ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवयित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल
परिकल्पना की नयी पहल :वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Wednesday, February 29, 2012

अनकही



कई बातें होठों तक आती हैं
फिर रास्ते बदल गले में अटक जाती है
अनकही होकर झकझोरती रहती हैं
......



रश्मि प्रभा

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अनकही

रह जाती है बहुत कुछ
अनकही
सुप्त, या फिर बेबस, बेचैन ,
शब्द बन जन्म लेते है
जज्बात
मंथन गतिमान होता
उड़कर बाहर आने को आतुर
व्याकुल
होठों तक पहुँच काँप उठते
फिर भी अनकही रह जाती ,
ख़ामोशी
एक चादर तान देती
और छिप कर रह जाते
बहुत कुछ,
एक प्रयत्न पुन:
गतिमान
शब्दों का निर्मित स्वरुप
भावों की उड़ान
सागर की लहरों सा
संघर्ष
फिर भी रह जाती
अनकही ।
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डॉ . संध्या तिवारी

Tuesday, February 28, 2012

पास अपने रौशनी काफी नहीं तो क्या हुआ ?


 ग़ज़ल

पास अपने रौशनी काफी नहीं तो क्या हुआ 
दिल जले है ,जो दीया बाती नहीं तो क्या हुआ |

पार कर लेंगे उफनते दरिया को हम तैरकर 
हौंसला तो है, अगर कश्ती नहीं तो क्या हुआ |

उस खुदा की रहमतें मिलती रहें काफी यही
साथ मेरे जो तेरी मर्जी नहीं तो क्या हुआ |

खत्म होगा एक दिन ये दौर दहशत का सुनो 
आज तक जालिम हवा बदली नहीं तो क्या हुआ |

गीत हैं आहें मेरी , गाऊं सदा मैं झूम के 
साज हैं सांसे मेरी , डफली नहीं तो क्या हुआ |

हार मानी क्यों , मिलेंगे और भी मौके कई 
विर्क जो किस्मत अभी चमकी नहीं तो क्या हुआ |

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दिलबाग विर्क 
http://sahityasurbhi.blogspot.in/ 

Monday, February 27, 2012

... पुन: तुम्हें लिखता हूँ



लिखता हूँ , लिख नहीं पाता
गुनता हूँ , कह नहीं पाता
पर चाहता तो हूँ - बहुत कुछ तुम तक पहुँचाना
मन के कैनवस पर उभरती हैं यादें
रंग भरूँ - उससे पहले
कभी मैं बारिश हो जाता हूँ , कभी शिला
यकीन करो-
हर बूंदें शब्द सी होती हैं
शिला के गर्भ में मेरी प्रस्फुटित भावनाएं होती हैं
... मैं मर नहीं सकता , जब तक लिख नहीं लेता
अब इसे अभिशाप कहो या वरदान !


रश्मि प्रभा
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... पुन: तुम्हें लिखता हूँ


जब तुम्हें लिखता हूँ, स्वेद नहीं, झरते हैं अंगुलियों से अश्रु।
सीलता है कागज और सब कुछ रह जाता है कोरा
(वैसे ही कि पुन: लिखना हो जैसे)। जब तुम्हें लिखता हूँ।
नहीं, कुछ भी स्याह नहीं, अक्षर प्रकाश तंतु होते हैं
(स्याही को रोशनाई यूँ कहते हैं)।
श्वेत पर श्वेत। बस मुझे दिखते हैं।
भीतर भीगता हूँ, त्वचा पर रोम रोम उछ्लती है ऊष्मा यूँ कि मैं सीझता हूँ।
फिर भी कच्चा रहता हूँ
(सहना फिर फिर अगन अदहन)।
जब तुम्हें लिखता हूँ।

डबडबाई आँखों तले दृश्य जी उठते हैं।
बनते हैं लैंडस्केप तमाम। तुम्हारे धुँधलके से मैं चित्रकार।
फेरता हूँ कोरेपन पर हाथ। प्रार्थनायें सँवरती हैं।
उकेर जाती हैं अक्षत आशीर्वादों के चन्द्रहार।
शीतलता उफनती है। उड़ते हैं गह्वर कपूर।
मैं सिहरता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

हाँ, काँपते हैं छ्न्द। अक्षर शब्दों से निकल छूट जाते हैं गोधूलि के बच्चों से।
गदबेर धूल उड़ती है, सन जाते हैं केश। देखता हूँ तुम्हें उतरते।
गेह नेह भरता है। रात रात चमकता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

जानता हूँ कि उच्छवासों में आह बहुत।
पहुँचती है आँच द्युलोक पार।
तुम धरा धरोहर कैसे बच सकोगी?
खिलखिलाती हैं अभिशप्त लहरियाँ। पवन करता है अट्टहास।
उड़ जाते हैं अक्षर, शब्द, वाक्य, अनुच्छेद, कवितायें। बस मैं बचता हूँ।
स्वयं से ईर्ष्या करता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

न आना, न मिलना। दूर रहना। हर बात अधूरी रहे कि जैसे तब थी और रहती है हर पन्ने के चुकने तक।
थी और है नियति यह कि हमारी बातें हम तक न पहुँचें। फिर भी कसकता हूँ।
अधूरा रहता हूँ। जब तुम्हें लिखता हूँ।

तुम्हें चाहा कि स्वयं को? जीवित हूँ। खंड खंड मरता हूँ।
साँस साँस जीवन भरता हूँ। मैं तुम्हें लिखता हूँ।





गिरिजेश राव

Sunday, February 26, 2012

दस्तक



यादों की आहटें गुम नहीं होतीं
जब भी अकेला देखती है - सांकलें खटखटाती हैं
भीड़ से खींचकर अनमना कर जाती हैं ...


रश्मि प्रभा
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दस्तक

इतने बरस बीत गए,
फिर दरवाजे पर सुधियों ने दी दस्तक है.
खिड़की से आने की,
उनके दिल में हसरत बाकी अब तक है.
महानगर की बयारी में,
मेरे आँगन की क्यारी में,
फल सब्जी तरकारी में,
अम्मा की नीली सारी में,
अपने सपने से बचपन की,
वो खुशबू,क्या जाने बाकी अब तक है.
अपनी आशा के पंख लगाना,
दूर कहीं फिर उड़ के जाना,
माँ से छुप छुप बातें करना,
रात रात रत जागे करना,
हर पल हँसना और हँसाना,
क्या सब,याद तुम्हें भी अब तक है
इतने बरस बीत गए,
फिर दरवाजे पर सुधियों ने दी दस्तक है.
हंसी ठिठोली दिन भर करना,
रातों को फिर चुप चुप रहना,
बाहर भीतर सब कुछ सहना,
आँखों से पर कुछ न कहना,
सबकी सहमती पर मुहर लगाना,
यही नियति क्या अब तक है,
हमने तो स्वीकार किया है,
नये रिश्तों ने आकार लिया है,
इन रिश्तों को हमने अपना जीवन ये उपहार दिया है,
न हमने कोई प्रतिकार किया है,
इन रिश्तों में खुशियाँ बिखराना,
अपनी सांसों में सांसें बाकी जब तक हैं,
इतना सब कुछ बीत गया है,
सुधि कलश भी अब रीत गया है.
दे हमें वही संगीत गया है,
वो पल छिन सारे साथ लिए हम,
खड़े वहीं पर अब तक हैं.
इतने बरस बीत गए,
फिर दरवाजे पर सुधियों ने दी दस्तक है.
खिड़की से आने की,
उनके दिल में हसरत बाकी अब तक है.



मेरा फोटो
रचना हूँ मैं रचनाकार हूँ मैं , सपना हूँ मैं या साकार हूँ मैं, रिश्तों में खो के रह गया संसार हूँ मैं, शून्य में लेता नव आकार हूँ मैं, अपने आप को ही खोजता इक विचार हूँ मैं, लेखनी में भाव का संचार हूँ मैं, स्वयं से ही पूंछती की कौन हूँ मैं, इसी से रहती अक्सर मौन हूँ मैं,

Saturday, February 25, 2012

मेरे ब्लॉग-पोस्ट की किस्मत खुल गई......



ये लिखा वो लिखा क्या क्या न लिखा
पर जाने क्या पसंद थी कि कोई न दिखा
तब जाना - जिन्हें समझ होगी , वे खुद आयेंगे
मेरे ब्लॉग पोस्ट के साथ उनकी किस्मत भी खुल जायेंगे



रश्मि प्रभा 
============================================================
मेरे ब्लॉग-पोस्ट की किस्मत खुल गई......

मैंने लिखा एक ब्लॉग-पोस्ट!
नेताजी की काली करतूते....
वोट मांगने के नए तरीके....
सरकारी खजाने का दुरुपयोग...
झूठे वादे...झूठी कसमों की बाढ....
दबी हंसी मे छिपी....लुच्चाई....
आंसूओं के आवरण में लिपटी...बे-शरमी...
सब शामिल था ब्लॉग-पोस्ट में....
इंतज़ार था तो बस!....एक टिप्पणी का....
टिप्पणियां जब मिल गई...मेरी किस्मत खुल गई !

मैंने लिखा एक ब्लॉग-पोस्ट....
सरकारी अफसरों के काले कारनामें...
रिश्वत-खोरी के नए रूप-रंग...
फाइलों के गुम हो जाने के बारे में...
बिना कारण तबादले होने के बारे में....
पुलिस केस के चलते...
आत्महत्या या एक्सीडैंट के बारे में...
सब कलम बद्ध कर दिया मैंने...
सोच कर कि बस!...एक टिप्पणी जरुर मिलेगी...
कुछ टिप्पणियां मिल गई....मेरी किस्मत खुल गई!

मैंने लिखा एक ब्लॉग-पोस्ट!
व्यंग्य था वेलेंटाइन डे का...
आज के युवा लड़के-लड़कियां...
पाश्चात्य संस्कृति के दीवाने....
दिखावे के प्रेम के परवाने....
उनकी ना समझी को बढ़ावा दे रहे....
उनके माता-पिता...उनके अभिभावक...
खुली आँखों से जो देखा...वही लिखा...
और प्रतिक्रियाएँ जाननी चाही मैंने...
कुछ टिप्पणियाँ मिल गई...मेरी किस्मत खुल गई!

ब्लॉग-पोस्ट की बात करे तो....
टिप्पणियाँ ज्यादा न सही....
....कम तो मिलनी ही चाहिए!
लिखना सार्थक हुआ ऐसा मेरे साथियों...
....ऐसा ब्लॉग लेखक को लगना ही चाहिए!
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डा. अरुणा कपूर

Friday, February 24, 2012

मेरा नाम



एक अदद नाम
एक पहचान खोजने की कोशिश में
कई उलझे चेहरे मिलते हैं
उकताए हुए कहते हैं -
अमां छोड़ो यार ... क्या करोगे जानकर !


रश्मि प्रभा

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मेरा नाम

कभी कभी
अन्दर से निकल कर
जब मैं
बाहर आ जाता हूँ
तो स्वयं को पहचान ही नहीं पाता हूँ
खो जाती है मेरी पहचान
वो जो
कभी तुमने
कभी औरों ने दी
मैं तो बस इसके उसके
मुंह को ताकता हूँ
और गुजारिश करता हूँ
मुझे देदो कोई नाम
जो सिर्फ मेरा अपना हो
और मैं
कभी स्कूल बस के पीछे भागता हूँ
कभी मोहल्ले की उस
कोने वाली लडकी के पीछे
और चांटे खाकर
थका हारा
किसी और के पीछे भागता हूँ
कालांतर में
आटा दाल के पीछे
और उसके बाद
भावनाओं के समुन्दर में
बच्चो की दया के पीछे
पत्नी भी घिसटती है साथ साथ
मै नाम पूछता हूँ
वो विद्रूप हंसी हंसती है
मगर मेरा नाम नहीं बताती
जानते हुए भी
मन ही मन
कई बार बुदबुदाती है
और अन्दर ही अन्दर कई बार बोलती है
खपच्चियों में कसा
एक नर कंकाल
जिसके सैकड़ों नाम है
मगर असल में कोई नहीं
नर कंकाल भी नहीं .




-कुश्वंश

Thursday, February 23, 2012

दुआ


 
दुआ 
वो हर पल खुदा से 
अपने प्यार की  सलामती की 
दुआ करता है 
हर लम्हा उसकी  ख़ुशी
 की फ़रियाद करता है 
दिन - रात उसकी  इक हँसी
 के लिए 
आंसू बहाता है 
खुदा कहता है, 
"ए बन्दे , मैंने तेरी झोली में 
तेरा प्यार दिया जो 
तूने मुझसे माँगा, 
अब मै क्या कर सकता हूँ ?
जो करना है तूँ कर 
प्यार की ताकत के आगे तो 
मै भी बेबस और लाचार हूँ 
हिम्मत है तो 
 कर हिफाजत अब अपने 
प्यार की 
निभाने का हौंसला  रख 
फूल के साथ कांटे भी चुन
अमृत के साथ विष भी पी 
फिर देख मै तेरे साथ हूँ 
My Photoउसकी ख़ुशी भी तूं गम भी तूँ 
हँसी भी तूँ आंसूं भी तूँ 
सलामती भी तूं ,
तकदीर  भी तूँ , 
वफ़ा  भी तूँ ,जफा भी तूँ  "


() अलका सैनी 

Wednesday, February 22, 2012

अपना घर, अपना शहर याद आता है



एक अपना घर
बचपन साथी खट्टे टिकोले
छोटी सी ज़िद छोटी सी ख़ुशी
थोड़ा सा रूठना
पापा माँ का मनाना ....
दूर होकर बहुत याद आते हैं
बहुत बहुत बहुत


रश्मि प्रभा
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अपना घर, अपना शहर याद आता है

मम्मी की रोटी का समोसा,
पापा का दो रुपया।
अनमने से सुबह उठना,
नाक-भौं चढ़ाना।
मम्मी का चिल्लाना, पापा का बचाना,
बहुत याद आता है, सब कुछ बहुत याद आता है।
तैयार होकर साइकिल उठाना,
मेरा नखरे दिखाना, मम्मी का मनाना,
पेटीज और फ्रूटी की रिश्वत पर एक रोटी खाना।
स्कूल से लौटकर वापस आना,
दरवाजे पर मम्मी को देखकर खुश हो जाना,
बहुत याद आता है,दौड़कर मम्मी का चाय लाना,
रात में बार-बार उठकर पापा का मेरा कमरे तक आना,
पढ़ते हुए मुङो पाकर, सिर पर हाथ फेरकर वापस लौट जाना।
वो लाड़ और वो गुस्सा सब याद आता है।
दूर जाने के बाद अपना शहर, अपना घर बहुत याद आता है।
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संध्या

Tuesday, February 21, 2012

जीवन और आत्मा



आत्मा अमर है तो हम हैं ... प्रश्न उठता है आत्मा जीवन है या शरीर जीवन है . यदि शरीर नश्वर है तो आत्मा ही जीवन है - और शरीर आधार . पत्थर के अन्दर भगवान् है , तो क्या पत्थर के टुकड़ों से भगवान् के टुकड़े हो जाते हैं ? - नहीं न . तो शरीर को जला दें , या प्रवाहित कर दें ... जीवन तो है , किसी अन्य शरीर की प्रतीक्षा में . जीवन की प्रक्रिया निरंतर है -
सोच के इस बिंदु पर मुझे लगा कि औरों की सोच से एक मुलाकात करूँ ...
चलिए आपको भी मिलाऊं - रश्मि प्रभा
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Profile Picture

वंदना गुप्ता 
vandana-zindagi.blogspot.com 

आत्मा है तो जीवन है....जीवन है तो आत्मा का आभास ....आत्म सर्वदा व्याप्त है .....तो जीवन भी हमेशा आत्मा से जीवन का सम्बन्ध शाश्वत है . बिना आत्मा के जीवन संभव ही नहीं . और बिना जीवन के आत्मा सिर्फ एक ज्योतिपुंज , शाश्वत, नित्य , अजन्मा , अमर , निराकार ब्रह्म्वरूप ही है .अगर आत्मा है तभी जीवन संभव है और जब जीवन मिलता है तब आत्मा को एक आकार मिल जाता है , एक नाम मिल जाता है और जीवन जीने का एक उद्देश्य . बस यहीं आकार जीवन मात खा जाता है अपने असल उद्देश्य को भूल जाता है और ज़िन्दगी के प्रपंचों में फँस कर तबाह हो जाता है मगर आत्मा तो निर्लेप रहती है उस पर फर्क नहीं पड़ता वो तो अपना समय पूरा करती है और दूसरा चोला धारण कर लेती है और फिर जीवन से उसका सम्बन्ध जुड़ जाता है और सृष्टि क्रम यूँ ही चलता रहता है तब तक जब तक आत्मा अपने ज्योतिपुंज रूप को फिर से प्राप्त नहीं कर लेती है . सभी सुख दुखों से परे बस इतना ही आत्मा का जीवन से सम्बन्ध होता है .

अनुभव प्रिय 

( पटना डीपीस के छात्र )

आत्मा और जीवन?
आत्मा ही जीवन को जन्म देती है|'इदं भस्मान्तं शरीरं' - ईशावास्योपनिषद में लिखा है|अर्थात यह शरीर नश्वर है, हम सब यह तो जानते ही हैं कि आत्मा जिस क्षण शरीर का परित्याग करती है उसी क्षण शरीर की मृत्यु हो जाती है|अतः स्पष्ट है कि जीवन को जन्म देती है यही आत्मा| आत्मा जो अविनाशी है, शाश्वत है वही जीवन की ज्योति प्रज्ज्वलित करती है|
ज्यों किसी विद्युत-चलंत यंत्र का विद्युत-प्रवाह रोक देने पर वह निष्क्रिय हो जाता है, त्यों ही आत्मा के निकलते ही, शरीर यह हमारा निष्क्रिय हो जाता है, गतिहीन हो जाता है|
मनुष्य को अस्तित्व में आने के लिए प्राण चाहिएँ, जो आत्मा से ही संभव है| आत्मा अस्तित्वदायी है, प्राणदायी है, जीवनदायी है|
जड़ को चेतन में परिवर्तित करने वाला ब्रह्म है, जो कि आत्मा है | आत्मा और परमात्मा में मात्र 'परम' इस शब्दांश का भेद है, अन्यथा कुछ नहीं |
'अहम ब्रह्मास्मि'(मैं, आत्मा, ब्रह्म हूँ) व 'तत् त्वमसि'(वही, ब्रह्म; तुम, आत्मा हो) इस बात कि पुष्टि करते हैं| कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मा, परमात्मा है और जीवन देती है| ब्रह्माण्ड में विस्तृत सर्व-मूलतत्वों के समाहारोपरांत, आत्मा उसे गतिशील बना देती है |
अतः मैं अपनी बात यहाँ समाप्त करता हूँ, पुनः उसी बात को लिखकर कि आत्मा ही जीवन को जन्म देती है|

अंजू अनन्या 

http://anjuananya.blogspot.in/   


My Photoआत्मा और जीवन .........एक ही सिक्के के दो पहलू .....रहता है....आत्मा भाव है निराकार है ....भाव की अभिव्यक्ति साकार होती है वैसे ही आत्मा को स्वरुप चाहिए ....आत्मा का भौतिकता से जुड़ना जीवन है .....जीवन आत्मा द्वारा आभासित होता है .....शास्त्रगत आत्मा मरती नही तो जन्म भी नही लेती ....मतलब हमेशा रहती है एक शरीर छोड़ दुसरे को अपना लेती है .....अभिव्यक्ति के लिए उसे शरीर चाहिए ....इसी लिए जब शरीर मिटटी होता है ....कभी कभी जल्दबाजी में आत्मा किसी भी शरीर में वो कीट पतंगा ....जानवर या दुष्ट क्रिया में प्रवेश कर लेती है ...शरीर के बिना जीवन का आभास नही होता ....../
जब इस विषय पर विचार रखने का सन्देश मिला ...मैं सोच रही थी ....क्यूंकि भाव जब होता है तो शब्द स्वयंम आते है....लेकिन एक हादसा हुआ ....छोटा सा एक्सिडेंट ....और एक बारगी तो हिल गई ..../ कुछ ऐसा हो जाता तो.....बस अहसास हुआ जीवन का .....आभास आत्मा ने करवाया यही जीवन है ...../पता नही मुद्दे को स्पष्ट कर पाई हूँ या नही ...../पर मेरा मानना यही है " जीवन जीवन होता है ....भिन्न होता है तो दृष्टिकोण ....आत्मा दृष्टि है ....जीवन सृष्टि है ....दोनों पूरक है ....."
 
"बाहर खिली तो धूप हुई .....
भीतर उतरी तो नूर हुई .....
एक बूँद इनायत की उसकी ,
बरसी तो नुपुर हुई ........"


  गार्गी मिश्रा 
gargi@dakhalandazi.co.in 
आत्मा का जीवन से संबंध वैसा ही है जैसे किसी महासागर का क्षितिज से होता है ... जीवन महासागर है , अनन्त है और आत्मा क्षितिज है , शाश्वत है , वो नियम है ... आत्मा शरीर रुपी सूरज की तरह , उगती है और अस्त भी होती है ... और ये नियम चलता रहता है .. हर क्षण




विभा रानी श्रीवास्तव 
http://vranishrivastava1.blogspot.in/
 
"आत्मा" का सीधा-सादा अर्थ निकाले तो "प्राण" ,जिसके बिना तो जीवन की कल्पना ही नही की जा सकती | लेकिन हम यहाँ आत्मा का अर्थ ज़मीर से लेते है | तो "आत्मा" दो तरह की होती है |पहली , "भली आत्मा" और दूसरी , बुरी आत्मा | "भली आत्मा" को परिभाषित करें , तो जिन इंसानों में - क्षमा ,अहिंसा ,स्नेह ,दया ,तपस्या ,सेवा ,भक्ती जैसे गुण हों ,उनकी आत्मा भली कहलाती है..... और "बुरी आत्मा" को परिभाषित करें , तो जिन इंसानों में - क्रोध ,लोभ ,इर्ष्या ,हिंसा जैसे गुण हों ,उनकी आत्मा बुरी कहलाती है ,लेकिन ये इंसानी गुण है तो सभी इंसानों में रहती ही है और समय पाकर इंसानों पर हावी होती है | कहते है ,"अगुंलिमार डाकू" सुधर कर रामायण की रचना कर डाली और "रावण" जैसा विद्वान पंडित अपने साथ-साथ अपने वंश का नष्ट कर डाला........ | आज हमसभी जो रोज कालाबाजारी - भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे है वो हमारे में भली आत्मा या यूँ कहे जमीर अभी जिन्दा है और जो लोग रोज कालाबाजारी - भ्रष्टाचार में लिप्त है उनकी तो आत्मा ना अच्छी और ना बुरी ,उनकी तो आत्मा मर चुकी है.... | अत: हम यह कह ले बिना आत्मा का इन्सान जानवर से भी गया-गुजरा है.... |

 रजनी नय्यर मल्होत्रा 

http://rajninayyarmalhotra.blogspot.in/ 



यूँ तो आत्मा नश्वर है, पर जीवन एक अवधि में समाप्त हो जाने वाली | एक अभिप्राय जीवन का अर्थ जीवित रहना है ,तो इस सन्दर्भ में आत्मा का जीवन से वही सम्बन्ध है जो शरीर का प्राण से, मछली का जल से, साज़ का सुर से.... और दुसरे पहलू से देखें तो जीवन में कर्म का उदेश्य और उसकी प्राप्ति की जदोजहद ही जीवन है | यहाँ आत्मा जितनी शुद्ध होगी ,बलि होगी उसके जीवन में उदेश्य की प्राप्ति और सत्कर्म में गुणों की प्रधानता होगी | जीवन का आत्मा से सम्बन्ध दोनों ही रूपों में परस्पर लिए हुए है. | जीवन में जीने की प्रेरणा और उदेश्य हमें शरीर से नहीं आत्मा से मिलती है पर उसे पूरा करने में अहम् भूमिका शरीर की होती है ,हमारा अंतर्मन (आत्मा) जिस कर्म या वस्तु की अभिलाषा करता है उसे पूर्ण करने में शरीर का होना जरुरी है ,मन बलवती है पर तन साथ नहीं दे रहा तो ऐसे में जीवन बोझ है अतः जीवन में आत्मा के साथ शरीर का होना बेहद जरुरी है हम कह सकते हैं जीवन दोनों का है - आत्मा और शरीर का , यहाँ भी दोनों परस्पर सहयोगी हैं| 

Saturday, February 18, 2012

एक पहल...



अनुभवों का मसला था
या बीतते सालों का कारवां
मन के कोने में जो जमा
वह पन्नों पर उतरने लगा
ज़िन्दगी पहले अधिक सहज हो गई
उम्र का मुकाम हो गई ...


रश्मि प्रभा

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एक पहल...

५४ साल लम्बी यादें.....
उतार चढ़ावों से भरीं
जिसमें बहुत कुछ बीता
कुछ फाँस सा असहनीय पीड़ा दे गया
कुछ अनायास ही खिल आनेवाली मुस्कराहट का सबब बन गया....
कुछ एक कविता बन मुखरित हो गया
कुछ ,
बस यूहीं धूप में छाँव सा ठंडक पहुंचा गया ......
और यादों का यह काफिला
पृष्ट दर पृष्ट पूरा जीवन बन गया
जिसमें गाहे बगाहे, कुछ सुरीले, सुखद क्षण,
.....मेरे हिस्से की धूप बन गए.....
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सरस

Friday, February 17, 2012

तड़प यह छोड़ दूँ कैसे?



चेतन हूँ अचेतन कैसे हो जाऊँ
मैं प्रयोजन हूँ
अपना अस्तित्व कैसे खो जाऊँ ?


रश्मि प्रभा

==============================================================
तड़प यह छोड़ दूँ कैसे?

तड़पना छोड़ दूंगा मै,
मुझे प्रस्तर बना दो तुम!
ये वादे तोड़ दूंगा मै,
मुझे जड़वत बना दो तुम!

तड़प ये छोड़ दूँ कैसे ?
जब तक चेतना जागृत,
मुहब्बत छोड़ दूंगा मैं,
मुझे अचेतन बना दो तुम!

मालूम न था तब यार!
याराना होता है ऐसा,
चाहे जड़ भी बना दोगे,
मुहब्बत कम नहीं होगी.

प्यार होता है- 'सचेतन',
इसे अब मैंने जाना है.
जिसे हम जड़ समझते थे,
उसमे स्पंदन भी होता है.

कहते प्यार जिसको हैं,
यह है उपहार, सृष्टि का.
यह मिलता नहीं सबको,
यह है, उपकार दृष्टि का.

शिला पर पोत के काजल,
दिल के बोल लिख दूँगा.
मगर पढ़ पाओगे तुम ही,
ऐसी लिपि में लिख दूंगा.

ये जानो दूर होकर भी,
नहीं तुम दूर हो सकते.
न अपने आप में इतने,
अधिक मगरूर हो सकते.

एक दिन वह भी आयेगा,
जब नंगे पाँव आओगे.
हो विकल शिलापट्ट पर,
सिर को तुम झुकाओगे.

लेकिन कहाँ उस क्षण,
शिला मै रह ही पाऊँगा,
शिला जो धार फूटेगी,
उसी से लौट आऊँगा.

धार गंगा की लाऊंगा
तुझे यमुना बना कर के,
संगम मै यहीं बनाऊंगा.
अब संगम यहीं बनाऊंगा.

संगम हुआ पत्थर प्रदेश में,
स्रोत पीयूष बहे समतल में.
कर पार अवरोध जीवन के.
हम लेंगे मुक्ति सागर तल में.

बूँद मिलेगा जब यह सागर में,
तब सागर ही यह कहलायेगा.
होगा फिर, एक दिन कुछ ऐसा,
बूँद में, सागर विलीन हो जायेगा.

तड़प यह मुक्ति का है द्वार,
तड़प यह छोड़ दूं कैसे?
जब तक चेतना जागृत,
तड़प यह छोड़ दूं कैसे?

जिसने शक्ति दी मुझको.
और अनुरक्ति दी मुझको.
जिसने भक्ति दी मुझको.
देगी मुक्ति जो मुझको,

तड़प वह छोड़ दूं कैसे?
तड़प यह छोड़ दूं कैसे?

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Dr.J.P.Tiwari

Thursday, February 16, 2012

जिन्दगी जरा आहिस्ते चल ,



आगे निकलने के क्रम में
हम सबसे बिछड़ गए
सूरज को पाने का दंभ लिए
अन्दर ही अन्दर जल गए
अब ऐ ज़िन्दगी ... धीरे चलो
भागते दृश्य पलकों में ठहर नहीं पाते
कौन सा घर अपना है - जान नहीं पाते !


रश्मि प्रभा
============================================================
जिन्दगी जरा आहिस्ते चल ,

ऐ जिन्दगी जरा आहिस्ते चल ,
कहीं दौड़ते-दौड़ते न दम निकल जाए,
सकूं की तलाश चैन की चाहत में,
हम ये कहाँ बदहवासों के शहर चले आए,
सादगी खतरे में है हमारी,
डर है हमें कहीं हम भी न बदल जाएँ,
खतरनाक है सुबह यहाँ की शाम जमील है,
ये अदम खोर चौराहे,कहीं हमें भी न निगल जाएँ,
गर्मी तेज हैं यहाँ दौलत की, इंसान पिघलते हैं,
कहीं ऐसा न हो की मेरे भीतर का भी आदमी पिघल जाए,
हर कोई डंक मरता है यहाँ सांप और बिछुओं की तरह,
बात करता नहीं कोई ऐसी की दिल ये बहल जाए,
बड़ी ताजीब-ओ-सलीके से जिन्दगी बसर करते हैं लोग,
कभी उनका दिल नहीं करता कि बच्चों सा मचल जाएँ,
लौट आए हैं हम गाँव की झोपडी में ''अनंत'',
बड़ा मुश्किल है की फिर लौट के शहर के महल जाएँ
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अनुराग अनंत

Wednesday, February 15, 2012

मैं खुद से बातें करता हूँ !

खुद से बातें न करो 

उठापटक ना करो 
तो मन के कई कमरे बन्द रह जाएँ 
प्रश्न मुंह बाए कोने में पड़ा रह जाए 
...... खुद को खुद से ही राह मिलती है ...

                  रश्मि प्रभा 


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मैं खुद से बातें करता हूँ!

कभी न्यारी-सी प्यारी बातें,
कभी विचारों से भरी बातें, 
उर के भीतर एक द्वंद्व मैं
अनायास ही लड़ता हूँ!
मैं खुद से बातें करता हूँ!

खुद को ही दो टुकड़ों में कर
खुद ही कहता, खुद सुनता हूँ.
कोलाहल में सामंजस्य का
नव नित रूप मैं गढ़ता हूँ.
मैं खुद से बातें करता हूँ!

स्व-चिंतन ही आत्मबोध है,
अंतर-मनन सर्वोत्तम शोध है,
मन के गागर को मैं नित नित
गंगा-जमुना से भरता हूँ.
मैं खुद से बातें करता हूँ!
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मधुरेश  

Tuesday, February 14, 2012

प्रेम-हाइकु



पावन शब्द
अवर्णनीय प्रेम
सदा रहेंगे।


सहेजते हैं
सपने नाजुक से
टूट न जाएं।


जीवंत रहे
राधा-कृष्ण का प्रेम
अलौकिक सा।


फिल्मी संस्कृति
पसरी हर ओर
कामुक दृश्य


अपसंस्कृति
टूटती वर्जनाएँ
विद्रूप दृश्य


ये स्वछंदता
एक सीमा तक ही
लगती भली.

कृष्ण कुमार यादव  
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संपर्क :- कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवा, अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-744101
 kkyadav.y@rediffmail.com

Monday, February 13, 2012

तुम्हारे नाम / मेरे नाम





तुम्हारे नाम / मेरे नाम


समंदर आमने सामने होता
तो लहरों की बातें कुछ इस तरह होतीं
एक कहती एक सुनती
व्यथा एक सी होती ....
रश्मि प्रभा

संघर्ष के माध्यम से उपजा चिंतन
लाया एक नया अध्ययन
मैंने तुम्हें पढ़ा
तुमने एक नया आयाम दिया
लो कविता ने फिर
एक नयी कविता को जन्म दिया
कुछ तुम्हारी कुछ मेरी
दिल की कहानी है
जो लफ़्ज़ों में उतारी है
चलो आज कुछ तुमने कही
कुछ मैंने कही
एक नयी रिश्ते की धारा बही
देखो ना ..........ये मैंने पढ़ा तुम्हें
कुछ इस तरह :--------

वंदना गुप्ता


तुम सिर्फ कविता नहीं
न ही कैनवस हो
जहाँ जब चाहे कोई रंग भर दे ...
तुम कैनवस भी , तुम्हीं रेखाएं , तुम्हीं रंग
हवा में फडफडाते पन्नों को समेटती
खुद से खुद को बचाती एक ख़ामोशी हो तुम
हंसती तो हो सागर की लहरों सी
पर गहरे दबे सीपों से अनजान सी तुम ...
तुम्हें पता है ,
हँसी के घेरे में उलझ कर
लोग मोती भूल जाते हैं
और इस तरह अपने मोतियों को
संभाल लेती हो तुम !
तुम प्रेम भी हो , तुम भक्त भी हो ,
और एक अहर्निश पलता उलाहना भी
प्रेम के बदले प्रेम संभव नहीं
तलाश अदृश्य में प्राप्य की
इस प्रेम को लिखा तो जा सकता है
पर इसकी व्याख्या नहीं हो सकती
क्योंकि यह होकर भी नहीं होता !
इसे न 'हाँ' की शोखी मिलती है
न 'ना' का दर्द
फिर - .....
तुम पहेली तो बिल्कुल नहीं
हाँ समझनेवाले नहीं ...
तुम छुपते छुपते
हकीकत से कल्पना में जीते जीते
थक गई हो ,
वरना -
अचानक तुम्हारी कलम बेबाक हो
मुझसे नहीं कहती -
" लिखिए ना , कौन मना करता है !"
तुम्हें मेरी दृष्टि
मेरे आकलन पर विश्वास है
तुम्हें पता है,
मैं अनकहा सुनती हूँ
तो .... थके मन से तुमने उस लड़की को जानना चाहा
जो तुम्हारे भीतर ही उजबुजाती है
सुगबुगाती है
सिसकती है
पर सत्य असत्य , कर्तव्य अधिकार के बीच
खुलते खुलते रह जाती है ...
.......
एक सच मैंने पहले भी कहा था
फिर दुहराती हूँ
मैं एक रूह हूँ
और जो लड़कियां अपने अन्दर मर सी जाती हैं
उनसे मेरा रूहानी रिश्ता है ....

रश्मि प्रभा
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मैं कविता भी बनी
कैनवास भी बनी
रंग भी बनी
आसमा में भी उडी
हवाओं के रथ पर सवार हो
एक नया आकाश भी बनाया
पर धरती से मेरा रिश्ता
कोई समझ ना पाया
कितना उड़ लूं
पंख कितना परवाज़ भर लें
उतरना तो जहाज पर ही होता है
हाँ .........हूँ मैं अपने लिए
एक अबूझ पहेली सी
नहीं जानती ......क्या चाहती हूँ
किससे चाहती हूँ
और क्यों चाहती हूँ
मगर मोहब्बत का असीम सागर
सीने में लिए फिरती हूँ
उसी में एक बूँद
अमृत की भी छुपायी है
उसी अमृत की जो
मैं बाँटना चाहती हूँ
मगर मुझे वो खुदा मिलता ही नहीं
ना जाने कौन सी अल्हड़ता आड़े आ जाती है
जो मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा ना लाँघ पाती है
और अपनी सोच में
अपने ख्वाब की हकीकत में
जो छिपना चाहती है
नहीं बताना चाहती
अधिकार कर्तव्यों से परे भी
एक जीवन होता है
जहाँ सिर्फ रूहों का घर होता है
अनकहे जज़्बात होते हैं
कुछ फैले तो कुछ सिमटे
अहसासों के लम्हात होते हैं
कल्पना हो या हकीकत
दो जिंदगियां कैसे जिए कोई
किसी को तो मरना ही होता है
यूँ ही नहीं बंद जुबानों के पीछे छुपे तूफ़ान खामोश रहते हैं
कोई तो कारण होता है .........मुस्कुराने का

वंदना गुप्ता

Sunday, February 12, 2012

माँ



छिः ... धिक्कार है
वंश इसे कहते हैं
जो शान की झूठी तस्वीर के लिए
माँ से परहेज करे
माँ को पत्थर बना दे ...

 रश्मि प्रभा

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माँ

कितनी अच्छी हो तुम, माँ !

कह सकता हूँ तुमसे
मन की सारी बातें,
यह कि मेरे दोस्त आएँ
तो अंदर ही रहना,
सामने आओ भी
तो अच्छी साड़ी पहन
बाल संवारकर आना
और दूरवाली कुर्सी पर बैठना.

उनकी नमस्ते का उत्तर
हाथ जोड़कर देना,
हो सके तो चुप ही रहना,
बोलना ही हो तो
ज़रा ध्यान रखना,
शर्म को सर्म,
ग़ज़ल को गजल मत कहना.

उनके सामने चाय न पीना,
सुड़कने कि आवाज़ आएगी.

मेरी इतनी सी बात मानोगी न,
मेरी अच्छी,प्यारी, माँ ?
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ओंकार

Saturday, February 11, 2012

टुकड़े- टुकड़े में बंटी मैं



रिश्ते थे या कर्तव्यों की हिदायतें
विभक्त सी मैं - खुद को भी अब ना पहचानूँ !


रश्मि प्रभा

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टुकड़े- टुकड़े में बंटी मैं,

टुकड़े- टुकड़े में यूँ बंटी मैं,कि मिलता ही नहीं अब कोई भी सिरा
खोजती फिरूँ कब तक राहों में, कि कहाँ -कहाँ कतरा मेरे अस्तित्व का गिरा ,

जब भी बैठी जोड़ने टुकडो को, हर बार हुआ यूँ ही
ढूँढा एक टुकड़ा तो फिर न अगला सिरा मिला,

छलनी करती रही हर बार जाने कितनी वेहशी निगाहें जिस्मो- जान मेरा
न जाने कितनी बार मुझे उन दहशत के सायों ने आ घेरा

जो भी मिले यहाँ बनकर हिमायती, सब वो जिस्म के प्यासे थे
दिए थे जो गम के आलम में, झूठे सब वो दिलासे थे

कब तक सहती वार पर वार यूँ मैं ,की बिखरना ही था यूँ एक दिन
बिखरी इतने टुकडो में कि फिर न कभी सिरे से सिरा मिला............

कोशिश भी जब लाख की जोड़ने की तो
बस इक उथला सा चेहरा मिला ..........

-सोमाली

Friday, February 10, 2012

रंग बिरंगी चिड़िया एक दिन बोली मुझसे



चिड़िया की उड़ान
उसकी मीठी आवाज़
उसके रंग सबको दिखते हैं
पर उसकी भी अपनी व्यथा है -


रश्मि प्रभा

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रंग बिरंगी चिड़िया एक दिन बोली मुझसे

रंग बिरंगी चिड़िया
एक दिन बोली मुझसे
निरंतर खूब लिखते हो मुझ पर
कभी मुझसे भी तो पूछ लो
क्या लिखना है मुझ पर ?
क्या सहती हूँ ? कैसे जीती हूँ ?
कैसे उडती आकाश में ?
आज मैं ही सुनाती हूँ
मेरी कहानी
पहले ध्यान से सुन लो
फिर जो मन में आये लिख लो
पेड़ पर टंगे कमज़ोर से नीड़ में
माँ ने अंडे को सेया
तो मेरा जन्म हुआ
जीवन लेने को आतुर
दुश्मनों से बचा कर
किसी तरह माँ ने
पाल पास कर बड़ा किया
मुझे सब्र का पाठ पढ़ाया
जब तक खुद को
सम्हाल नहीं सकूं तब तक
उड़ने को मना किया
पहले फुदकना सिखाया
कुछ अनुभव के बाद मुझे
उड़ना सिखाया
तिनकों से बने नीड़ में
आंधी,तूफ़ान,
भीषण गर्मी और शीत में
निरंतर जीवन जिया
नीड कई बार उजड़ा
माँ ने हताश हुए बिना
हर बार अथक परिश्रम से
नया नीड बनाया
सदा चौकन्ना रहने का
महत्त्व बताया
मुझे आत्म रक्षा का
उपाय सुझाया
अनुभव ना ले लूं जब तक
नीड़ से दूर जाने को
मना किया
माँ ने संतुष्ट रहना
सिखाया
अपने सामर्थ्य के अनुरूप
जीने का मार्ग दिखाया
माँ जो भी करती थी
उन्होंने मुझे भी सिखाया
अब ,एक बात तुम से भी
पूछ लूं
क्यों मनुष्य बच्चों को सब्र से
जीने के लिए कहता
परन्तु खुद बेसब्र रहता
संतान से
संयम रखने को कहता
खुद व्यवहार में उत्तेजित होता
अनेकानेक कामनाएं
रखता
पर निरंतर असंतुष्ट रहता
संतान को भी असंतुष्ट बनाता
सदा अनुभव की बात करता
स्वयं अनुभव हीन सा
काम करता
अपने सामर्थ्य को नहीं
पहचानता
सब कुछ पास होते हुए भी
होड़ में जीता रहता
अति शीघ्र हताश हो जाता
अगर लिखना ही है तो
यह भी सब लिखना
मेरे रंग और सुन्दरत़ा पर
सब लिखते हैं
तुम से प्रार्थना है
तुम तो मेरा सच लिखना
मेरे जीवन से कुछ
तुम भी सीखना

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डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण