ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Saturday, December 31, 2011

मैं आत्म हत्या नहीं करना चाहता हूं?





आत्महत्या आसान नहीं .
लोग कहते हैं इसे कायरता - पर उत्तेजना की स्थिति हो या डूबते मन की स्थिति ,
यह आसान नहीं...





रश्मि प्रभा
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मैं आत्म हत्या नहीं करना चाहता हूं?


मरना कौन चाहता है?
किसे अच्छा लगता है
जीना, बनकर एक लाश।

करने से पहले आत्महत्या,
करना पड़ता है संधर्ष,
खुद से।

पर पाने से पहले
रेशमी दुनिया,
खौलते पानी में डाल देते है
कोकुन में बंद जमीर को।

महत्वाकांक्षा
परस्थिति
समय और
काल
के तर्क जाल में उलझ
आदमी
मारकर जमीर को
कर लेता है आत्महत्या,
और फिर
अपने ही शव को
कंधे पर उठाये
जीता रहता है
ता उम्र....

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अरूण साथी
http://sangisathi.blogspot.com/

Friday, December 30, 2011

ईश्वर अगर तुम हो





प्रभु तुम्हारे होने पर अविश्वास नहीं
पर जब जब ज़िन्दगी का रुदन सुनती हूँ
आतुर होती हूँ जानने को
तुम कहाँ हो !

रश्मि प्रभा








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ईश्वर अगर तुम हो

ईश्वर अगर तुम हो
तो लोग अपंग क्यों है?
कितनो की आँखों में रौशनी नहीं
उनके सपने बेरंग क्यों है?
क्यों कुछ मासूम
जिंदगी घुट घुट कर बिताते हैं
क्यों भोले लोग ही
अक्सर सताए जाते हैं
क्यों अनाज पैदा करने वाले किसान
भूख से मर जाते हैं
क्यों नेता देश को
नोच नोच कर खाते हैं
ईश्वर अगर तुम हो
तो मुझे बताना ज़रूर
क्योंकि मैंने सुना है
गलती केवल इंसानों से होती है

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रंजना
http://ranjanathepoet.blogspot.com/

Thursday, December 29, 2011

ठहरा हुआ सा कुछ





प्रेम को समझना आसान नहीं
इसमें लहरें आती हैं जाती हैं -
हर आवेग किनारों को छूना चाहती हैं
ये किनारों का मोह !
यदि किनारा जान ले
टुकड़ों में लहरों संग घुलता जाए
तो - न नदी अकेली होती है न सागर !

रश्मि प्रभा




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ठहरा हुआ सा कुछ


तरसती हूँ मैं
तुम्हारी आवाज के एक टुकड़े के लिए
जिसे तकिये तले रख
मुझे रात को नींद आ जाये

तड़पती हूँ मैं
अपनी खाली मुट्ठी में
तुम्हारे शर्ट पकड़ने को
थोड़ी देर ही सही

सिसकती हूँ मैं
तुम्हारे कंधे के लिए
कितने दिन कितनी रात
मुझे याद नहीं

अब जैसे आदत सी है
तुमसे नहीं मिलने की
तुम्हारा इंतज़ार करने की
जानते हुये कि आ नहीं पाओगे

टुकड़े टुकड़े सब
तुम्हें माँग ले जाते हैं मुझसे
तुम्हारी माँ
तुम्हारे ऑफिस के लोग
और हालात...

मैं रह जाती हूँ
दिन बीते
अपनी सूनी हथेली को देखती हुयी
मेहंदी की धुली हुयी लकीरों में
कहीं अपने सपने तलाशती हुयी

बस कुछ शैतान आंसू
आँखों में चले आते हैं
बदमाश बच्चों की तरह

मैं यादों के आँचल से
आँखें पोंछ लेती हूँ
और गांठ लगा देती हूँ ताकि भूल ना जाऊँ

My Photoयादों की गीली चुनरी ओढ़े
हर रात सो जाती हूँ
ये सोचते हुये

कि शायद कल तुम आओगे...

पूजा उपाध्याय
http://laharein.blogspot.com/

Wednesday, December 28, 2011

फ़ुरसत में ... मिली नसीहत, .. मुफ़्त में ?



एक नाम में तुम खुश न हुए
खोजते हो उपनाम
किसी काम को करने में
क्या है इसका काम ?



रश्मि प्रभा




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फ़ुरसत में ... मिली नसीहत, .. मुफ़्त में ?

किसी बड़े महान व्यक्ति ने कहा था, “नाम में क्या रखा है”। (किसने कहा, वह तो ठीक से याद नहीं, लेकिन यदि विद्वान और बुद्धिजीवी कहलाना है – तो कोई नाम तो लेना ही पड़ेगा) । शायद शेक्सपिअर ने कहा है। (लेने को तो मैं, बापू, बुद्ध या शास्त्री का नाम भी ले सकता था। पर यह कुछ इंडियन टाइप उक्ति हो जाती। फॉरेन टाइप उक्ति में वेट अधिक होता है, एक मार्केट वैल्यू भी होती है उसकी। ... और कौन वेरिफ़ाई करने जा रहा है कि शेक्सपियर ने कहा था या नहीं।) वैसे भी तुलसी, रहीम, प्रसाद,दिनकर को कोट करना ‘आउट ऑफ फैशन-सा’ हो गया है।

ख़ैर बात नाम की हो रही थी। जिस किसी भी विद्वान ने कहा हो, उनके समय में और आज के समय में बदलाव तो आ ही चुका है। एक नाम होता है और एक उपनाम। तब जो टी.एस. इलियट लिखते थे, तो नाम से अगर दुनिया जाने, न जाने, इलियट से जगत प्रसिद्ध तो हो ही गए, ना! विलियम को जाने न जाने शेक्सपियर को दुनिया जान गई, न! इसलिए कह दिया – नाम में क्या रखा है?

पर, आज इक्कीसवीं सदी के इंडिया में उपनाम ने काफ़ी झमेला खड़ा कर रखा है। यहाँ सारी पहचान, लगता है, उसी के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। एक सप्ताह पहले अपने गृह प्रान्त गया था। एक ज़मीन ख़रीदने की बात चल रही थी। कचहरी के बाबू ने मुझसे पूछ दिया, “आपका नाम?”

मैंने कहा, “मनोज कुमार।”

उन्हें संतोष नहीं हुआ, पूछा - “आगे ..”

मैंने कहा, “कुछ नहीं।”

वे फिर बोले, “कुछ तो होगा न ..?”

मैंने फिर कहा, “यही, और इतना ही है।”

वे बोले, “पर, नाम तो आपको पूरा बताना चाहिए।”

मैंने कहा, “पूरा ही बताया है।”

वे खीज गए, “अरे भाई! शर्मा, वर्मा, राय, प्रसाद, ... कुछ तो होगा ... सरनेम।”

मैंने समझाया, “भाई साहब! मेरा नाम तो मनोज कुमार ही है --- और वैसे भी – उपनाम में क्या रखा है?”

उन सज्जन ने ऐसी घूरती नज़र मुझपर डाली – जैसे वे रुद्र हों और अभी मेरी दुनिया भस्म कर देंगे।

तब मुझे लगा कि शायद इनके लिए उपनाम में बहुत कुछ रखा है।

इंसानी फ़ितरत ही यही है, – वह नाम कमाए न कमाए, उपनाम गँवाने से बहुत डरता है। यह हमारी कमज़ोरी है। इंसान आज इतना कमज़ोर हो गया है कि छोटी-छोटी चीज़ों से डर जाता है और बहादुर भी इतना है कि भगवान से नहीं डरता।

हाँ, -- मेरे अपने तर्क हैं। पर, आप मानने न मानने के लिए स्वतंत्र हैं। मर्ज़ी आपकी। पर, उससे पहले एक बार मेरी बातों पर ग़ौर फ़रमा के देखिएगा। आपने कभी किसी साहित्य, ग्रंथ आदि में किसी भगवान का उपनाम देखा है – राम प्रसाद, शंकर सिंह, विष्णु झा, सीता वर्मा, लक्ष्मी पांडे, -- हनुमान राम, --- नहीं न। और, वही इंसान, उसी भगवान की बनाई दुनियाँ को उपनाम लगाकर जाति आदि में बाँटने से नहीं डरता। तभी तो मैंने कहा था, छोटी-छोटी बातों से डरने वाला इंसान भगवान से भी नहीं डरता। तभी तो उन सज्जन ने अपने आग्नेय नेत्रों से मुझे इसलिए भस्म कर देना चाहा, क्योंकि उनके बनाए खाँचों के किस फ़्रेम में मैं फिट बैठूंगा – वे निर्धारित नहीं कर पा रहे थे।

ऐसे लोगों को पता नहीं किस शिक्षक ने शिक्षा दी। मुझे अपनी लाल आंखों से घूरकर नसीहत दे रहे थे कि तू अपने नाम के अंत में उपनाम लगा ले – वरना तेरा काम तो अटका ही अटका। अगर आपके नाम के अनुरूप दफ़्तर का माहौल है – तो आपका काम झट से हुआ समझिए। अगर माहौल विरोधी उपनाम वाला है – तो मामला रिजेक्टेड! पर, मेरे जैसे थर्ड ग्रेड की कैटेगरी वाले की हालत तो बद से बदतर हो जाती है। जिनके उपनाम ही न हों, उनकी तो फाइल न आगे बढ़ती है और न ही बंद होती है। उसकी उठा-पटक होती रहती है – कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में।

तीन दिनों की कोर्ट-कचहरी की भाग-दौड़ से कुछ हासिल हुआ हो या नहीं, इतनी तो सीख मुफ्त में लेकर ही लौटा – कि उपनाम में बहुत कुछ रखा है।

पुनश्च : हम इक्कीसवीं सदी में पहुंच गए हैं। दुनिया कहां की कहां पहुंच गई है! हमलोग जहां थे, वहीं स्थिर हैं। लगता है, हमलोग एक्सरसाईज़ करने वाली साइकिल पर सवार होकर पैडल मार रहे हैं, चक्का भी तेज़ी से घूम रहा है, लेकिन साइकिल जस-की-तस खड़ी है।






मनोज कुमार

Tuesday, December 27, 2011

प्रतीक्षारत तुलसी



तुम अपनी प्रतीक्षा की बात करते हो
तुम्हारे तो पाँव हैं
टहल सकते हो
दूसरी ठाँव पा सहते हो
लेकिन जीवन के असंतुलित भागदौड़ में
संस्कारों की भोर
सांध्य दीपक की प्रतीक्षा में
सूख रही है .... एक आँगन तलाश रही है !

रश्मि प्रभा

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प्रतीक्षारत तुलसी

तुलसी,
आज भी बिरवा होने का भ्रम पाले
आँगन में खडी़ है
प्रतीक्षारत
कि सुबह कोई पूजेगा /
अर्ध्य देगा / सुहाग लेगा
शाम कोई सुमिरन करेगा
संध्या के साथ वह भी पूजी जायेगी

अब,
सुबह से ही भूचाल आ जाता है
घर में
जो देर शाम तक
निढाल हो गिर जाता है बिस्तर में
अल्मारियों में टंगे हैंगर
इंतजार करते रह जाते है
कपड़ों का
सिर तलाशते रह जाते हैं
गोद
कोई रोता भी नही बुक्का भरके
किसी को याद नही आती
तुलसी
जो आज भी बिरवा होने का भ्रम पाले
किसी कोने में सूख रही है
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मुकेश कुमार तिवारी

Monday, December 26, 2011

दबी चिंगारी से कम नहीं ...



कभी शब्द छोटे छोटे नज़र आते हैं
पर इनके मायने
राख के ढेर में दबी चिंगारी से कम नहीं ...

रश्मि प्रभा
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क़ानून ...

हमें क़ानून का उतना डर नहीं है
जितना डर इस बात का है
कि -
तुम्हारे हांथों में क़ानून है !
न जाने कब
यह कह दो कि -
तुमने क़ानून का उल्लंघन किया है
और हमें फांसी चढ़ा दो !!

हे ईश्वर ...

हे ईश्वर ! हे अन्तर्यामी ! हे पालनहार !
कब तक -
तू यूँ ही मेरी परीक्षा लेता रहेगा ?
कब तक -
तू यूँ ही मुझे झकझोरते रहेगा ?
कब तक -
तू यूँ ही मुझे हार-जीत में उलझाए रहेगा ?
मुझे मालुम है कि -
मैं तुझसे जीत नहीं सकता हूँ, इसलिए
तू आज से -
मेरी परीक्षा लेना बंद कर दे !
मैं जान गया हूँ कि -
तू मेरे अन्दर ही बैठा हुआ है !
बस इशारा करते चल -
जैसा तू चाहेगा, वैसा मैं करते चलूँगा !!


महा-भारत ...

आज, कोई दुर्योधन नहीं है !
लेकिन
धृतराष्ट्रों की संख्या में -
गड़बड़ झाला है !
संख्या, गिनने में पकड़ से बाहर है !
पता नहीं क्यों ? कोई समझाए !!
ये कैसा महा-भारत है ??

अंगार ...

जिंदगी-नुमा
चिलचिलाती धूप में
इंसान -
लू की तेज लपटों में
चलते चलते
न जाने कब, कैसे
खुद ही
अंगार बन जाता है
और -
खुद ही जलता है
खुद ही तपता है
खुद ही सहता है
फिर भी -
अनजानी राहों पे
धीरे धीरे -
आगे बढ़ते रहता है ...
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श्याम कोरी 'उदय'

Friday, December 9, 2011

मन की किरचें



अन्दर कितना कुछ टूटता है , टूटता जाता है
उससे मन हटा के
हम खुद को वहम देते हैं - सब ठीक है
पर कई रातें अनमनी गुजर जाती है ...

रश्मि प्रभा
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मन की किरचें

क्या कभी मन की किरचों से दो-चार हुए हैं आप .. ?
मैं हुई हूँ .... और हर रोज़ होती हूँ
नन्ही - नन्हीं किरचें ... जिन्हें हम
अस्तित्वहीन समझ झुठला देते हैं
वो कब अंदर ही अंदर हमें लहू - लुहान कर देती हैं
हम जान भी नहीं पाते
पर जब भावनाओं का ज्वार - भाटा
पूरे वेग से हमें अपने नमकीन पानी में
बहा ले जाता हैं .... तब उन अस्तित्वहीन
किरचों का अहसास होता है हमें

क्यूँ नहीं उन्हें हम पहले ही बीन लेते .. ?
आखिर क्यूँ उन्हें हम अपने मन में जगह दे देते हैं .. ?
क्यूँ भूल जाते हैं कि पाहुना दो दिन को आये
तब ही तक भला लगता है
पर जब पावँ पसार डेरा जमा ले
तब घर क्या .. !! द्वार क्या .. !!
सब समेट कर ले जाता है - अपने साथ
और हम रीते हाथों द्वार थामे .
..... खड़े के खड़े रह जाते हैं !!




गुंजन अग्रवाल

Tuesday, December 6, 2011

मासूम अपराध...



हत्या चोरी झूठ की परिभाषा सब जानते हैं
चश्मदीद गवाह बदल जाते हैं
पर किसी मासूम की भूख से बेपरवाह
सब गुरु बन जाते हैं हैं ....

रश्मि प्रभा
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मासूम अपराध

छोटा सा एक बालक, भूख से व्याकुल, निरीह आँखों से ताकता, ललचाई नजरों से सड़क के किनारे स्टाल पर सजे चटपटे समोसों को देखता है| चटखा़रे भर खाते लोग तिरछी निगाहों से देख मुँह फेर लेते हैं| नन्हा बालक अपनी छोटी छोटी हथेलियाँ फैला पैसे माँगता है|
मिलती है झिड़की,
‘अबे! तेरे पढ़ने की उम्र है| भीख माँगता है, जा भाग|’
बेचारा बालक अपना सा मुँह लिए हथेलियाँ समेट लेता है| पेट की ज्वाला बढ़ती जाती है|
एकाएक वह झपट्टा मार एक समोसा लेकर भागता है|
‘अबे! तेरे पढ़ने की उम्र है,चोरी करता है|’
दो चार थप्पड़ गालों पर पड़ते हैं| समोसा जमीन पर गिर जाता है|
बेचारा बालक देखता रह जाता है और एक कुत्ता उसे ले भागता है|
रोता हुआ बालक स्टाल पर गंदी प्लेटें साफ करने लगता है|
दुकानदार चुपचाप देखता हुआ सोचता है, कुछ काम कर दे फ़िर समोसे दे दूँगा|
तभी एक जीप आती है| एक अधिकारी उतरता है और बाल श्रम के लिए दुकानदार को खरी खोटी सुनाता है|
बालक भूखा ही रह जाता है|
नन्हा बालक नहीं जानता है कि भीख माँगना अपराध है,चोरी करना अपराध है,बाल श्रम अपराध है| उसे तो सिर्फ भूख लगी थी|
ऋता शेखर 'मधु'

ऋता शेखर ‘मधु’

Monday, December 5, 2011

मुनिया: वक्त के आइने में



तिरस्कार भरे शब्द
ज़हर में पगे...
फिर भी एक आदत
हो ही जाती है मुस्कुराने की
व्यथा आँखों की कैसे लिखी जाए !....
रश्मि प्रभा
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मुनिया: वक्त के आइने में

1-अरे चुप
क्यों रोती हो
अब क्या खून पिओगी
पी लो
जी भर लो
जीभ इतनी लंबी थी
तो अमीर घर जाती
यहां क्यों टपक गई


2-नवाबजादी
बहुत हो गया
किताब छोड़ो
झाड़ू उठाओ
कलक्ट्री नहीं करनी
काम पर लग जाओ

3-बेहया
घर के अंदर आओ
पैर काबू में रखो
नहीं तो काटना होगा
बाप रे बाप
मेरे नसीब में ही रखी थी
कुलच्छिनी.............

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शरदिंदु शेखर

Sunday, December 4, 2011

काश कि होता सब वैसा


काश कि वो दिन कभी लौट कर आते 
बहाने से सही  उनका  साथ तो हम पा पाते 
उनकों हमारा और हमें  उनका  ख्याल तो होता 
काश कि वो वक़्त रुक जाता वही 
 उनकीं  बातें लगीदिल को छूने
हर बात उनकी क्यों लगती सही
मन करता बैठी रहूँ यूँ  ही करीब उनके 
फूलों की तरह वो सुंदरमोर- सा मनमोहक  
खीचनें लगी मैं उसकीं  ओर
वो महफिलों को खुशनुमा बनाता
हमने उसे  मार्गदर्शक भी चुना 
तरसती थी आँखे दीदार को उनके 
घंटो उन हसीं लम्हों का इंतज़ार होता  
काश कि वक़्त कोमैं रोक पाती 

जुदा हुई जब उनसे अचानक 
रोता था यह छोटा-सा दिल 
हर वक़्त उनके खयालों में डुबा रहता 
मन मेरा तब  पराया होने लगा 
मिलने  के उनसे बहाने तलाशने लगा 
महफिलों में होकर भी तन्हा सी हो गयी

काश कि वो लम्हे, बापस लोट कर आये 
काश कि ये, मेरे बस में होता 
काश कि वक़्त कोमैं रोक पाती

काश कि कोई लम्हा वो भी याद करे हमे 
काश कि मेरा इंतज़ार कुछ तो कम होता 
काश कि पहले की ही तरह, मुशकरा  पाती मै दुबारा 
काश कि उन लम्हों को मै ज़िन्दगी बना पाती 
काश कि कुछ तो मेरे बस में होता 
काश कि भुला पाउ मै उनको 
काश कि कोशिश ये सफल हो 
jyoti chauhan (Mobile)खुदा इसे तो मेरे बस में करना 
काश कि होता सब वैसा जैसा चाहता है  इंसान 
काश कि होता सब वैसा
                                                                               




ज्योति चौहान
संपर्क: बी-२७, सेक्टर-२२, नॉएडा-२०१३०१




परिचय :
नाम: ज्योति चौहान/जन्म स्थान :-डेल्ही ,मूलत: उत्तर प्रदेश की है/जन्म तिथि :- 12.6.1982./शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैंसाथ ही रसायन-शास्त्र में  स्नातकोतर,शिक्षा में स्नातक /पुस्तक- विज्ञानं तथा सुचना तकनिकी में स्नातक,और कंप्यूटर में पी.जी.डी.सी.ए/व्यवसाय :-  एक वहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं . नोएडा में अनुसंधान और विकास विभाग में एक वैज्ञानिक के रूप में काम कर रही हैं.

Saturday, December 3, 2011

वाह टमाटर ,आह टमाटर.



स्वाद को स्वाद ही रहने दो
टमाटर न बनाओ ...



रश्मि प्रभा

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वाह टमाटर ,आह टमाटर.*

जब हम छोटे थे तो टमाटर इतने नहीं चलते थे .हर सब्ज़ी का अपना स्वाद होता अपनी सुगंध,अपना रूप अपना रंग कहाँ ,अब तो सब टमाटर होता जा रहा है .

टमाटर की लाली बिना सब बेकार .

कोई चीज़ ऐसी नहीं दिखती जिसमें यह न हो .

कल एक पार्टी में जाना हुआ .मारे टमाटर के मुश्किल .

एक स्वाद सब में ,एक रंग टमाटर, टमाटर !

दाल में टमाटर, सूप में तो चलो ठीक है ,कभी-कभी तो डर लगता है पानी में भी नीबू के कतरे की जगह टमाटर कतर कर न डाल दिया हो .

छोले तो छोले ,.मसाले के साथ पेल दिए टमाटर .पर नवरात्र के प्रसादवाले छौंके हुए काले चनों मे भी घुस-पैठ .और लौकी की तरकारी पर हो गया अतिक्रमण, टमाटरों की हनक के नीचे उसका अपना स्वाद ग़ायब !

मुँगौरी की सब्ज़ी में देखो, तो टमाटर घुले ,पता ही नहीं लगता मुँगौरी है या कुछ अल्लम-गल्लम !

कल घर पर मैंने बिल्कुल सादे मटर छौंके चाय के साथ नाश्ते के लिए, और मैं ज़रा दूसरा काम करने लगी.

वन्या ,अपनी भतीजी से कह दिया ,'ज़रा मटर चला देना, मैं अभी आ रही हूं .'

आई तो कहने लगी ,'बुआ ,मैंने सब ठीक कर दिया !आप ने मटर में टमाटर डाले ही नहीं थे मैंने डाल कर पका दिया.'

'अरे तुमने कहां से डाल दिये टमाटर तो थे नहीं .'

'वो जो प्यूरी रखी थी वह डाल दी ,नहीं तो क्या मज़ा आता खाने में !'

हे भगवान ,बह गई मटर की मिठास ,अब चाटो टमाटर का स्वाद ,

क्या कहती उससे कुछ नहीं कहा .

निगलना पड़ेगा मजबूरी में, सोंधापन डूब गया प्यूरी में ! .

मारे टमाटरों के मुश्किल हो गई है ,कभी-कभी तो लगता है चाय में नीबू की जगह टमाटर न पड़ा हो .

अरे इस बार तो गज़ब हो गया .टमाटर का पराँठा .रायते में टमाटर ,चटनी में ,अरे आलू की टिक्की भी सनी पड़ी है.

कढ़ी में भी टमाटर. तहरी -खिचड़ी ,पुलाव कोई तो बचा रहे इसके अतिचार से .

अभी उस दिन अपनी राजस्थानी मित्र के यहां गई थी ,उन्होंने कोई की तरकारी बनाई थी .(जो चाहे सब्ज़ी कहे ,मुझे तरकारी कहना ज़्यादा स्वादिष्ट लगता है ).

परोस कर बोलीं, 'लो खाओ अपनी प्रिय चीज़ !'

चख कर मैंने पूछा,' यह क्या नई तरह की कढ़ी है?'

खा जानेवाली निगाहों से देखती हुई बोलीं , 'ये गट्टे तुम्हें कढ़ी लग रहे हैं ?'

'अच्छा गट्टे हैं ?'

मैं दंग रह गई बेसन के घोल में खटास घोल दी जाए -चाहे टमाटर की ही ,कढ़ी तो कहलाएगी !उसी में समा गए गट्टे ,क्या ताल-मेल है , और रंग ?पूछिए मत बेसन टमाटर का मिक्स्ड, दोनों का स्वाद चौपट.

और वे ऐसे देखे जा रही हैं जैसे मैं कोई अजूबा होऊँ .

अब कहाँ सुकुमार स्वर्ण-हरित भिंडियों का सलोना करारापन. वह देव दुर्लभ स्वाद !उद्दाम टमाटरी प्रभाव सब कुछ लील गया ,उस रक्तिम शिकंजे में सब जकड़े जा रहे है .

हे भगवान, यह .सर्वग्रासी आतंक हमारे सारे स्वाद ,सारे रंग मटियामेट कर के ही छोड़ेगा क्या !

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प्रतिभा सक्सेना.

Friday, December 2, 2011

ख़त को ख़त ही रहने दो



तुम्हारे आस पास की खुशबू होती है ख़त में
जीने दो इसे
भर जाने दो रगों में
इसे औपचारिक मत बनाओ ...




रश्मि प्रभा




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ख़त को ख़त ही रहने दो

ख्वाबों को देखता हूँ
सीढियों से उतरते
गुज़रते
दबे पाँव
नज़रें चुराते
गलियारों से
और उधर
तुम्हारे तकिये कि नीचे
वो लम्हा
चुराकर रखा
है अब तक
और लिफाफे में
इश्क के
हज़ारों जगरातें
जुगनू तितली बादल मंजर
छोड़ो ख्वाबों की बातें
तुम कहो
जूही के पौधे पर
फूल आ गए होंगे अब तो
क्या कहा
कैसे जाना
तुम्हारे ख़त में
खुशबू आती है उसकी
और हाँ
अगर हो सके
ख़त को ख़त ही रहने दो
ई मेल मत बनाओ
बेजान सी लगती हैं बातें
Santosh Kumar





संतोष कुमार

Thursday, December 1, 2011

दो कप चाय...अदरक वाली...



दो कप पानी गैस पर रखते हुए
तुम मेरे साथ होती हो
ज्यों ज्यों चाय का रंग गहराता है
अदरक की खुशबू आती है
तुम मुझमें गहराती जाती हो
चाय मैं पियूँ या तुम
बात एक ही होती है ......




रश्मि प्रभा


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दो कप चाय...अदरक वाली...

सोचना
आदत ही बुरी है
फिर सोचा कि शाम हुई
फिर
तुम ज़ेहन में आए
अब सोचता हूं
कि न सोचूं तुम्हे
और सोचता ही जाता हूं
तुम्हारे बाल
तुम्हारे होंठ
तुम्हारी हंसी
तुम्हारा स्पर्श
और सर्दी की उस शाम की
वो बारिश...
सोच रहा हूं बना लूं फिर
वो अदरक की चाय
दो कप..
एक मेरा, एक तुम्हारा
दोनो पी लूं फिर
तुम मुझसे अलग कहां हो...

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मयंक

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण