ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


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Thursday, April 12, 2012

प्रश्नों के प्रतिउत्तर में प्रश्न ….

रंग बदलती दुनिया में, खुद को बदल न पाये हम

उलझी हुई उलझनों को और अधिक उलझाये हम

भैस बराबर अक्षर

फिर भी है वह ज्ञाता

रिश्तों के देहरी पर

अनुबंधों का तांता

भ्रमित करने के चक्कर में, खुद ही को भरमाये हम

उलझी हुई उलझनों को और अधिक उलझाये हम

नौ-नब्बे के चक्कर में

जम कर हुई उगाही

राह बताने को आतुर

भटके हुए ये राही

अस्तित्व खोखला इतना कि रह गए महज साये हम

उलझी हुई उलझनों को और अधिक उलझाये हम

परबिना परिंदा ये

गगन को चूम रहा है

आखेटक मन देखो

फंदा लेकर घूम रहा है

प्रश्नों के प्रतिउत्तर में प्रश्न, भौचक्का खड़े मुंह बाये हम

उलझी हुई उलझनों को और अधिक उलझाये हम !
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एम्  वर्मा 

7 comments:

वन्दना said...

बेहद गहन भावाव्यक्ति।

Vibha Rani Shrivastava said...

रवीन्द्र प्रभात जी की पारखी नज़र की दाद देते हुए .....
ये ....
रंग बदलती दुनिया में, खुद को बदल न पाये हम(आप)
इसलिए ....
प्रश्नों के प्रतिउत्तर में प्रश्न, भौचक्का खड़े मुंह बाये हम(आप)
और....
उलझी हुई उलझनों को और अधिक उलझाये हम(आप) .... !

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

anju(anu) choudhary said...

जरुरी नहीं कि जिंदगी सुलझ जाए ,सुलझाने से
हो गुलाबी हर सवेरा ,आँखे खुल जाने से ||....अनु

S.N SHUKLA said...

bahut khoobasoorat pravishti.

sushma 'आहुति' said...

अदभुत अभिवयक्ति....

M VERMA said...

धन्यवाद वटवृक्ष !

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण