ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Saturday, February 11, 2012

टुकड़े- टुकड़े में बंटी मैं



रिश्ते थे या कर्तव्यों की हिदायतें
विभक्त सी मैं - खुद को भी अब ना पहचानूँ !


रश्मि प्रभा

==================================================================
टुकड़े- टुकड़े में बंटी मैं,

टुकड़े- टुकड़े में यूँ बंटी मैं,कि मिलता ही नहीं अब कोई भी सिरा
खोजती फिरूँ कब तक राहों में, कि कहाँ -कहाँ कतरा मेरे अस्तित्व का गिरा ,

जब भी बैठी जोड़ने टुकडो को, हर बार हुआ यूँ ही
ढूँढा एक टुकड़ा तो फिर न अगला सिरा मिला,

छलनी करती रही हर बार जाने कितनी वेहशी निगाहें जिस्मो- जान मेरा
न जाने कितनी बार मुझे उन दहशत के सायों ने आ घेरा

जो भी मिले यहाँ बनकर हिमायती, सब वो जिस्म के प्यासे थे
दिए थे जो गम के आलम में, झूठे सब वो दिलासे थे

कब तक सहती वार पर वार यूँ मैं ,की बिखरना ही था यूँ एक दिन
बिखरी इतने टुकडो में कि फिर न कभी सिरे से सिरा मिला............

कोशिश भी जब लाख की जोड़ने की तो
बस इक उथला सा चेहरा मिला ..........

-सोमाली

15 comments:

vidya said...

हर नारी मन की व्यथा है ये.

अति सुन्दर..

ktheLeo said...

जो भी मिले यहाँ बनकर हिमायती, सब वो जिस्म के प्यासे थे
दिए थे जो गम के आलम में, झूठे सब वो दिलासे थे

वाह!
"रूह के रिश्ते भी मुझे सालते रहे,
अपने हैं ये मेरे,ये भरम पालते रहे"

संजय भास्कर said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना...

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

.नारी का दर्द उभरती सुन्दर रचना..

Vibha Rani Shrivastava said...

कब तक सहती वार पर वार यूँ मैं ,की बिखरना ही था यूँ एक दिन
बिखरी इतने टुकडो में कि फिर न कभी सिरे से सिरा मिला............
***********************************
हिम्मत और हौसले की दाद देनी पड़ेगी ,दिल और दिमाग को झझकोर को रख दे , इतना सहने के बाद ,
***********************************
कोशिश भी जब लाख की जोड़ने की तो
बस इक उथला सा चेहरा मिला ..........

वन्दना said...

kya khaoon.........betreen .........nari man ke bhavon ka sundar chitran kiya hai.

Maheshwari kaneri said...

नारी मन की व्यथा ..यही नारी की कथा..

dr.mahendrag said...

JAB BHI BAITHIJODNE TUKDO KO HAR BAR HUA YUHI,
DHUNDHA EK TUKDA TO PHIR NA AGLA SIRA MILA

nari ki sahan sheelta ki marmik waytha

sushma 'आहुति' said...

गहन अभिवयक्ति..........

Kailash Sharma said...

बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर सृजन,बधाई.

कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" की नवीनतम पोस्ट पर पधारकर अपना स्नेह प्रदान करें.

अनुपमा पाठक said...

मर्मस्पर्शी!

Dr.Priya said...

कोशिश भी जब लाख की जोड़ने की तो
बस इक उथला सा चेहरा मिला ......
भीतर तक उतर जाने वाले शब्द...

mahendra verma said...

यह वटवृक्ष भाव-यात्रा में निकले पथिकों का रम्य आश्रय स्थल है।
सुंदर कविता।

रचना दीक्षित said...

नारी जीवन के जीवन की उहापोह का सुंदर विवेचन कविता के माध्यम से किया है सोमाली जी ने. इस सुंदर रचना के लिये वह बधाई की पात्र है.

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण