ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवयित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

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एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Thursday, January 26, 2012

फिर आ गया गणतंत्र दिवस


फिर आ गया
गणतंत्र दिवस
दिखलाने, बतलाने
सुनने-सुनाने
हालात, समस्यायें
उपलब्धियां गिनाने।
देखो… सुनो… पढ़ो… जांचो…
मगर
कुछ कहना मत।
सच!
क्योंकि सच कह दिया तो
गणतंत्र दिवस का अपमान हो जाएगा।
पड़ जाएगी मंद
मधुर ध्वनियां ढोलों की।
खुल जाएंगी गुत्थियां
नेताओं की पोलों की।
अपने ढोलों की पोल खोलना
किसने चाहा
कौन चाहेगा
अपनी खामियां
हर भ्रष्ट यहां छिपायेगा।
इसी छुपा-छुपी में इक दिन
सचमुच गणतंत्र छुप जाएगा।
इसलिए…
सुनो, पढ़ो और देखो
कुछ मत बोलो
एक बार फिर
गणतंत्र दिवस को।



कृष्ण कुमार भारतीय


शोधार्थी, हिन्दी विभाग,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र,हरियाणा
अनाज मण्डी, कलायत, कैथल (हरियाणा)

7 comments:

kshama said...

Sashakt rachana!

वन्दना said...

सभी को गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक बधाई

मेरे भाव said...

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना

vidya said...

सार्थक रचना..
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये

मनोज पाण्डेय said...

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना

ब्रजेश सिन्हा said...

हार्दिक बधाई

Mamta Bajpai said...

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं
व्यंग बहुत अच्छा है ......

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण