ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


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वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Thursday, April 5, 2012

क्या पूरा संसार चाहिए ?




ग़ज़ल 
अभी आपको प्यार चाहिए
क्या पूरा संसार चाहिए?

जो भी बाँटा, मिला आपको
बातें और उधार चाहिए?

भाव हृदय का जो न समझे
तब उसको प्रतिकार चाहिए

मैं बोलूँ, वो सुनता जाए
श्रोता एक बीमार चाहिए

कितना और मनाऊँ तुमको
या फिर से तकरार चाहिए?

लोग बड़े रचना से होते
नहीं उम्र दीवार चाहिए

विदया देती विनय सर्वदा
छोड़ सुमन, अंगार चाहिए? 
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7 comments:

M VERMA said...

कितना और मनाऊँ तुमको
या फिर से तकरार चाहिए?

तकरार में आखिर क्या रक्खा है
उसको तो बस प्यार चाहिए
बेहतरीन गज़ल

dasarath said...

मैं बोलूँ, वो सुनता जाए
श्रोता एक बीमार चाहिए
वाह!!!!!बहुत सुंदर

वन्दना said...

वाह ………बेहतरीन प्रस्तुति।

डा. अरुणा कपूर. said...

बहुत सुन्दर गजल!...उत्तम प्रस्तुति!

क्षितिजा .... said...

विदया देती विनय सर्वदा
छोड़ सुमन, अंगार चाहिए?

waah ... kya baat hai ... !

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति

मुकेश पाण्डेय चन्दन said...

लोग बड़े रचना से होते
नहीं उम्र दीवार चाहिए

विदया देती विनय सर्वदा
छोड़ सुमन, अंगार चाहिए?
बहुत ही शानदार रचा है सुमन जी

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण