ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Friday, February 10, 2012

रंग बिरंगी चिड़िया एक दिन बोली मुझसे



चिड़िया की उड़ान
उसकी मीठी आवाज़
उसके रंग सबको दिखते हैं
पर उसकी भी अपनी व्यथा है -


रश्मि प्रभा

==================================================================
रंग बिरंगी चिड़िया एक दिन बोली मुझसे

रंग बिरंगी चिड़िया
एक दिन बोली मुझसे
निरंतर खूब लिखते हो मुझ पर
कभी मुझसे भी तो पूछ लो
क्या लिखना है मुझ पर ?
क्या सहती हूँ ? कैसे जीती हूँ ?
कैसे उडती आकाश में ?
आज मैं ही सुनाती हूँ
मेरी कहानी
पहले ध्यान से सुन लो
फिर जो मन में आये लिख लो
पेड़ पर टंगे कमज़ोर से नीड़ में
माँ ने अंडे को सेया
तो मेरा जन्म हुआ
जीवन लेने को आतुर
दुश्मनों से बचा कर
किसी तरह माँ ने
पाल पास कर बड़ा किया
मुझे सब्र का पाठ पढ़ाया
जब तक खुद को
सम्हाल नहीं सकूं तब तक
उड़ने को मना किया
पहले फुदकना सिखाया
कुछ अनुभव के बाद मुझे
उड़ना सिखाया
तिनकों से बने नीड़ में
आंधी,तूफ़ान,
भीषण गर्मी और शीत में
निरंतर जीवन जिया
नीड कई बार उजड़ा
माँ ने हताश हुए बिना
हर बार अथक परिश्रम से
नया नीड बनाया
सदा चौकन्ना रहने का
महत्त्व बताया
मुझे आत्म रक्षा का
उपाय सुझाया
अनुभव ना ले लूं जब तक
नीड़ से दूर जाने को
मना किया
माँ ने संतुष्ट रहना
सिखाया
अपने सामर्थ्य के अनुरूप
जीने का मार्ग दिखाया
माँ जो भी करती थी
उन्होंने मुझे भी सिखाया
अब ,एक बात तुम से भी
पूछ लूं
क्यों मनुष्य बच्चों को सब्र से
जीने के लिए कहता
परन्तु खुद बेसब्र रहता
संतान से
संयम रखने को कहता
खुद व्यवहार में उत्तेजित होता
अनेकानेक कामनाएं
रखता
पर निरंतर असंतुष्ट रहता
संतान को भी असंतुष्ट बनाता
सदा अनुभव की बात करता
स्वयं अनुभव हीन सा
काम करता
अपने सामर्थ्य को नहीं
पहचानता
सब कुछ पास होते हुए भी
होड़ में जीता रहता
अति शीघ्र हताश हो जाता
अगर लिखना ही है तो
यह भी सब लिखना
मेरे रंग और सुन्दरत़ा पर
सब लिखते हैं
तुम से प्रार्थना है
तुम तो मेरा सच लिखना
मेरे जीवन से कुछ
तुम भी सीखना

My Photo




डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"

13 comments:

Madhuresh said...

बहुत प्यारी कविता, और गहन संदेश भी!

अनुपमा पाठक said...

रंग बिरंगी चिड़ियाँ के सत्य का सुन्दर बयान!

Rajesh Kumari said...

Rajendra Nirantar ji ki ek alag si par vishesh prernadayak kavita.chidia ke madhyam se bahut hi saarthak baat kahi hai.

Vibha Rani Shrivastava said...

एक माँ की सच्ची तस्वीर बनाते-बनाते ,

इंसानों की कडवी फितरत दिखलाती रचना.... !

vidya said...

बहुत सुन्दर...
एक अनदेखा नजरिया...

वन्दना said...

सच बयान करती सुन्दर रचना

सदा said...

अक्षरश: सच कहती यह अभिव्‍यक्ति ... आभार ।

babanpandey said...

सुन्दर पोस्ट ॥ बधाई

इस्मत ज़ैदी said...

बहुत सुंदर !
चिड़ियों के माध्यम से मानवीय अधीरताओं और अन्यायों की बेहतरीन अभिव्यक्ति !!
बधाई हो राजेंद्र जी!

mridula pradhan said...

पर उसकी भी अपनी व्यथा है .....sabki apni-apni.

अरूण साथी said...

एक यथार्थ, जिन्दगी लाइव

Anupama Tripathi said...

सबकी अपनी अपनी व्यथा ...अपना अपना प्रारब्ध है ...
सुंदर रचना ...

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" said...

sabko bahut dhanywaad

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण