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Thursday, February 9, 2012

अपाहिज



क्यूँ गलत परिभाषा बनाते हो
कर्म से भागते हो तुम
और जो आधे शरीर से पूरे कर्म करते हैं
उन्हें अपाहिज कहते हो !!!


रश्मि प्रभा

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अपाहिज

वो मानव
जिसका कोई
अंग भंग हो
आम भाषा में
अपाहिज कहलाता है
पर मुझे नहीं लगता
कि भंगित अंग होने से
अपाहिजता का
कोई नाताहै ।
मैंने देखे हैं
ऐसे इंसान
जिनके नेत्र नहीं
वो सूंघ कर
काम चलाते हैं
जिनके हाथ नहीं
वो पैरों को हाथ बनाते हैं
और पैर विहीन
अपने कर से
चल कर जाते हैं ।
जिनके हाथ - पांव नहीं
वो धड़ को
इस्तेमाल में लाते हैं।
मैंने पैर की उंगली में
फंसे ब्रश से
चित्रकारी करते देखा है
एक हाथ से
सलाइयों पर
स्वेटर बुनते देखा है ।
फिर कैसे मान लें
कि ऐसे लोग
अपाहिज होते हैं ?

अपाहिज हैं वो लोग
जो मात्र सोच की
बैसाखी ले कर चलते हैं
और अपनी
अकर्मण्यता को
अपनी मजबूरी कहते हैं॥
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संगीता स्वरुप

26 comments:

अनुपमा पाठक said...

आपकी भूमिका और संगीता जी की कविता दोनों अनुपम हैं!

Vibha Rani Shrivastava said...

अपाहिज हैं वो लोग , जो मात्र सोच की ,
बैसाखी ले कर चलते हैं ,और अपनी ,
अकर्मण्यता को ,अपनी मजबूरी कहते हैं॥
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ऐसे सोच वालों को झंझकोर कर रख देगी.... !
तब शायद,शायद आखें खुलवा दे ये रचना.... !!

vidya said...

रश्मि दी आपने सच कहा...
सक्षम होकर कुछ ना करने वाला ही अपाहिज है..
सार्थक कविता है संगीता जी की और सटीक भूमिका..

सादर.

anju(anu) choudhary said...

सार्थक सोच के साथ ..बेहद सटीक शब्दों में अभिव्यक्ति ...

Kailash Sharma said...

अंतस को झकझोर देने वाली बहुत सटीक और प्रभावी रचनाएँ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रश्मि जी ,

आभार आपका ..मेरी इस सोच को यहाँ लाने के लिए ..

सभी पाठकों का शुक्रिया

ashish said...

सोच से अपाहिज होना ही समाज के लिए हानिप्रद है . अच्छा सन्देश देती कविता

Pallavi said...

aap dono ka combination hai ise to lajavaab hona hee tha :)

shikha varshney said...

धारा प्रवाह सटीक भावनाएं...अंतस तक झकझोर जाती हैं.हैट्स ऑफ टू संगीता जी.

Sadhana Vaid said...

बहुत सुन्दर संगीता जी ! आपकी रचना ने तो अपाहिजता की परिभाषा ही बदल दी ! वास्तव में अपाहिज वे ही लोग हैं जो शारीरिक रूप से तो सम्पूर्ण हैं लेकिन मानसिक रूप से लाचार, बेज़ार और अकर्मण्य हैं ! बहुत ही प्रेरक रचना ! रश्मि जी का आभार इसे हम तक पहुँचाने के लिये !

वन्दना said...

अपाहिज हैं वो लोग
जो मात्र सोच की
बैसाखी ले कर चलते हैं
और अपनी
अकर्मण्यता को
अपनी मजबूरी कहते हैं॥

सही कहा सोच अपाहिज होती है इंसान नहीं…………बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 10/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

सूत्रधार said...

बेहतरीन प्रस्‍तुति।
सुमन सिन्‍हा जी का परिचय देखें यहां ...

Madhuresh said...

अपाहिज हैं वो लोग
जो मात्र सोच की
बैसाखी ले कर चलते हैं
और अपनी
अकर्मण्यता को
अपनी मजबूरी कहते हैं॥

बहुत ही अच्छी और प्रेरक रचना!

M VERMA said...

अपाहिज हैं वो लोग
जो मात्र सोच की
बैसाखी ले कर चलते हैं
यकीनन ... अपहिजता अंग से ज्यादा सोच की होती है ...

sumukh bansal said...

बहुत ही अच्छी रचना!...

vandana said...

अपाहिज हैं वो लोग
जो मात्र सोच की
बैसाखी ले कर चलते हैं
और अपनी
अकर्मण्यता को
अपनी मजबूरी कहते हैं॥

वाकई सच कहा आपने

Anupama Tripathi said...

और अपनी
अकर्मण्यता को
अपनी मजबूरी कहते हैं॥

मन के चक्षु खोलती ...भूमिका और कविता ....
आभार आभार ....आप दोनों को ह्रदय से आभार ...!!

Swati Vallabha Raj said...

अपाहिज वो नहीं जिनके अंग-भंग हैं बल्कि अपाहिज वो है जिनकी मानसिकता कुंठित है|बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति...बधाई..

वाणी गीत said...

हौसलों से भरपूर इन लोगों को देखकर कई बार अपनी कमतरी का एहसास होता है !
प्रेरक और सार्थक रचना !

इस्मत ज़ैदी said...

बहुत बहुत अच्छी कविता है संगीता जी

अपाहिज हैं वो लोग
जो मात्र सोच की
बैसाखी ले कर चलते हैं
और अपनी
अकर्मण्यता को
अपनी मजबूरी कहते हैं॥

क्या बात है !

Geeta said...

bilkul sach or sahi kaha aapne

Dr.Nidhi Tandon said...

अपाहिज को सुंदरता से एवं सच्चाई से परिभाषित किया,आपने.

Rajesh Kumari said...

behtreen soch kash sabhi ki ho bhut prerna daai rachna.

Reena Maurya said...

व्यक्ति अपनी सोच से अपाहिज बनता है ..
बहुत ही सुन्दर सार्थक एवं सशक्त अभिव्यक्ति ....

प्रतिभा सक्सेना said...

बहुत सार्थक चिन्तन है -अपाहिज मानसिकता होती है ,मात्र शरीर नहीं !

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण