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Thursday, April 19, 2012

मौत या मुक्ति

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सुना था वो चुपके से दबे पाँव आती है

पर बिन बताए साथ ले जाती है,पता न था।


सुना था शरीर जड़वत जिंदा लाश बन जाता है

आत्मा से शरीर को ये खबर न हो,पता न था।
सुना था सुंदर घना वृक्ष भी पल में सूख जाता है

पर इतनी तेजी से कि महसूस ही न हो,पता न था।

आँखों से नमी चली जाती-पथरा जाती हैं वो सुना था

पथराई पुतलियों में हजारों सवाल जिंदा हों,पता न था।

सब कह तो रहे हैं वो आई संग ले गई अपने़

वक्त से पहले ही ले लेगी वो जाँ,पता न था।









इंदु सिंह 


http://hridyanubhuti.wordpress.com/

9 comments:

सदा said...

सुना था शरीर जड़वत जिंदा लाश बन जाता है
आत्मा से शरीर को ये खबर न हो,पता न था।
सुना था सुंदर घना वृक्ष भी पल में सूख जाता है
पर इतनी तेजी से कि महसूस ही न हो,पता न था।
गहन भाव लिए ...उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति।

Maheshwari kaneri said...

Bhut hi yatharth aur jivan ke satya ko bataati sundar prastuti....

Vibha Rani Shrivastava said...

आँखों से नमी चली जाती-पथरा जाती हैं वो सुना था
पथराई पुतलियों में हजारों सवाल जिंदा हों,पता न था।

शरीर जड़वत ,जिंदा लाश की उपमा और दूसरा हो ही नहीं सकता ....

डा. अरुणा कपूर. said...

एक अनोखी रचना!...अनोखे खयालात...आभार!

vikram7 said...

आँखों से नमी चली जाती-पथरा जाती हैं वो सुना था
पथराई पुतलियों में हजारों सवाल जिंदा हों,पता न था।
गहन भाव

expression said...

वाह!!!!!!!!!!!!

अद्भुत रचना....

अनु

वन्दना said...

ये भी एक सत्य है …………सुन्दर भावाव्यक्ति।

संध्या शर्मा said...

मौत या मुक्ति कब मिलना है, सचमुच पता ही नहीं चलता, जीवन के अंतिम सत्य तक पहुचकर उसका अनुभव भी नहीं किया जा सकता न ही उसका वर्णन, यह भी एक विडंबना ही है... गहन भाव

संध्या शर्मा said...
This comment has been removed by the author.

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण