबी से हिंदी अनुवाद। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन जिनमें प्रमुख हैं- हरिगंधा, पंचशील शोध समीक्षा, अनुसन्धान, अनुभूति, गर्भनाल,हिन्दी-चेतना(कैनेडा),पुरवाई (ब्रिटेन),आलोचना, वटवृक्ष,सृजनगाथा,सुखनवर, वागर्थ,साक्षात्कार,नया ज्ञानोदय, पाखी,प्रवासी-दुनिया, आदि मे लेख,कविताएँ,लघुकथाएं,कहानियाँ, संस्मरण,साक्षात्कार शोध-पत्र आदि।वेब पर मुखरित तस्वीरें नाम से चिट्ठे का सम्पादन. E-mail-arorapreet366@gmail.com

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