ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


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Tuesday, February 7, 2012

वे ठिठके पल...



हाथों में लम्हों की भरमार है
फिर कौन से चौकलेटी लम्हें
पीछे से आवाज़ दे रहे ...


रश्मि प्रभा

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वे ठिठके पल...

देर तक मुट्ठी में बंद, उस
चिपचिपी चॉकलेट का स्वाद
गेट से लौटती नज़र
घड़ी की टिकटिक और
कदमों तले चरमराते
सूखे पत्तों की आवाज़

वो बेख्याली में आ जाना
परेशान करती,
सूरज की किरणों के बीच
और मेरे चेहरे से उछल कर
तुम्हारे काँधे पर जा बैठना
खरगोश के छौने सा
उस धूप के टुकड़े का
जरा सी तेज आवाज
और हडबडा कर, उड़ जाना
उस पतली डाल से
झूलती बुलबुल का

नामालूम सा
अटका....पीला पत्ता
निकाल देना बालों से
अनजाने ही,ले लेना
भारी बैग...हाथों से

ठिठका पड़ा है वहीँ, वैसा ही सब

अंजुरी में उठा,
ले आऊं उन लमहों को
पास रखूँ
बतियाऊं उनसे, दुलराऊ उन्हें
पर वे उँगलियों से फिसल
पसर जाते हैं, फिर से
उन्हीं लाइब्रेरी की सीढियों पर

नहीं आना उन्हें,
इस सांस लेने को
ठौर तलाशती
सुबह-ओ-शाम में
नहीं,बनना हिस्सा
कल के सच का
झूठे आज में

सिर्फ
आती है,खिड़की से, हवा की लहर
लाती है
अपने साथ
हमारी हंसी की खनक
नल से झरझर बहते पानी में
गूंज जाता है,
अपनी बहस का स्वर
गैस की नीली लपट से
झाँक जाती है,
आँखों की शरारती चमक
सब कुछ तो है,साथ
वो हंसी..वो बहस...वो शरारतें
फिर क्या रह गया वहाँ..
अनकहा,अनजाना,अनछुआ सा
किस इंतज़ार में....
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रश्मि रविजा

16 comments:

Rajesh Kumari said...

vaah tareef ke liye kaun se shabd dhoondu.atiuttam.jidagi ke sabhi rang ek saath.

anju(anu) choudhary said...

अंजुरी में उठा,
ले आऊं उन लमहों को
पास रखूँ
बतियाऊं उनसे, दुलराऊ उन्हें
पर वे उँगलियों से फिसल
पसर जाते हैं, फिर से
उन्हीं लाइब्रेरी की सीढियों पर

वाह बहुत खूब ....जिंदगी में प्यार के हर रंग को ....हर मोड़ को शब्दों में ढाल दिया

vidya said...

जाने क्यूँ हर बीता हुआ हसीं लम्हा लौट आता है वर्तमान में..और दस्तक देता है यादों के दरीचों से..
बहुत सुन्दर..

वन्दना said...

कुछ रह ही जाता है अनछुआ सा ………सुन्दर प्रस्तुति।

Maheshwari kaneri said...

खूबसूरत सा प्यारा लम्हा..

ASHA BISHT said...

sundar bhaw....

Vibha Rani Shrivastava said...

अंजुरी में उठा,
ले आऊं उन लमहों को
पास रखूँ
बतियाऊं उनसे, दुलराऊ उन्हें
पर वे उँगलियों से फिसल
पसर जाते हैं, फिर से
अफसोस तो इसी बात का ,
शायद ही कोई होगा.... ?
जिन्हें ये नहीं सालता..... :(

ईं.प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति । बधाई ।
मेरी नई रचना में पधारें-
"मेरी कविता:आस"

sumukh bansal said...

i liked it from the very first line...
lagta hai jaise koi bhaut hi itminaan se jindgi ko dekh raha ho..
nice one...

Anita said...

पुरानी यादों को समेटना आसान है पर उन पलों को फिर से जीना मुश्किल ...सुंदर कविता !

sushma 'आहुति' said...

वो बीता हुआ पल जिसमे जिन्दगी रुकी सी लगती है.... बेहद उम्दा भाव......

rashmi ravija said...

आपलोगों को कविता पसंद आई...आप सबका बहुत बहुत शुक्रिया

इस्मत ज़ैदी said...

नहीं आना उन्हें,
इस सांस लेने को
ठौर तलाशती
सुबह-ओ-शाम में
नहीं,बनना हिस्सा
कल के सच का
झूठे आज में

bahut sundar !!
wo kahte hain n ki
"kabhi kisi ko mukammal jahan nahin milta"

Sadhana Vaid said...

नहीं आना उन्हें,
इस सांस लेने को
ठौर तलाशती
सुबह-ओ-शाम में
नहीं,बनना हिस्सा
कल के सच का
झूठे आज में
बहुत सुन्दर रश्मि जी ! ऐसे पल इतने मासूम, अनछुए और सुकुमार होते हैं कि वे अतीत के उस कोने में ही सुरक्षित रहें वही अच्छा है ! वरना आज की जद्दोजहद और खींचतान में बंटे हुए इंसान के वर्त्तमान से जुड कर उनका क्या हश्र होगा यह सोच कर ही डर लगता है ! बहुत ही प्यारी कविता ! बधाई !

दीपिका रानी said...

बहुत ही खूबसूरत.. शब्द चित्र

Dr.NISHA MAHARANA said...

नहीं,बनना हिस्सा
कल के सच का
झूठे आज में
waah....

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण