ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


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वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Friday, February 24, 2012

मेरा नाम



एक अदद नाम
एक पहचान खोजने की कोशिश में
कई उलझे चेहरे मिलते हैं
उकताए हुए कहते हैं -
अमां छोड़ो यार ... क्या करोगे जानकर !


रश्मि प्रभा

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मेरा नाम

कभी कभी
अन्दर से निकल कर
जब मैं
बाहर आ जाता हूँ
तो स्वयं को पहचान ही नहीं पाता हूँ
खो जाती है मेरी पहचान
वो जो
कभी तुमने
कभी औरों ने दी
मैं तो बस इसके उसके
मुंह को ताकता हूँ
और गुजारिश करता हूँ
मुझे देदो कोई नाम
जो सिर्फ मेरा अपना हो
और मैं
कभी स्कूल बस के पीछे भागता हूँ
कभी मोहल्ले की उस
कोने वाली लडकी के पीछे
और चांटे खाकर
थका हारा
किसी और के पीछे भागता हूँ
कालांतर में
आटा दाल के पीछे
और उसके बाद
भावनाओं के समुन्दर में
बच्चो की दया के पीछे
पत्नी भी घिसटती है साथ साथ
मै नाम पूछता हूँ
वो विद्रूप हंसी हंसती है
मगर मेरा नाम नहीं बताती
जानते हुए भी
मन ही मन
कई बार बुदबुदाती है
और अन्दर ही अन्दर कई बार बोलती है
खपच्चियों में कसा
एक नर कंकाल
जिसके सैकड़ों नाम है
मगर असल में कोई नहीं
नर कंकाल भी नहीं .




-कुश्वंश

12 comments:

ktheLeo said...

वाह! क्या खूब कहा आपने,

"रूह को नाम की ज़ेहमत न दो ये एहसान करो,

वन्दना said...

एक बेहद गहन और प्रभावशाली रचना सोचने को मजबूर करती है।

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर और सार्थक पोस्ट, आभार.

कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नवीनतम पोस्ट पर पधार कर अपनी अमूल्य राय प्रदान करें, आभारी होऊंगा.

संगीता तोमर Sangeeta Tomar said...

सुंदर रचना.....

सदा said...

बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

mridula pradhan said...

अमां छोड़ो यार ... क्या करोगे जानकर !kya baat hai.....aur uspar ye kavita,wah.

Anita said...

हमारा असली नाम क्या है इससे हम ही नहीं जानते तो दूसरा कैसे जानेगा...बहुत सुंदर कविता!

Vibha Rani Shrivastava said...

व्यक्तित्व के अनुसार नाम विरले देखने को मिलता है.... !!

Kailash Sharma said...

बहुत गहन और सुंदर प्रस्तुति...

Anupama Tripathi said...

दुनिया में रहते रहते शायद स्वयं को भूल जाते हैं ......खुद ही खुद को नहीं पहचानते ...
बहुत सुंदर रचना ...

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर
क्या कहने

Mamta Bajpai said...

वाह बहुत सुन्दर

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण