ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

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Friday, May 11, 2012

क्‍या सारे वक्‍त बीत जाते हैं ?



समय कम हो अधिक हो
या गुजर जाए ....
कुछ भी महसूस हो
पर समय न कम होता है न अधिक
वह साथ रहता है ... गुज़र तो हम जाते हैं !!!

रश्मि प्रभा


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क्‍या सारे वक्‍त बीत जाते हैं ?

कभी-कभी ऐसा लगता है
कि वक्त बहुत कम है।
वक्त बहुत ज्यादा भी हो
तो भी
वक्त बहुत कम होता है
अगर आपने बहुत कुछ गलत कर रखा हो
आपको ढेर सारी नींद आती हो
और आपकी कोई इच्छा ना हो
कुछ भी सुधारने की।

वक्त बहुत कम होता है
जब पता चले
कि पिछले 30 बरस
बिना समझ में आये ही गुजर गये
और
बहुत घबराहट सी होती है
कि अगले 30 बरस तक भी
क्या समझ में आ जायेगा।

वक्त बहुत कम होता है
जब पता चले
ढेर सारा वक्त गुजर चुका है
उन यादों को उलटने पलटने में
जो राख ही हैं

तो चलो
अब
जबकि पता चल गया कि
वक्त बहुत कम है
तो
कोशिश करें
जाग जाने की
सपनों से बाहर आने की
बिना यह कहे
कि यह तो कल भी हो सकता है।

या तुम्हारा कोई सरोकार ही नहीं है
किसी भी वक्त से
जो गुजर गया उससे
जो गुजर रहा है, उससे या,
जो आने वाला है उससे
तुम्हें डर लगता है,
जीने से?

और
तुम नींद के बहाने
किसी मौत को महसूस करने की
कोशिश करते हो।
क्या तुम्हें पता है -
बेहोश लोगों को
मरने का भी पता नहीं चलता।

या तुम्हें
नींद में
सपनों में चलना-फिरना ही
हकीकत लगने लगा है।







Rajey Sha राजे_शा

4 comments:

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

वक़्त की बात करती हुई एक संजीदा रचना !

Vibha Rani Shrivastava said...

तुम नींद के बहाने
किसी मौत को
महसूस करने की
कोशिश करते हो....
नींद मौत का अभिनय ही तो होता है .... !!

वन्दना said...

गज़ब की संवेदनशील रचना

Priyankaabhilaashi said...

सुंदर विचार..!!

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण