ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Tuesday, January 31, 2012

मैं वहीँ मिलूंगी... उसी नीले कुँए के पास



प्यार के सिरे जहाँ रह जाते हैं
उनको जब भी पाना हो ... वहीँ जाना
जो बचपन के गलियारे में रह जाते हैं
उनको पाने के लिए गुड़िया घर के दरवाज़े खोलना ...


रश्मि प्रभा

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मैं वहीँ मिलूंगी... उसी नीले कुँए के पास

मैं वहीं मिलूंगी
जहाँ हम इमली के बीजों से चौघडी खेला करते थे ..
जहाँ मैं बेर तोडा करती थी और तुम अमरुद की डाल पे बैठ के मुझे देखा करते थे..
जहाँ मैं चम्पक की कहानिया पढ़ के तुम्हे सुनती थी और तुम सुन के ठहाके मारा करते थे...
जहाँ हम बैठ के सोचा करते थे की कंचों में तारे क्यूँ दिखाई देते हैं...
मैं वही मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ मखनू अपनी कटी हुई पतंग के मंझे मांगने आ जाया करता था ..
जहाँ मैं परेता पकड़ा करती थी और तुम पतंग उड़ाया करते थे..
जहाँ काकी तुम्हारी भूगोल की कापी और बेलन ले कर आ जाया करती थी..
जहाँ शाम के कोहरे में हम मुह से धुआं निकाला करते थे..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ हर इतवार को जुलाहे चिलम पिया करते थे..
जहाँ हर मंगल को सरजू पगलिया ढोलक बजाया करती थी..
जहाँ मैं अपनी ओढ़नी और तुम अपनी कमीज़ पे बने फूलों के रंगों को तितलियों के पंखों में ढूँढा करते थे...
जहाँ हरहु साऊ के कबूतर कुँए के चबूतरे पे पड़े गेहूं चुगते थे..

मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ..
मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ एक बार तुम बिना बताये मीना के साथ बेर तोड़ने चले गए थे..
जहाँ मैंने इस बात पे घंटों आँखें सुजायीं थी..
जहाँ तुमने मेरी कापी में गुलमोहर के फूल बनाये थे..
जहाँ सरजू पगलिया ने बड़े लाड से हमें कच्ची कैरियां दी थीं..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ दूर से रेलगाड़ी दिखाई देती थी और हम उसे देख के खुश हो जाया करते थे ..
जहाँ नीले कुँए में झाँक कर हम दोनों एक दूसरे का नाम जोर जोर से पुकारा करते थे ..
जहाँ मैंने तुमसे कहा था अब माँ मुझे सजने सवरने को कहती है..
जहाँ तुमने मुझे पानी वाले रंग से बिंदिया लगायी थी..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ शायद आज भी उस कुँए की दीवारों में हमारे नाम गूंजते होंगे..
जहाँ आज कोई बूढी पगलिया दिन में अमरुद बेचती होगी
जहाँ इमली के बीज अब पेड़ बन गए होंगे..
जहाँ काकी मखनू के लड़के को हमारी कहानियां सुनती होगी....
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास....

इमली और कंचे लाना न भूलना....


Gargi Mishra

Monday, January 30, 2012

कुछ तो करो लोगों



दोष इसका है या उसका है , इसको बताने से पहले
अपने इस मुल्क के लिए कुछ तो कर जाओ लोगों ...


रश्मि प्रभा


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कुछ तो करो लोगों

अक्सर यहाँ वहां होने वाले दंगों के बाद लगी आग ने ये लिखने पर मजबूर किया मजबूरी इसलिए क्योंकि ऐसी ग़ज़लें खुशी में नहीं लिखी जातीं ।

आग ही आग है हर सिम्त बुझाओ लोगों
जल रहे बस्ती में इन्सान बचाओ लोगों

दुश्मनी खत्म हो और दोस्ती का हाथ बढे
हो सके गर तो ये एहसास जगाओ लोगों

दुश्मनी किस से है क्यों है ये अलग मसला है
नन्हें बच्चों पे तो मत दाओ लगाओ लोगों

टूटी ऐनक है जले बसते हरी चूड़ी है
जाओ बस्ती में ज़रा देख के आओ लोगों

बेखताओं को न मारो यही कहते हैं धरम
जो नहीं जानते ये उन को बताओ लोगों


जब के रावण था मरा , राम ने ये हुक्म दिया
साथ इज्ज़त के रसूमात निभाओ लोगों

दिल है बेचैन 'शेफा' मुल्क की इस हालत पर
अब भी खामोश हैं हम ख़ुद को जगाओ लोगों
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इस्मत जैदी

Sunday, January 29, 2012

नन्ही लौ और इंसान...!



असुर का साम्राज्य कितना भी बड़ा हो
अगर की खुशबू मन को सुकून देती है ...




रश्मि प्रभा

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नन्ही लौ और इंसान...!

अन्धकार भयावह है...
विस्तार लिए हुए है
रौशनी नन्ही सी है...
एक लौ में सिमटी हुई है

पर,
जब दोनों देखे जायेंगे
तब एक दूरी से
वह नन्ही लौ ही नज़र आएगी
और सिमटी हुई नन्ही सी लौ
अन्धकार पर भारी पड़ जायेगी!

देखने वाले को
दीया
बड़ी दूर से ही दिख जाएगा
विस्तृत होता हुआ भी
अन्धकार
नहीं दिख पायेगा

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है

ज़िन्दगी
कुछ एक मूल सिद्धांतों पर भी
अगर अडिग रहे
प्रेम-दया-करुणा के भाव
मन में
सजग रहे
फिर,
जो एक
अप्राप्य सा लक्ष्य (?) जान पड़ता है-
इंसान होना!
दुर्लभ ही है
औरों के आँसुओं को
अपनी आँखों से खोना...;
वह स्वतः ही
सहज हो जाएगा
नन्हा दीया जो बन गया मन
वह साक्षात् पुण्यधाम ब्रज हो जाएगा

इंसानियत की बाती के प्रज्वलित होते ही
यह दीये वाला चरित्र
साकार हो जाएगा
देखना यह कलयुग फिर
स्वयं ही सतयुग का
अवतार हो जाएगा!!!




अनुपमा पाठक

Saturday, January 28, 2012

" बरगद –आत्मकथ्य"



अपनी विशालता को पहचानो
कितने पौधे तुमसे ऊष्मा पाते हैं
कितने राहगीर आराम ...
लाभ हानि तो हर रिश्तों में है
तो क्या अपने वजूद से रूठ जाएँ !...




रश्मि प्रभा

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" बरगद –आत्मकथ्य"

एक विस्तृत कानन का वह शहंशाह था ।
अहं था सबका भगवान कहलाने का
लटकी जटाओं में बच्चों का डेरा था ।
कोलाहल आस -पास ,मस्ती घंटों का
चबूतरे पर पंचायत का जमावड़ा था ।
प्रतिद्वंद्वी नहीं ,कोई दूसरा उस परिवेश का
सूखती झाड़ियों और दूब पर रौब था ।
पनप सका न कोई गवाह तात्कालिक इतिहास का
बियाबान के राजा ने तब जाना बांटने में सुख है ।
मोटे तने की बुजुर्गियत सुनती है पीड़ा एकाकी का
उष्णता नस -नस की यूँ ही सूख जाती है ।
अगले जन्म मुझे चंपा बनाना या बबूल काँटों का
दंश अकेलेपन का बरगद बन बहुत झेल लिया है ।
विशाल हो गया रस निचोड़ कर कण -कण का
एकाधिकार नहीं चाहिए ,छोटा होने में भलाई है ।
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कविता विकास

Friday, January 27, 2012

"संतुलन"



एक जीवन से दूसरा जीवन
संतुलन बनाने के लिए बहुत कुछ इधर उधर होता है
ठीक उसी तरह - जैसे किसी के आने पर कमरे की साज सज्जा बदलती है
पर .... स्पर्श और प्यार नहीं बदलता
हर रिश्तों का अपना अर्थ होता है ...


रश्मि प्रभा

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"संतुलन"

अबोध था मै भी कभी,
उंगलियां भी नन्ही रही होंगी जरूर,
पर धीरे धीरे वक्त के साथ,
कब मां की उंगलियां छूटी और,
मेरी नन्ही उंगलियां बड़ी होने लगीं,
याद नही,
वक्त और बीतता गया,
मां ने अपनी पसंद के दो हाथ थमा दिये और,
कहा यह जीवन संगिनी है,
ये नये हाथ ज्यादा रास आये,
सो ज्यादा मजबूती से थाम लिये,
क्रमशः स्वभाविक रूप से,
चार नन्हे हाथ और जुड़ गये,
इसी आपाधापी और जीवन की,
रिले रेस के बहाव में,
मां को लगा शायद,
मैं उनकी उंगलियों का स्पर्श,
कंही भूल गया हूं,
ऐसा कदापि नही हो सकता,
पर हां थोड़ा "संतुलन" बना पाने में,
जरूर विफ़ल रहा हूं,
नई और विरासत की उंगलियों में।
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अमित श्रीवास्तव

Thursday, January 26, 2012

फिर आ गया गणतंत्र दिवस


फिर आ गया
गणतंत्र दिवस
दिखलाने, बतलाने
सुनने-सुनाने
हालात, समस्यायें
उपलब्धियां गिनाने।
देखो… सुनो… पढ़ो… जांचो…
मगर
कुछ कहना मत।
सच!
क्योंकि सच कह दिया तो
गणतंत्र दिवस का अपमान हो जाएगा।
पड़ जाएगी मंद
मधुर ध्वनियां ढोलों की।
खुल जाएंगी गुत्थियां
नेताओं की पोलों की।
अपने ढोलों की पोल खोलना
किसने चाहा
कौन चाहेगा
अपनी खामियां
हर भ्रष्ट यहां छिपायेगा।
इसी छुपा-छुपी में इक दिन
सचमुच गणतंत्र छुप जाएगा।
इसलिए…
सुनो, पढ़ो और देखो
कुछ मत बोलो
एक बार फिर
गणतंत्र दिवस को।



कृष्ण कुमार भारतीय


शोधार्थी, हिन्दी विभाग,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र,हरियाणा
अनाज मण्डी, कलायत, कैथल (हरियाणा)

Wednesday, January 25, 2012

चाय ...



चाय की मिठास सुबह की अलसाई धूप को मीठा बनाती है
तबीयत अपनी जगह है
पर फीकी पसंद .... चाय को चाय ही रहने दो
दवा न बनाओ ...



रश्मि प्रभा
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चाय

आज शक्कर अधिक हो गयी थी चाय में , बिलकुल सीरा लग रही थी ,चीनी जीभ पे कम होठों पर ज्यादा महसूस हो रही थी ,..सुबह की एक प्याली चाय में शक्कर अधिक मुझे भाई नहीं
मैं सोच रही थी की शक्कर तो मीठी है फिर ज्यादा होने पर भी क्यों अच्छा स्वाद नहीं आ पा रहा..
सही है, चाय में शक्कर का माप सभी के लिए अलग अलग है ..कोई ज्यादा ,कोई कम और कोई बिना शक्कर के ही चाय की चुस्की लेते है .
मुझे बराबर मात्रा ,पसंद है तो वहीँ मेरी कामवाली को दो चम्मच और...
मेरी सहेली तो बिना चीनी के ही पीती है .
यह मिठास तो ज़िन्दगी की मिठास की तरह है..
सो जोड़ दिया आज इस शक्कर का अनुपात ज़िन्दगी में घुली शक्कर से.
किसी किसी को मिठास ज्यादा अच्छी लगती है तो कोई खुश्क जीवन जिए जा रहा है , कहीं शक्कर का अनुपात बिलकुल राशन की दूकान पे चावल तौलते बनिए की तरह -न कम न ज्यादा ,तो कोई अपनी और दुसरे की आवश्यकता के अनुसार शक्कर की मात्रा घटा बढ़ा देता है और कहीं कहीं तो शक्कर के कई पर्याय है..
ज्यादा शक्कर से घुली ज़िन्दगी का अभिप्राय नहीं है ...वो अनावश्यक मिठास है जो मन के बाहर ही रह जाती है ...मिठास वो है जो तन और मन दोनों को छू जाए ..और फिर उसकी एक चुस्की ही सराबोर कर दे..
मिठास अथवा प्यार जीवन में शक्कर ही घोलते हैं ..
आज चाय के प्याले ने एक जीवन में शक्कर के महत्व को दर्शाया ..मेरा मार्गदर्शन हुआ ..
...मैंने अपनी कामवाली को एक कप चाय और बनाने के लिए बोला ,..इस बार शक्कर की मात्रा के बारे में उसे पता था ...

ऋतू

Tuesday, January 24, 2012

प्यार की परिभाषा..



बालू के घरौंदे ...
छप छप होती लहरें
किसी नन्हीं चिड़िया का इधर उधर देखना
चलते चलते हाथ पकड़ यूँ ही मुस्कुराना
अचानक बारिश की बूंदों से भीगना
तवे पर किसी के लिए रोटियाँ सिंकना .... प्यार होता तो यही है !
....
कहते हैं लोग ताजमहल है प्यार का प्रतीक !!!
एक अदभुत ईमारत है ज़रूर
अदभुत दृश्य .... पर प्यार !
.....
प्यार तो टूटी झोपडी में होता है
जब टपकती बूंदों के आगे कोई टूटा बर्तन रख देता है
नींद न खुले - इस एहसास के साथ ...
प्यार तो खट्टे टिकोलों में भी होता है
परछाइयों से खेलने में होता है
....
एक बात कहूँ -
प्यार भगवान् है
वह हर हाल में साथ होता है ...


रश्मि प्रभा



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प्यार की परिभाषा..

तुम्हारे लिए प्यार था
ज़मीं से फलक तक साथ चलने का वादा..
और मैं खेत की मेड़ों पर हाथ थामे चलने को
प्यार कहती रही....
तुम चाँद तारे तोड़ कर
दामन में टांकने की बात को प्यार कहते रहे...
मैं तारों भरे आसमां तले
बेवजह हँसने और बतियाने को
प्यार समझती रही..
तुम सारी दुनिया की सैर करवाने को
प्यार जताना कहते..
मेरे लिए तो पास के मंदिर तक जाकर
संग संग दिया जलाना प्यार था...
तुम्हें मोमबत्ती के रौशनी में
किसी आलीशान होटल में
लज़ीज़ खाना, प्यार लगता था...
मुझे रसोई में साथ बैठ,एक थाली से ,
एक दूजे को
निवाले खिलने में प्यार दिखा...

शहंशाही प्यार था तुम्हारा...
बेशक ताजमहल सा तोहफा देता...
मौत के बाद भी...

मगर मेरी चाहतें तो थी छोटी छोटी...
कच्ची-पक्की ..खट्टी मीठी...चटपटी...
ठीक ही कहते थे तुम...
शायद पागल थी मैं.

मेरे मन का कोना, जो जाने क्यूँ अनछुआ था अब तक..अब आपको समर्पित.








अनुलता ' विद्या '

Monday, January 23, 2012

सपना....



चिड़िया होने का सपना प्रायः हर लड़की देखा करती है
क्योंकि कोई डाली उसकी अपनी नहीं होती ...


रश्मि प्रभा

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सपना....

बहुत पहले मैं एक लड़की को जानता था जो चिड़िया हो जाने का सपना देखा करती थी।
हम अकसर एक दूसरे से अपने सपनों की बात करते थे... बात हम सीधी करते थे पर मुझे वह सारी बातें सपनों सी लगती थीं। मैं उससे जब भी कहता कि मुझे मेरे सपने कभी याद नहीं रहते... तो वह हंस देती थी...। वह कहती थी कि यह कोई रटने वाली चीज़ थोड़ी है जिसे याद रखना होता है!!! उसे सब याद था...। उसके सपनों का दायरा बहुत बड़ा था... वह बचपन की घटनाए भी सपनों की तरह सुनाती थी।

एक चिड़िया का घोंसला उसके घर के ऊपर था... जब भी वह टूटे हुए अंड़ों को देखती तो उदास हो जाती... कभी-कभी उसे चिड़िया के छोटे बच्चे भी नीचे पड़े हुए दिखते जिन्हें वह बिना हाथ लगाए वापिस धोंसलों तक पहुंचा देती। उसके बचपन की कई दोपहरे चिड़िया के धोंसले की पहरेदारी में बीतती थी। एक दिन उसने सपना देखा था कि वह एक चिड़िया के धोंसले में पड़ी हुई है...दूसरे चिड़िया के बच्चों के साथ। वह अपने परों को निकलता हुआ देख सकती थी...। धीरे-धीरे उसकी उम्र के बच्चे.. अपने परों को झटके के साथ खोलकर धोंसले से कूदने लगे थे.... और ऊपर आसमान में उड़ने लगे... वह अकेली रह गई थी.. डरी हुई। अब उसकी बारी थी। उसने उड़ने की तैयारी की.. अपने परों को झाड़ा... फैलाया..। वह धोंसले के कोने तक आई.... और ऊपर आसमान को देखने लगी...। वह कूदने ही वाली थी कि उसे नीचे एक भूखी बिल्ली दिखी जो उसका इंतज़ार कर रही थी...। उसने एक गहरी सांस भीतर खींची और अपने परों को चौड़ा करके धोंसले से कूद गई.... कूदते वक़्त उसने अपनी आंखें बहुत कस कर बंद कर ली थीं। तभी उसकी नींद खुल गई..।

हम लोग नदी किनारे धूम रहे थे जब उसने मुझे यह सपना सुनाया था। उसके सपने हमेशा बीच में कहीं खत्म हो जाते थे... हमेशा अंत होने के पहले उसकी आँखें खुल जाती थी। ’फिर क्या हुआ?’ जैसे प्रश्नों की मैं झड़ी लगा देता... जवाब में वह सिर्फ यही कहती की ’बस मैंने इतना ही देखा था।’ वह कहती थी कि हमें हमेशा अधूरे सपने याद रहते हैं... बीच की ख़ाली जगह... आधे कहे हुए संवाद... चुप्पी...। मुझे सपने याद नहीं रहते थे... मेरे सपने अपना अंत लेकर आते थे शायद... मुझे यूं भी अंत की हमेशा चिंता रहती थी...। किसी भी कहानी को पढ़ते हुए मैं उसके अंत का बोझ अपने कंधे पर लिए हुए उसे पढ़ता... अगर अंत अच्छा होता तो मुझे कहानी पसंद आती वरना मैं चिढ़ जाता। एक दिन उसने मुझसे कहा कि ’तुम पहले कहानी का अंत पढ़ लिया करो... फिर तुम कम से कम कहानी का मज़ा तो ले पाओगे।’ मैं उसकी बात समझता था... पर मैं उसके जैसा नहीं सोच सकता था... मैंने अपना पूरा जीवन भविष्य को देखते हुए जीया था... पर वह कभी भी भविष्य के बारे में बात नहीं करती थी। हम दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर सपनों का ही था। उसे अधूरेपन की आदत थी... और मैं अपने देखे हर सपने को उसकी नीयती तक पहुंचाना चाहता था।

मुझे वह अभी भी याद है। क्योंकि वह बीच में ही वापिस मुड़ गई थी... जबकि मैं आगे चलता रहा। मुझे लगा वह किसी अगले मौड़ पर मुझसे ज़रुर टकराएगी और हम वापिस साथ चलना शुरु कर देंगें... पर ऎसा नहीं हुआ..। वह जिस दिन मुड़ी थी तब से मुझे सपने याद रहने लगे। उसके अधूरे सपनों का अंत मैं अपने सपनों में देखने लगा... उसके जाने के बाद।

काम की तलाश वाली उम्र में मैं उससे मिला था। मुझे लगता था कि यह उन लड़्कियों जैसी है जो सपनों में जीती है। मैं उसे बार-बार खींचकर यथार्थ पर लाता था पर वह हर बार मुझसे छूटकर कहीं चली जाती थी। वह कहती थी कि ”मैं जल्दी से पैंतिस की होना चाहती हूँ.. मुझे यह उम्र बहुत बकवास लगती है। मैं बस पैंतिस होने तक का समय काट रही हूँ।’ वह मेरे हद के बाहर की लड़की थी.. वह जो कहती थी वही जीती थी.. शायद इसीलिए मैं उसकी तरफ इतना आकर्षित हुआ था। मैं उससे अकसर पूछा करता था कि ’हम दोनों एक साथ क्या कर रहे हैं?’ तो वह तपाक से जवाब देती कि ’हम दोनों एक साथ नहीं है..।’ मैंने उसके साथ अपने भविष्य के सपने देखने लगा था... भविष्य के सपने देखना मेरा स्वभाव था... मैं ऎसा ही था... मुझे दुकानों-दुकानों धूमना अच्छा लगता था। हर दुकान के सामने मैं बहुत देर तक खड़ा रहता था... और सपने देखता था.. जब मेरा घर होगा तो मैं यह रंग के पर्दे लगाऊंगा.. इस तरीक़े का फर्नीचर होगा..। मेरे सपने वहीं पर खत्म नहीं होते थे.. मैं उन्हें अपनी डायरी में नोट भी कर लेता था.. उनके दाम के साथ... फिर उसे ज़बर्दस्ति उन दुकानों पर ले जाता और उसकी राय पूछता..। उसे मेरी यह आदत बहुत बचकानी लगती थी.. पर वह हर बार मेरे साथ हो लेती... मुझपर हंसने के लिए.. और मुझे उसका हंसना बहुत सुंदर लगता। मैं हर बार उसे हंसाना चाहता था.. इसलिए अपनी बचकानी आदतों को उसके सामने दौहराता रहता।

एक दिन मैंने उसे एक झूठा सपना सुनाया...। मुझे ऎसा कोई सपना नहीं आया था पर मैंने उससे झूठ कहा कि मैंने कल रात तुम्हारा सपना देखा था कि तुम मेरे साथ पहाड़ों में धूम रही हो..। हमारी शादी हो चुकी है और तुम उड रही हो... मैंने तुम्हें अपने सपने में उड़ते हुए देखा था। इस सपने का उसपर बहुत गहरा असर हुआ था... मैं जानता था वह चिड़िया हो जाने का सपना देखती है। उसने मेरे झूठे सपने में अपनी आँखें बंद कर ली.. और मैं अपने झूठे सपने की उड़ान को रोक नहीं पाया..। मुझे उस झूठ के असर को देखकर चुप हो जाना चाहिए था पर मैं चुप नहीं हुआ... मैं अपने सपने गढ़ने लगा..। हर कुछ दिनों में मैं उसे एक सपना सुना देता... और वह हर बार अपनी आँखें बंद कर लेती। मैंने कभी उसे अपने इतना करीब महसूस नहीं किया था... वह मेरे पास थी... बहुत पास। इन्हीं सपनों के बीच कहीं हमने साथ रहने का फैसला कर लिए...। यह उसका फैसला नहीं था... जब उसकी आँखें बंद थी मैं उसे अपने घर ले जा चुका था। वह मेरे झूठे सपने में थी और मैं उसे सच में अपना बना चुका था। उसने मुझसे शादी नहीं की थी... पर हम साथ रहने लगे थे। मैंने अपने घर को अपने सारे बचकाने सपनों से सजा दिया था... वही पर्दे.. वही फर्नीचर जिसे देखकर वह खूब हंसी थी..। अब वह उन सबके बीच में रहने लगी थी। मुझे लगा था कि वह बहुत हंसेगी पर वह चुप होती गई थी।

उसकी एक आदत थी जिससे मैं बहुत चिढ़ता था... वह अपना हर जॉब कुछ ही महीनों में छोड़ देती थी। वह अपने भविष्य की कुछ भी संभावना देखते ही बिदक जाती थी... तुरंत छोड़ देती... प्रमोशन के लेटर पर वह अपना इस्तिफ़ा कंपनी में दे आती..। मैंने अपनी काम तलाशने की उम्र से जो जॉब पकड़ा था मैं आज भी उसी ऑफिस में था... मैं बार-बार उसे अपना उदाहरण देता कि देखो आज मैं कितना सफल हूँ। वह कभी बहस में नहीं पड़ती थी.. ऎसी बातों में वह हर बार पहाड़ों पर चलने की बात कहती और मैं हर बार बात टाल जाता।
मैंने उसे अपने साथ लगातार घरेलु होते देखा था..। मैं जब भी उसे अपने घर में काम करता हुआ देखता था तो मुझे अजीब सी जीत का अहसाह होता था। जैसे मैंने कोई जंगली जानवर को पालतू बना दिया हो। जैसे...हाथी का दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करना हमें बहुत अच्छा लगता है... शेर हंटर की टाप पर कुर्सी पर बैठ जाए तो हम ताली बजा देते हैं... आसमान में उड़ते हुए पक्षी हो अपने घर के पिंजरे में अपना नाम पुकारते हुए सुनना कितना सुख देता है... मैं उसी सुख में था।

फिर वह दिन आ गया.....
वह रविवार का दिन था। छुट्टी थी... और वह किचिन में आटा गुंध रही थी। मैंने पूछा
’क्या कर रही हो”
तो वह कहने लगी कि..
’मैं पूरियां बना रही हूँ।’
’पूरियां क्यों? आज कोई त्यौहार है क्या?’
’ना... इस महीने मैं पैंतिस की हो जाऊंगी।’
’इस महीने मतलब... तुम्हारा जन्म दिन कब है?’
’जन्म दिन का पता नहीं है... पर इसी महीने कभी है। मैं खुद को पैंतिस महसूस कर रही हूँ...। मैं अपने परों को बड़ा होते देख सकती हूँ।’
’मैं पैंतिस की हो जाऊगीं...’ के बाद मुझे नहीं पता कि वह क्या कह रही थी..। मैं बार-बार उसका उड़ना सुन रहा था... मैं डर गया। मुझे उसका सपना याद था.. वह चिड़िया होना चाहती थी हमेशा से...। वह बस पैंतिस होने का इंतज़ार कर रही थी।
’तो अब तुम क्या करने वाली हो?’
’पूरियां बनाऊगीं और पतली आलू टमाटर की सब्ज़ी।’
’नहीं मेरा मतलब है.. पैंतिस होते ही क्या करोगी?’
’उड़ जाऊंगी।’
वह अपनी बातों में एकदम सहज थी..। मैं डर गया..। इस बार मैंने उससे कहा..
’सुनों मैं एक हफ्ते की छुट्टी ले रहा हूँ ऑफिस से... चलो कहीं पहाड़ों पर चलते हैं।’
’ना... मेरी इच्छा नहीं है..।’
’अरे तुम ही कहा करती थीं... पहाड़ों पर जाना है.. अब क्या हुआ?’
’बस... इच्छा नहीं है...।’
वह बहुत खुश दिख रही थी..। उसकी आँखों में जंगलीपन वापिस दिखने लगा था..। वह मेरे साथ रहकर.. या मुझे सहकर सिर्फ पैंतिस होने तक का वक़्त काट रही थी। वह पैंतिस होते ही उड़ जाएगी...। मुझे लगा मैं किसी पिंजरे में बंद शेर के पास खड़ा हूँ.... जिसे पता है कि वह जब चाहे तब पिंजरा तौड़कर भाग सकता है.. इसलिए वह उस पिंजरे में खुश है... शांत है.. पूरियां बना रहा है। मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मै क्या करुं.. इसे पालतु बनाना मेरा भ्रम था.. यह कभी भी मेरा बनाया हुआ पिंजरा तोड़कर चली जाएगी। मेरे सपने... उनका क्या..? झूठे ही सही... पर मैंने उन्हें अपनी पूरी शिद्दत से देखा था... उन्हें मैं उनकी नीयती तक पहुंचाना चाहता था। मुझे कुछ हो रहा था.. मैं ऊपर से नीचे तक कांपने लगा।

’सुनों मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा।’
मैंने कुछ ऎसे कहा मानों मैं कह रहा हूँ कि मैं तुम्हें उड़ने नहीं दूंगा।
’क्या कह रहे हो तुम?’
’मैं तुम्हें उड़ने नहीं दूंगा।’
इस बार मेरे मुँह से उड़ना ही निकला.. पर मैं रोक नहीं पाया...। मैंने उसे बहुत कसकर पकड़ लिया...।
’अरे क्या कर रहे हो तुम... तेल गर्म है... जाओ यहाँ से...। अरे मुझे लग रही है। तुम... दूर रहो..।’

उसने मुझे धक्का दिया मैं फर्श पर आकर गिर गया। मुझे सब कुछ छूटता हुआ दिख रहा था.. मेरा सपना.. मेरा भविष्य...। मेरी आँखों में अजीब सी जलन हो रही थी जिसकी वजह से मेरी आँखों से लगातार पानी आ गिर रहा था। वह डर रही थी... वह डर के मारे सोफे के ऊपर चढ़ गई.. मैं अभी भी फर्श पर था। मुझे लगा कि वह सोफे के ऊपर से छलांग लगाएगी और उड़ जाएगी... मैं भूख़ी बिल्ली की तरह बस उसके फर्श पर गिर जाने का इंतज़ार करुंगा..। मैं अपनी पूरी ताकत से उठा और उसकी और झपट्टा मारा..। मैं उसे रोकना चाहता था। वह कुछ बड़बड़ाए जा रही थी पर मुझे बार-बार उसके उड़ जाने का डर था.. सो मैं बस उसके परों को ज़ख़्मी कर देना चाहता था। वह इस तरह मुझे छोड़कर नहीं जा सकती थी। कुछ देर की हथापाई में मैंने अपने सिर पर किसी कठोर चीज़ का प्रहार सा महसूस किया... शायद वह कुकर था... या कढ़ाई.... पता नहीं पर मैं बेहोश हो चुका था।

जब नींद खुली तो मैं अपने घर में अकेला था... वह कहीं भी नहीं थी। मैंने उसे बहुत ढ़ूढ़ने की कोशिश की पर वह उसके बाद मुझे कभी नहीं मिली...। मैंने अपने झूठे सपनों में उसे कुछ सालों तक फसाए रखा था... बस... या शायद वह मेरे झूठे सपनों के बारे में जानती थी पर उसे पैंतिस होने तक का वक़्त काटना था... सो वह मेरे झूठ के साथ बनी रही। मैं हमेशा भ्रम में ही था... कि वह मेरे प्रेम में धरेलू हो चुकी है... वह अपने सपनों से बाहर आ चुकी है.. और मेरे यथार्थ में जीने लगी है...। पर ऎसा नहीं था... वह हमेशा सपने में ही थी..। उसने एक बार कहा था कि ... ’जो सपना देखता है... वह कभी भी उड सकता है...।’ वह उड़ चुकी थी..।

यह बहुत पुरानी बात है..। आज रात सच में मैंने उसका सपना देखा था कि वह पहाड़ों में देवदार के एक वृक्ष पर बैठी मुझे देख रही है... जब तक मैं उसका नाम पुकारता वह उड़ चुकी थी... दूर पहाड़ों की ओर...।
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मानव कौल

Sunday, January 22, 2012

ज़िंदा कविता की तलाश ...



मन के बादलों में भरे कुछ एहसास
अद्रा नक्षत्र की बारिश की तरह बरसना चाहते हैं
किसी पत्ती पर
दूबों पर
नदी में सागर में
झोपड़ी पर ....
किसी चेहरे पर
किसी के बालों में सुगबुगाते हुए .... कविता बन उतरना चाहते हैं
किसी को इंतज़ार जो है पढ़ने का ...

रश्मि प्रभा


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ज़िंदा कविता की तलाश

बहुत दिनों से नहीं पढ़ी
कविता जैसी कोई कविता
वो कविता
जिसे पढ़कर लगे
मैं हो आया हूं
उन गली-कूचों में
जहां बसते हैं मिट्टी में सांस फूंकते लोग
जहां आज भी ठंडक देती है हवा
जहां नहीं भूले हैं लोग
मनुष्य होने का मतलब

कविता
जिसे पढ़ूं तो लगे
कि छू आया हूं उन संवेदनाओं को
जो अक्सर रह जाती हैं अछूती
आडम्बर परोसने की होड़ में
जो जुड़ी रहती हैं धरती से
और आकाश से करती हैं बात
हाथ बढ़ाकर सहारा देते समय
नहीं देखतीं जो दिन और रात

कविता
जो रची न गई हो
केवल रचे जाने के लिए
जो न तोड़े दम
कवि से आलोचक
आलोचक से किताब तक के सफर में
जो हो शाश्वत इस तरह
कि युगों के सीमाएं भी भूल जाएं अपने अर्थ

ऐसी कविता
जो न हो
आत्ममुग्धि के लिए बुना हुआ शब्दजाल
उस कविता के शब्द
अर्थ गढ़ते हों
और उन अर्थों में
जीवन के असल रंग झरते हों
जिसके शब्द सपनीले न हों बेशक
लेकिन सपनों की बात करते हों

कविता
जो पहुंचे उन तक
जिनकी वो बात करती है
ताकि लगे उन्हें भी
कि उनके दुःख-दर्द का है साझीदार कोई
पहुंच रही है उनकी पीड़ा
उन तक जो कहते हैं कि हमने
उठाया है अपनी कलम चलाकर
क्रांति लाने का बीड़ा

सच!
बहुत दिनों से
नहीं पढ़ी कोई ऐसी कविता
जिसे पढ़कर लगे कि
सचमुच पढ़ी है कोई कविता







अजय गर्ग

Saturday, January 21, 2012

बीज से फूल तक

अस्तित्व .... कौन चाहता है खोना
यह जीवन ही है खुद से खुद को देना
देकर खुद को पाना
अस्तित्व अपना बनाना ....


रश्मि प्रभा
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बीज से फूल तक


कृषि भवन के विशाल कक्ष में
शीशे के जार में बंद एक नन्हा सा बीज
था व्याकुल बाहर आने को
नयी यात्रा पर जाने को....
खरीदने की मंशा लेकर तभी आया एक किसान
तैयार थी माटी, रोपा गया वह बीज उसी शाम
तृप्त हुआ था बीज
पाकर सिंचन
और ऊष्मा धरा की
उठने को आतुर था
गगन और पवन के सान्निध्य में
मर मिटने को था वह तैयार
मिलाने पंच भूतों की काया पंच भूतों से
पर नहीं था तैयार उसका खोल
जो आज तक था रक्षक
बना था बाधक
कांप उठा वह
क्या इस बार भी
भीतर ही भीतर सूख जायेगा
नन्हा सा अंकुर
नहीं... पुनः नहीं
जाना ही होगा इस खोल को
ताकि एक दिन फूल बनने की
सम्भावना को तलाश सके बीज
एक नयी पीढ़ी को सौंप जाये अपनी विरासत
पूरी शक्ति से भेद डाला आवरण
आ ऊपर धरा के ली दीर्घ श्वास
अभी लंबी यात्रा तय करनी है
कितने मौसमों की मार सहनी है
कितनी हवाओं से सरगोशियाँ
तितली, भंवरों से
गुफ्तगू करनी है
वह उत्सुक है जीवन को एक बार फिर जीने के लिए
उत्सुक है हवा, जल और ऊष्मा को पीने के लिये
फूल बन कर अस्तित्त्व के चरणों में समर्पित होने के लिए
कैसा होगा वह पल जब
अपना सौंदर्य और सुरभि सौंप
बच जायेगा यह बीज उन हजार बीजों में
अस्तित्त्व भी प्रतीक्षा रत है
बनने साक्षी उस घड़ी का...

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Friday, January 20, 2012

पाप या पुण्य (लघु कथा)



पाप पुण्य की परिभाषा भी स्वार्थी होती है
रोग , बुढापा , मृत्यु -
सबसे अपना फायदा निकाल लेती है ...

रश्मि प्रभा

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पाप या पुण्य (लघु कथा)


चाचा राम खिलाड़ी अपनी बूढ़ी गाय को बुरी तरह खींचते हुए भागे जा रहे थे.
मैंने उन्हें रोककर पूछा, "चाचा इतनी जल्दी में कहा जा रहे हो?"
वह बोले, "अरे बेटी यह गाय बूढ़ी हो गई है जाने कब ऊपर चली जाए. अगर यह खूँटे पर ही मर गई तो पाप चढ़ेगा. सोच रहा हूँ कि बाजार में जाकर बेच दूँ."
मैं मन ही मन सोचने लगी, "अगर खूँटे पर इनकी गाय मर गई तो इन्हें पाप लगेगा और बाजार में इनकी गाय को खरीदकर जब कसाई काटेगा तो क्या इन्हें पुण्य मिलेगा?"


संगीता तोमर

Thursday, January 19, 2012

ये खोटे सिक्के ...



खोटे सिक्के रोबोट बनाते हैं
अब इन्सान की तलाश किसी को नहीं
रोबोट ही असली पहचान देते हैं
... आलोचना करो
या हंसो
खोटे का बोलबाला है ....


रश्मि प्रभा


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ये खोटे सिक्के


आदमी सिक्के को
सिक्के आदमी को
खोटा बनाते हैं।
वो एक दूसरे को
छोटा बनाते हैं।
और आजकल सिक्के
टकसाल में नहीं
आदमी की हथेली
पर ढल रहे हैं।
और बच्चे
मां की गोद में नहीं
सिक्के की परिधि में
पल रहे हैं।
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महेन्द्र श्रीवास्तव

Wednesday, January 18, 2012

दावा ...



तुम पास होते तो हो
पर मन में घुमड़ती बातें
क्यूँ रह जाती हैं दूर ...
तुम्हारे होने का विश्वास भी है
पर ये होठ अनबोले क्यूँ रह जाते हैं ?....


रश्मि प्रभा

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दावा ...

उँगलियों से लिपटे
उलझती ...
वक़्त की गिरह में
लिपटी कुछ यादें
और कुछ बातें
जो दावा करती है
तेरे बहुत करीब होने का
पर ...........
कभी पूछ नहीं पायी
तुमसे ......
वह छोटी छोटी बातें
जो अक्सर
बेफजूल हुआ करती है
कि ....तुम्हे क्या पसंद है ?
बरसात में भीगना ?
रोशनदान से छनती
आती रोशनी का
धीरे से गुदगुदाना
मुक्त गगन में
एक जुट कबूतरों के
झुण्ड का उड़ना
सर्दियों की सुबह की
गिरती ओस में भीगना
किस करवट सोना
और क्या भाता है तुम्हे
यूँ ही बेमतलब
मेरी तरह से ठहाके लगाना ?
सच कितनी छोटी छोटी बातें
कभी नहीं पूछ पाया
यह मन ....
जो तुमसे जुड़े रहने का
हर वक़्त दावा करता है ..!!!


रंजना [रंजू भाटिया]

Tuesday, January 17, 2012

धारावाहिक



ज़िन्दगी के परिधान एक से नहीं होते
न उसके डायलौग एक होते हैं
कभी खुद बदल देते हैं हम
कभी जाने अनजाने अपने बने निर्देशक ....


रश्मि प्रभा

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धारावाहिक


ज़िन्दगी रोज़ाना टेलीकास्ट होने वाला चौबीस घंटे का धारावाहिक है
यह टेलीकास्ट मेरे दिलो-दिमाग की स्क्रीन पे होता है
कभी कभार ही कुछ एपिसोड्स देखने लायक होते हैं
वरना..अक्सर वही घिसा पिटा
हर वक़्त ये प्रयत्न के कुछ हो ऐसा
कि
यह धारावाहिक बन सके देखने लायक
परन्तु
प्रयत्न..प्रतीक्षा का मज़ा ले लेता है
ज़िन्दगी के इस डेली सोप में हाथ पे हाथ धर
आराम कुर्सी पर बैठ पोपकोर्न खाते हुए
इस धारावाहिक की कड़ियाँ देखना ख़ास बुरा नहीं
बशर्ते यदि आप अच्छे अभिनेता हैं
और
खुद को मुख्य भूमिका में देख के बोर नहीं होते
तो
ये सारा जहान मंच है आपका
उछलिए कूदिये ठहाके लगाइए
और सोच के खुश रहिए की आप निर्देशक भी हैं इसके
पर मेरा यह भ्रम खंडित है
मैं ये स्वीकार करके जीता हूँ कि
एक कठपुतला हूँ मैं
किसी की उँगलियों में बंधी डोर से संचालित
निर्देशक कई और हैं मेरे
और वो सब मुझसे नाराज़ रहते हैं
क्योंकि मैं ज़िन्दगी के इस धारावाहिक में अच्छा अभिनय भी नहीं कर पाता..
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अश्विन

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण