
प्यार के सिरे जहाँ रह जाते हैं
रश्मि प्रभा
Gargi Mishra
उनको जब भी पाना हो ... वहीँ जाना
जो बचपन के गलियारे में रह जाते हैं
उनको पाने के लिए गुड़िया घर के दरवाज़े खोलना ...
रश्मि प्रभा
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मैं वहीँ मिलूंगी... उसी नीले कुँए के पास
मैं वहीं मिलूंगी
जहाँ हम इमली के बीजों से चौघडी खेला करते थे ..
जहाँ मैं बेर तोडा करती थी और तुम अमरुद की डाल पे बैठ के मुझे देखा करते थे..
जहाँ मैं चम्पक की कहानिया पढ़ के तुम्हे सुनती थी और तुम सुन के ठहाके मारा करते थे...
जहाँ हम बैठ के सोचा करते थे की कंचों में तारे क्यूँ दिखाई देते हैं...
मैं वही मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...
मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ मखनू अपनी कटी हुई पतंग के मंझे मांगने आ जाया करता था ..
जहाँ मैं परेता पकड़ा करती थी और तुम पतंग उड़ाया करते थे..
जहाँ काकी तुम्हारी भूगोल की कापी और बेलन ले कर आ जाया करती थी..
जहाँ शाम के कोहरे में हम मुह से धुआं निकाला करते थे..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...
मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ हर इतवार को जुलाहे चिलम पिया करते थे..
जहाँ हर मंगल को सरजू पगलिया ढोलक बजाया करती थी..
जहाँ मैं अपनी ओढ़नी और तुम अपनी कमीज़ पे बने फूलों के रंगों को तितलियों के पंखों में ढूँढा करते थे...
जहाँ हरहु साऊ के कबूतर कुँए के चबूतरे पे पड़े गेहूं चुगते थे..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ..
मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ एक बार तुम बिना बताये मीना के साथ बेर तोड़ने चले गए थे..
जहाँ मैंने इस बात पे घंटों आँखें सुजायीं थी..
जहाँ तुमने मेरी कापी में गुलमोहर के फूल बनाये थे..
जहाँ सरजू पगलिया ने बड़े लाड से हमें कच्ची कैरियां दी थीं..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...
मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ दूर से रेलगाड़ी दिखाई देती थी और हम उसे देख के खुश हो जाया करते थे ..
जहाँ नीले कुँए में झाँक कर हम दोनों एक दूसरे का नाम जोर जोर से पुकारा करते थे ..
जहाँ मैंने तुमसे कहा था अब माँ मुझे सजने सवरने को कहती है..
जहाँ तुमने मुझे पानी वाले रंग से बिंदिया लगायी थी..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...
मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ शायद आज भी उस कुँए की दीवारों में हमारे नाम गूंजते होंगे..
जहाँ आज कोई बूढी पगलिया दिन में अमरुद बेचती होगी
जहाँ इमली के बीज अब पेड़ बन गए होंगे..
जहाँ काकी मखनू के लड़के को हमारी कहानियां सुनती होगी....
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास....
इमली और कंचे लाना न भूलना....
Gargi Mishra







20 comments:
कुछ यादें सहेजने के लिये ही होती हैं।
यादों में इमली का पेड़ और कंचे ..खूबसूरत अभिव्यक्ति
वाह बहुत खूब ....बचपन की यादे हमेशा साथ रहती हैं
हर मन में यादों का एक अनमोल खजाना है जो उसे जीवन के पथ पर पाथेय की तरह बल देता है...
यादें याद आती हैं
प्यार के सिरे जहाँ रह जाते हैं
उनको जब भी पाना हो ... वहीँ जाना
बेहतरीन प्रस्तुति
कल 01/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है, कैसे कह दूं उसी शख़्स से नफ़रत है मुझे !
धन्यवाद!
khubsurat yaad.........
Kuhuk kuhuk kar bachpan ki yaderuk jati neele kuen ke pas
MAI WAHI MILUNGI USI NEELE KUEN KE PAS
YADON KE KHOOBSURAT SAFAR PAR ACHHI ABHIWAKTI-
यादें तो यादें हैं जो भूलाये नही भूलती..बहुत सुन्दर...
अपने बचपन को याद करने का मौका मिला शुक्रिया
बेहतरीन!
सादर
यादें....
ये खजाना कभी लुटता नहीं..
सुन्दर रचना...
सुन्दर प्रस्तुति..
यादें जहाँ से चलती है , वही सबसे ज्यादा याद आती हैं !
खूबसूरत यादें !
आपके उत्कृष्ठ लेखन का आभार ।
यादों की उष्मा!! सुन्दर प्रस्तुति
बड़ी प्यारी रचना...
हार्दिक बधाई...
shiddat se saheji gayee yaden..
बेजोड़ भावाभियक्ति....
बचपन की स्मृतियाँ ही हैं जो अंतिम साँस तक साथ देती हैं. सुन्दर कविता....
haan shayad us neele kuyen ke paas zindagi raah dekh rahi ho, ek baar zaroor milna zindagi se yaadon se...bahut pyari rachna.
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