ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Sunday, April 15, 2012

वो निरीह ..



पर .... अस्तित्व यूँ मिटता नहीं
किसी में इतनी ताकत नहीं जो मिटा दे अस्तित्व को
क्षणांश को सब डगमगाते हैं
फिर अपने अस्तित्व को त्रिनेत्र बना
दुनिया को देखते हैं ...

रश्मि प्रभा

=============================================================
वो निरीह ..

कल देखा था मैंने उसे
वहीँ उस कोने में
बैठा था चुपचाप
मुस्काया मुझे देख
सोचा होगा उसने
कुछ तो करुँगी
बहलाऊँगी ,मनाऊंगी
फिर उठा लुंगी अहिस्ता से
हमेशा ही होता है ऐसे.
वो जब तब रूठ कर बैठ जाता है
थोडा ठुनकता है,
यहाँ वहां दुबकता है
फिर मान जाता है.
पर इस बार जैसे
कुछ अलग है
नहीं है हिम्मत मनाने की
जज्बा बहलाने का
स्नेह उसे उठाने का
इसलिए अभी तक वहीँ पड़ा है वो
कुम्हलाया,सकुचाया, हताश सा
मेरा अस्तित्व .
My Photo




शिखा वार्ष्णेय

18 comments:

M VERMA said...

इसलिए अभी तक वहीँ पड़ा है वो
कुम्हलाया,सकुचाया, हताश सा
मेरा अस्तित्व .
मनाना तो होगा ही ..
बहुत सुन्दर

रचना दीक्षित said...

अस्तित्व को बचाए रखना भी अब शगल बन गया जिंदगी में..

बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति.

Vibha Rani Shrivastava said...

"किसी में इतनी ताकत नहीं जो मिटा दे अस्तित्व को"

लेकिन .... अपनी सारी ताकत लगानी होगी अपने अस्तित्व को "निरीह" नहीं बनने देने में ...

mahendra verma said...

नहीं है हिम्मत मनाने की
जज्बा बहलाने का
स्नेह उसे उठाने का
इसलिए अभी तक वहीँ पड़ा है वो
कुम्हलाया,सकुचाया, हताश सा
मेरा अस्तित्व .

अस्तित्व पर एक नई कलात्मक दृष्टि।

ऋता शेखर मधु said...

हताश होते हुए भी अस्तित्व बचाना तो होगा...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...

Akhil said...

कुम्हलाया,सकुचाया, हताश सा
मेरा अस्तित्व

sundar bhavyavyakti...

Madhuresh said...

Bahut Sundar!!

Dr.NISHA MAHARANA said...

behad jaruri hai aisa karna bhi kabhi kabhi .....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

अद्भुत....
सादर आभार.

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

अच्छी रचना
बहुत सुंदर

अरूण साथी said...

ओह, क्या आवाज दी है आपने, अंदर तक शोर पहूंच गया.. बघाई।

shikha varshney said...

आप सभी का तहे दिल से आभार.

ktheLeo said...

वाह!

Real humble 'Self Portrayal'but my take on the same is:

"मेरे चेहरे पे पडी धूल से मायूस न हो,
मैं हसीं रुह हूँ, ये धूल हटा कर देखो।"

vandana said...

मेरा अस्तित्व .
मनाना तो होगा ही ..

बहुत सुन्दर

Vaanbhatt said...

अपने अस्तित्व को चैलेन्ज करते रहना चाहिए...अगर उसे जीवित रखना है...

vijay singh said...

अति सुन्दर , कृपया इसका अवलोकन करें vijay9: आधे अधूरे सच के साथ .....

वाणी गीत said...

ओह !

प्रतीक माहेश्वरी said...

आहा क्या बात है!

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण