ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Wednesday, November 30, 2011

"पत्थर"



चोट लगी तो जाना
खुदा पत्थर क्यूँ हुआ ...
ताउम्र वो पत्थरों को इन्सान बनाने में लगा रहा ...




रश्मि प्रभा


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"पत्थर"

ता-उम्र पत्थरों को पूजा
पत्थरों को चाहा
ये जानते हुए भी
पत्थरों में दिल नहीं होता
पत्थरों के ख्वाब नहीं होते
पत्थरों में प्यार नहीं होता
कोई अहसास नहीं होता
पत्थरों को दर्द नहीं होता
कोई जज़्बात नहीं होते
फिर भी पत्थरों को ही
अपना खुदा बनाया
पत्थरों की चोट खा-खाकर
पत्थरों ने ही
हमको भी पत्थर बनाया
हर अहसास से परे
पत्थर सिर्फ़ पत्थर होते हैं
जो चोट के सिवा
कुछ नहीं देते
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वंदना

Tuesday, November 29, 2011

अन्धविश्वास



भरोसा खुद पे हो तो बात बनती है
तबीयत से कोई और पत्थर क्यूँ उछाले
पहल खुद से हो
तो ही अँधेरे से एक लकीर किरण की आती है ...




रश्मि प्रभा

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अन्धविश्वास

आस्थाओं के अँधेरे में
सहमी सहमी मानवता
पीढ़ियों की धरोहर
निरंतर गहनता !

आसान नहीं है
अंधेरों को स्वीकारना
बुद्धि को झुठलाना
चिंतन को नकारना !

ज्ञान विवेक शिक्षा
सब पर ताला एक लगा
एक पुरानी किताब की धूल का तिलक लगाना !

कितना मुश्किल है
अँधेरे में सीढियां उतरना
हाथ में एक नयी टोर्च
बंद कर के झुलाते हुए !

आस्थाएं जो अंधी हैं
आस्थाएं जो बहरी हैं
आस्थाएं जो गूंगी है
आस्थाएं जो बूढी हैं

आस्थाएं जो विवाह है
आस्थाएं जो दहेज़ है
आस्थाएं जो आग है
आस्थाएं जो सती है

आस्थाएं को तलवार हैं
आस्थाएं जो बलि हैं
आस्थाएं जो जाति है
आस्थाएं जो नर संहार हैं

आस्थाएं जो अछूत हैं
आस्थाएं जो भूत हैं
आस्थाएं जो डायन हैं
आस्थाएं छुआछूत है

आत्मा की आवाज को दबा चुकी आस्थाएं
मन की मुस्कान को खा चुकी आस्थाएं
ह्रदय की करुना को पी चुकी आस्थाएं
हिंसा के तांडव को जी चुकी आस्थाएं

अरे, कोई तो खड़ा हो सीना तान कर
आत्मा को पहचान कर , बुद्धि को मान कर
कोई तो उठाये एक पत्थर
और दे मारे अन्धविश्वास के दुर्ग पर


महेंद्र आर्य

Monday, November 28, 2011

दहेज़



समय के बढ़ते कदम
पिछले निशान का अर्थ बताते हैं ...

रश्मि प्रभा


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दहेज़


रमेश और सरोज की शादी को लगभग पाँच साल बीतने को आए थे। रमेश को अपने ससुर साहब से दहेज के लेन-देन को लेकर शिकायत थी । रमेश की माँ ने इसी बात की मन में गांठ बांध ली थी। शायद यही कारण था जिसके चलते उसकी सरोज से अक्सर छोटी छोटी बातों पर कहा-सुनी होती रहती थी। एक बार रमेश ससुराल जाकर शांतिनाथ जी को भला बुरा कहने लगा। शांतिनाथ जी ने चुपचाप ही सब कुछ सुन लिया, बिना एक शब्द भी बोले। इसके बाद कभी भी रमेश ने ससुराल की तरफ मुंह तक नहीं किया। सरोज अपने बूढ़े पिता से मिलने अकेली जाती और अकेली ही वापस लौट आती। उसे बहुत दुख होता जब वो अपने गाँव अकेले जाती । अड़ोस पड़ोस के लोग भी तरह तरह की बाते बनाने लग गए थे।

एक रोज़ अचानक ही शांति नाथ जी की मुलाक़ात रमेश से बाजार में हुई। रमेश ने शांतिनाथ जी के प्रति कुछ खास ध्यान नहीं दिया। शांतिनाथ जी ने रमेश से कहा " देखो रमेश बाबू, मुझे पता है की तुम मुझसे नाराज क्यों हो, और ससुराल क्यों नहीं आते हो। लेकिन मैं तुम्हें ससुराल में आने को कतई मजबूर नहीं करूंगा। लोग जो भी बाते बनाते हैं वो में चुपचाप सुन लूँगा। तुम्हारी शादी में मैंने तुम्हें जो सामान दिया वो मैने एक एक पाई जोड़कर मेरी बेटी की खुशी के लिए दिया था, वो कोई दहेज नहीं था। मैंने तुम्हें जो भी दिया वो केवल सामान ही नहीं था, मैंने तुम्हें अपनी बेटी भी दी है। सामान का क्या है बेटा वो तो एक दिन टूटना है। आदमी का प्यार ही होता है जो सदा बना रहता है। मेरी बेटी को मैंने बड़े प्यार से रखा है। तुम्हें अगर कुछ और चाहिए तो मुझे बता देना, मैं ला दूंगा, लेकिन मेरी बेटी खुश रहनी चाहिए। मेरा क्या है...अब मैं ज्यादा दिनों का मेहमान नहीं हूँ, तुम्हें तुम्हारी ज़िंदगी खुशी खुशी बितानी चाहिए। जिंदगी में जब कभी तुम्हें तुम्हारी गलती का एहसास होगा तुम बगैर किसी के समझाये मुझसे मिलने आओगे।" इतना कहकर शांतिनाथ जी आगे बढ़ गए। रमेश काफी देर तक खड़ा जाने क्या सोच रहा था।

अरविन्द जांगिड
जो कहता हूँ वही जीना चाहता हूँ। जीवन का एक ही उद्देश्य है "सत्य" के साथ जीना। शायद, मैं बड़ा लापरवाह हूँ, क्योंकि जो जीवन से भी बड़ा था, वो मुझसे गुम हुआ। एक साथ इतने रंगों से पुता हूँ कि रंगों कि पहचान ही धूमिल होने लगी। शायद इस घुटन को जीवन रहते मिटा सकूँ......।

Sunday, November 27, 2011

पहाड़ों की .. रानी



मैं ख्यालों की एक बूंद
सूरज की बाहों में कैद
आकाश तक जाती हूँ
बादलों के सीने में छुपकर
धरती की रगों तक बहती हूँ
कभी फूल, कभी वृक्ष में सौन्दर्य
कभी गेहूं - कभी धान में समाकर
गरीबों की थाली में सुकून बन
ईश्वर का मंत्र बन जाती हूँ ......... मैं ख्यालों की एक बूंद हूँ !

रश्मि प्रभा

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पहाड़ों की .. रानी

कुछ पीले ... कुछ गीले
कुछ हरे से हैं मेरे पहाड़
और इनकी पथरीली छतों पर सूखती हूँ मैं
हाँ कभी कभी एक टुकड़ा धूप बन जाती हूँ .. "मैं"

कभी इजा के बोलों में
कभी बाबा के श्लोकों में
कभी अम्मा की गाली में
तो कभी सरुली की ठिठोली में
ना जाने कितने सुरों में ढल जाती हूँ .. "मैं"

कभी खेतों में रोटी ले जाती हूँ मैं
तो कभी पुरानी उधरी ऊन से
मोजा बीनने लग जाती हूँ मैं
कभी पत्थरों से पटी छतों पर
बड़ी-पापड़ तोड़ने बैठ जाती हूँ मैं
ना जाने कितने रूपों में ढल जाती हूँ .. "मैं"

कभी आमा की कच्ची रसोई में
बड़ी निर्लजता से घुस आती हूँ मैं
तो कभी एक - वस्त्रा बन
बोदी का कर्त्तव्य निभाती हूँ मैं
कभी दही सने नीबुओं से
भाई बहनों को ललचाती हूँ मैं
तो कभी अन्नपूर्णा बन बिन बुलाये
मेहमानों की पंगत जिमाती हूँ मैं
ना जाने कितने रंगों में रंग जाती हूँ .. "मैं"

कभी ढोलक पर पड़ती चौड़े हाथों की थाप
तो कभी बेटी को विदा करती इजा का विलाप
हर रंग में .. हर रूप में .. हर सुर में .. हर ताल में
जब चाहूँ तब इन पहाड़ों की "रानी" बन जाती हूँ .. "मैं"
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गुंजन अग्रवाल

Saturday, November 26, 2011

प्यार के पोपकोर्न



प्यार के पोपकोर्न... बिल्कुल शुद्ध
कोई मिलावट नहीं - मस्त , कुरकुरे
पालने में झूलती लड़ियों जैसे
रश्मि प्रभा


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प्यार के पोपकोर्न


आजकल जहाँ से गुजरते है एक सोंधी सी खुशबू ठिठकने पर मजबूर कर देती है लगता है कहीं ना कहीं कुछ पापकार्न पक रहे है ये मक्के वाले नहीं जी ये तो प्यार वाले पापकार्न है ,छोटे शहरों में जो मोहल्ले की छतों पर,पार्क के कोनो में हुआ करता था आज वो हर सड़क और गली ,मॉल और पार्क ,कैफे और बाज़ार में सामने दिखता है ,मारल पुलिस प्लीज़ माफ़ करो मुझे तो ये गुलाबी मौसम बहुत पसंद है , जब हवा में सिर्फ प्यार छाया हो ,माना छतें और शामें आज की तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी से माइनस हो चुकी है पर दिल तो वही है ना और दिलदार भी साथ ही है, फिर ज्यादा कुछ करना भी तो नहीं है,बस एक कॉम्प्लीमेंट ,एक गुलाब ,एक कप चाय या छोटी सी वाक. सारा नज़ारा बदल देगा .सब सामने ही है पर रोज़ कि व्यस्तताओं नें आँखों पर काला चश्मा लगा दिया है

सिर्फ युवा ही नहीं आज हर जोड़ा खुलकर अपने प्यार का इज़हार करता है,चाहें जन्मदिन हो ,valentine डे या यूँही , आखिर बुराई क्या है ,जिस जीवन साथी ने हर सुख दुःख में आपका साथ दिया है अगर उसका हाँथ थाम कर दुनिया के नज़ारे देखने निकल पड़े तो भवें क्यों तिरछी क्यों की जाए,चाहें बरसात के मौसम में एक साथ भुट्टे का मज़ा लेना हो या खोमचे पर खड़े होकर चाट खाना और अपनी "प्रियतमा" को गोलगप्पे खाते हुए देखना, कुछ द्रश्य जो आज से कुछ साल पहले तक शायद दीखते नहीं थे आज आम है .ऐसे दृश्य हमें एहसास दिलाते है ज़िन्दगी सिर्फ भागने के लिए नहीं है ,कुछ पल सुकूं से गुज़ारने के लिए भी है,किसी रिश्ते में बंधने से पहले वो पल जैसे भी हो निकाले जाते थे और जिए भी जाते थे डर था ना अपने साथी को खोने का ,और आज जब वो साथ है तो वक़्त की कमी का रोना क्यों ? तीन घंटे पिक्चर हाल में गुजारना कुछ लोगों को पैसे या टाइम की बर्बादी लग सकता है पर कोई बताये सिर्फ साथ रहने के लिए अपनी व्यस्त शाम में से तीन घंटे कौन निकाल पाता है, कितने लोग है जो शाम को जल्दी आकर कहते है चलो तैयार हो जाओ कहीं घूम कर आते है , आसमान में बादल छाते है ,बरस जाते है जब तक हम आप बाहर निकलते है तब हमें सिर्फ कीचड और ट्रेफिक जाम याद आता है,
आज कोई बुजुर्ग जोड़ा जब मॉल में एक कॉफ़ी टेबल पर एक साथ सुकून से काफ़ी का मज़ा ले रहा होता है तो कितने युवा जोड़ों के दिल में यही उम्मीद जगाती है काश हमारा बुढ़ापा भी ऐसे हाँथ में हाँथ डालकर बीते एक दुसरे के साथ. अजीब बात है सबको रश्क है टीनएजर युवाओं से रश्क कर रहे है "जब हम Independent होंगे तो जैसे चाहें एन्जॉय करेंगे ", युवा अधेड़ों से रश्क करते है "यार हम भी सेटल हो जाए फिर लाइफ जियेंगे " और बुजुर्ग पीछे मुड कर देखते है और सोचते है काश ..थोडा वक़्त अपने लिए भी निकाला होता . बस यूँही फिसल जाते है हसीं लम्हें रेट कि मानिंद हांथों से
बड़ों के लिहाज के चलते ऐसे पलों का मज़ा सिर्फ पहाड़ों पर छुट्टियों के दौरान ही उठाते थे ना ,आज वीकेंड वही मौक़ा देता है हर हफ्ते आप पर है आप कितना एन्जॉय कर पाते है ,प्यार तब भी था प्यार अब भी है बस पहले जताते नहीं थे अब छिपाते नहीं. भले ही युवा जोड़ों को गुटर-गूं करते देख दिल में टीस उठे कभी उनको बे-शर्म भी कह दे पर वो टीस खुद वो लम्हे ना एन्जॉय कर पाने की होती है, तो रोका किसने है ज़िन्दगी तो यूँही भागती रहेगी जब तक जोड़ों के दर्द आपको धीमे चलने के लिए मजबूर नहीं कर देंगे क्या पता तब वक़्त हो ,पैसा हो पर साथी ना हो ,लम्हे तो चुराने ही पड़ेंगे ना ,



My Photoये प्यार के पोपकोर्न है आपके हाँथ थामने भर से खिल उठेंगे और अपनी सोंधी खुशबू से मजबूर कर देंगे कि बस एक रूमानी सा ब्रेक तो बनता ही है ना .



--
सोनल रस्तोगी

Friday, November 25, 2011

मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक

दर्द का क्या भरोसा,आ जाय जब तब
मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक
है बड़ी अनबूझ ये जीवन पहेली
है कभी दुश्मन कभी सच्ची सहेली
बांटती खुशियाँ,कभी सबको हंसाती
कभी पीड़ा,दर्द के आंसू रुलाती
क्या पता कब मौत आ दे जाय दस्तक
मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक
आसमां में जब घुमड़ कर मेघ छाते
नीर बरसा प्यास धरती की बुझाते
तो गिराते बिजलियाँ भी है कहीं पर
धूप,छाँव,सर्द ,गर्मी,सब यहीं पर
कौन जाने,कौन मौसम ,रहे कब तक
मनाते खुशियाँ रहो ,तुम जियो जब तक
कभी शीतल पवन जो मन को लुभाती
वही लू के थपेड़े बन है तपाती
धूप सर्दी में सुहाती बहुत मन को
वही गर्मी में जला देती बदन को
कौन का व्यहवार ,जाए बदल कब तक
मनाते खुशियाँ रहो तुम जियो जब तक

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

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जन्म-22-2-1942, शिक्षा-मेकेनिकल इंजिनियर(बनारस विश्वविद्यालय-1963), लेखन-गत 50 वर्षों से कविताएं,प्रकाशन-1-साडी और दाडी, 2-बुढ़ापा, निवास- नोएडा.

Thursday, November 24, 2011

एहसास



मैंने-
पहले भी तो बांटी थी
तुम्हारे अकेलेपन की शाम
जेठ की तपती धुप
और गर्म सांसें
तुम्हारे सुख के लिए ..

मगर-
तुम्हारी नर्म उंगलियाँ
नहीं खोल पायी थी
मेरे मन की कोई गाँठ
एक बार भी .

एक बार भी-
सर्पीली सडकों पर सफ़र करते हुए
तुम्हारे पाँव नहीं डगमगाए थे
और मैं-
पहाड़ों की तरह
पिघलता रहा सारा दिन/सारी रात
तुम्हारे साथ-साथ ...!

रवीन्द्र प्रभात 
www.parikalpnaa.com

Wednesday, November 23, 2011

अक्ल बड़ी या भैंस-एक कटाक्ष



दुनिया कहाँ से कहाँ आ गई
अक्ल के मारे सब ....... भैंस की तरह
एक प्रश्न ... पागुर किये जा रहे


रश्मि प्रभा

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अक्ल बड़ी या भैंस-एक कटाक्ष

जब मैं बच्चा था, शायद दूसरी या तीसरी कक्षा में पढता था तो एक दिन शिक्षक महोदय ने हम लोगों से एक प्रश्न पूछा-"अक्ल बड़ी या भैंस?" आपके शिक्षक महोदय ने भी आपसे यह प्रश्न कभी न कभी अवश्य पूछा होगा. नहीं?? कुछ प्रश्न होते ही हैं ऐसे जो हर बार पूछे जाते हैं क्यूंकि मेरी समझ में हर शिक्षक या इंसान ऐसे कुछ प्रश्नों का जबाब देकर छोटे नन्हे बच्चों के सामने अपनी तार्किक बुद्धि की तर्क देने की क्षमताओं को दिखाना चाहते हैं. यह इतर हो की भले ही उन्हें खुद बचपन में यह सवाल नहीं आता हो लेकिन वो कक्षा में इसकी झूठी डिंग हांक बच्चों के मन में थोड़ी इज्ज़त तो बतोड़ ही लेते हैं. (वह लोग मुझे माफ़ करें जिनकी भावनाओं को कोई ठेंस पहुची हो पर मेरे विचार में छोटे बच्चों को ऐसे ही लोग पढ़ाते हैं जिनके लिए आजीविका का और कोई साधन न हो, या यूँ कहिये आज हर वर्ग को कुछ ऐसे ही लोग पढ़ाते हैं.यह कितने शर्म की बात है!!)


तो हुआ यूँ की जब यह प्रश्न मेरे कक्षा मित्रों के आगे रखा गया तो कुछ ने अक्ल कहा और कुछ ने भैंस. अक्ल वाले वे थे जिनके माता पिता या किसी दुसरे परिचित ने उनसे पहले ही यह प्रश्न पूछ रखा था. भैंस वाले वह थे जिनका ऐसे प्रश्न से कभी कोई परिचय नहीं हुआ. या यूँ कहे उन अबोधों ने बिना अधिक सोचे समझे जैसा दीखता है वैसा ही बोल दिया. आखिर नज़रों के सामने भैंस के आगे अक्ल की क्या बिसात है!! दुर्भाग्यवस मेरा जबाब भी दूसरी श्रेणी में था.


फिर शिक्षक महोदय ने हमें बड़े प्यार से समझाया की बेटा भैंस कितनी भी बड़ी हो,कितनी भी मजबूत हो उसे अक्ल से आसानी से काबू किया जा सकता है. इसलिए अक्ल हमेशा भैंस से बड़ी होती है." अब भाई मैंने भले ही यह प्रश्न न सुना हो पर मैंने गाँधी के बारे में जरूर पढ़ा था. मैं खड़ा हो गया और बोला- "लेकिन भैंस में इतनी अक्ल तो होती ही है की अपनी रक्षा कर सके. एक जानवर जो जंगलों में आजाद घुमने के लिए पैदा हुआ, उसे जब गुलामी की बेड़ियाँ पहनाई जाती हैं तब भी वह कोई खास प्रतिरोध नहीं करती जबकि वह आराम से लोगों को मार सकती है. उसने खुद इसे चुना है जिसे आज हम अहिंसा का नाम देकर हर जगह बखान किये फिरते हैं. तो फिर हिंसा करने वाली अक्ल अहिंसात्मक भैंस से कैसे बड़ी हो सकती है?? मेरे विचारों में तो भैंस ही बड़ी होगी."


मेरा जबाब सुनकर बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े. शिक्षक महोदय ने कुछ क्षण कुछ सोचा फिर एक टका सा जबाब दे दिया" तुम्हारे ऐसे मंदबुद्धि बच्चों का कभी कुछ नहीं हो सकता". इस घटना को घटित हुए आज लगभग 13-14 साल हो चुके हैं. मैंने आज तक इतना कुछ पढ़ा पर फिर भी जब कभी उस सवाल के बारे में सोचता हूँ तो कोई सही जबाब नहीं मिल पता.


सोचिये जो अगर अक्ल बाकई बड़ी होती तो क्या आज यह नेता बड़े नहीं होते जो अपने अक्ल का इश्तेमाल कर दुसरो को आसानी से मुर्ख बनाते रहते हैं? क्या वह देश बड़े नहीं होते जिनके लोगों ने अपने अक्ल का इस्तेमाल कर पूरी दुनिया को गुलाम बना लिया? क्या वह लोग बड़े नहीं होते जिन्होंने अपने उन्नत अक्ल के बूते पूरी दुनिया में आतंवाद का साया फैला दिया?


मैं जानता हूँ की हम जब भी किसी से यह सवाल करेंगे तो जबाब हमेशा अक्ल ही होगी तो फिर इस पुरे सवाल-जबाब में गलती कहाँ है? शायद जो कोई मुझे इसकी गलती बता सके.


मेरे विचार
कुछ ज्यादा तो नहीं खुद के बारे में बताने को. एक आम भारतीय जिसके सर पर बहूत सारी जिम्मेदारियां हैं और इन्ही के तले दबे वह चाहता है की काश कुछ बदल जाये,इस देश की हालत सुधर जाये. मैं अपने विचारों को नित साझा कर लोगो को इस बदलाव के प्रति प्रेरित करना चाहता हूँ. मैं अपनी पहचान को जाहिर करना नहीं चाहता क्यूंकि इससे लोगों का आपकी तरफ देखने का नजरिया बदल जाता है. मैं बच्चन की दो पंक्तियाँ लिखना चाहूँगा- किसी विवशता में खुलता हूँ खुलने की साध तो नहीं है, जग में अंजाना रह जाना कोई अपराध तो नहीं है.
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Tuesday, November 22, 2011

इसी में खुश रहती हूँ



कुछ एहसास खरीदे नहीं जा सकते
उनको जीने के लिए एहसास होने चाहिए ...
रश्मि प्रभा

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इसी में खुश रहती हूँ

उसकी
चुनडी ,लहंगा
पुराना पैबंद
लगा होता था

पर उसे सूर्ख रंगों की
चूड़ियां
पहनने का शौक था

जब भी आती
कलाईयों में पहनी
चूड़ियों को खनकाती
रहती
एक बार रहा ना गया
उसे कह ही दिया

इतने पैसे चूड़ियों पर
खर्च करती हो

कुछ पैसे कपड़ों पर भी
खर्च कर लिया करो

उसका मुंह रुआंसा
हो गया

आँखें भर आयी

कहने लगी बाबूजी
चूड़ियां खरीदती नहीं हूँ

तीसरी गली वाले
बाबूजी की
चूड़ियों की दूकान है

वहां झाडू लगाती हूँ

काम के बदले में
पैसे की जगह चूड़ियां
लेती हूँ

रंग बिरंगी चूड़ियां
मुझे गरीबी का
अहसास नहीं होने देती

एक यही इच्छा है
जो पूरी कर सकती हूँ

निरंतर
इसी में खुश रहती हूँ
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डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"

Monday, November 21, 2011

नीड़ का निर्माण आधा



बया ने भी ले लिया प्रण
करेगा नीड़ का निर्माण खुद
देखेगा - राधा बया कब तक रूकती है ....!
ओह -

रश्मि प्रभा
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ऐसी मान्यता है कि नर बया घोसला बुनना शुरू करता है और आधा निर्माण हो जाने पर घोंसले के बाहर न्रत्त्य
करता है जब तक कि कोई मादा बया उसके न्रत्त्य पर रीझ कर उसके पास न आ जाए , फिर दोनों मिलकर
घर ( नीड़ ) पूरा करते हैं , उसके बाद बया उसमें अपने बच्चों को जनम देती है , इसे लेकर एक रचना :-


नीड़ का निर्माण आधा

कर नीड़ का निर्माण आधा
नर बया ने मौन साधा
न्रत्त्य कर कर थक गया तन
पर न आई एक राधा

उड़ गया फिर दुसरे वन
इक नया संकल्प लेकर
अब बुनूँगा नीड़ फिर से
स्वयं का सर्वस्व देकर
एक शंका घेरती मन
हो चुका इक बार ऐसा
बांसुरी कि तान पर भी
राधिका ने मौन साधा

पर न पीछे अब हटूंगा
नीड़ को आकार दूंगा
और अंतिम सांस तक मैं
आस उसकी में रहूँगा
है प्रणय में शक्ति कितनी
यह समय बतलायेगा
जब न्रत्त्य में लूंगा समाधि
ढूँढती आएगी राधा


बी एल गौड़

Sunday, November 20, 2011

बचपन की याद



बचपन ... सोचते ही
चकोर की तरह सर पीछे अटक जाता है
दिन दुनिया से बेखबर
तितलियों सा मन
काबुलीवाले की मिन्नी बन जाता है
फ्रॉक में ढेर सारा पिस्ता बादाम
और कभी न ख़त्म होनेवाली बातों संग
जाने कहाँ कहाँ घूम आता है ....



रश्मि प्रभा
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बचपन की याद

कितना खूबसूरत,अल्हड़ सा बचपन
कंचे की चट-चट में बीता वो दिन
जीत की खुशी कभी हार का गम
रंगबिरंगे कंचों में घूमता बचपन।
गिल्ली डंडे का है आज मैदान जमा
किसकी कितनी दूर,है यही शोर मचा
डंडे पे उछली गिल्ली कर रही है नाच
दूर कहीं गिरती,आ जाती कभी हाथ
भागते हैं कदम कितने बच्चों के साथ
गिल्ली डंडे में बीता है बचपन का राग।
कभी बित्ती से खेलते कभी मिट्टी का घर
पानी पे रेंगती वो बित्ती की तरंग
भर जाती थी बचपन में कितनी उमंग।
कुलेड़ों को भिगोकर तराजू हैं बनाए
तौल के लिये खील-खिलौने ले आए
सुबह-सुबह उठकर दिये बीनने की होड़
लगता था बचपन है,बस भाग दौड़
सारे खेलों में ऊपर रहा गिट्टी फोड़
सात-सात गिट्टियाँ क्या खूब हैं जमाई
याद कर उन्हें आँख क्यूं भर आई।
हाँ घर-घर भी खेला सब दोस्तों के साथ
एक ही घर में सब करते थे वास
हाथ के गुट्टों में उछला,वो मासूम बचपन
दिल चाहे फिर लौट आए वो मधुबन
तुझ सा न कोई और दूसरा जीवन
कितना खूबसूरत,अल्हड़ सा बचपन…







इंदु





Saturday, November 19, 2011

कुछ तो लगता है






ख़ुशी में भय
और झूठ में ख़ुशी ...
इस बदली हवा ने सारे मायने बदल दिए हैं
सब उल्टा पुल्टा ही अच्छा लगता है !!!

रश्मि प्रभा

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कुछ तो लगता है

त्योहारों से मुझे अब डर लगता है
बचपन बीता
सब कुछ सपना सा लगता है
रिश्ता एक छलावा लगता है..
छल-बल दुनिया के नियम
कौन किसका
सबको अब अपना अहम् अच्छा लगता है
ऊपर उठाना-गिराना अब यही सच्चा धर्म लगता है
खून-खराबा - अब यही धर्म सब को अच्छा लगता है
त्योहारों का मौसम है
सब को 'नमस्ते' कहना अच्छा लगता है
दुबारा न मिलने का यह संदेश अच्छा लगता है
राम-रहीम का ज़माना पुराना लगता है
बुजुर्गों का कुछ भी कहना बुरा लगता है
मारा-मारी करना अच्छा लगता है
खुदगरजी का जमाना अच्छा लगता है
नैनो से तीर चलाने का ज़माना अब पुराना लगता है
गोली-बारी चलाना अच्छा लगता है
भ्रष्टाचार और घूस कमाना अच्छा लगता है
बदलते दुनिया का नियम अच्छा लगता है
शोर-शराबा करना अच्छा लगता है
हिटलर और मुसोलिनी कहलाना अच्छा लगता है
हिरोशिमा की तरह बम बरसाना अच्छा लगता है
अब गांधी-सुभाष बनना किसी को अच्छा नही लगता है
शहीदों की कुर्बानी बेमानी लगती है
मैं ' आज़ाद हूँ
दुनिया मेरी मुट्ठी में है - कहना अच्छा लगता है
अपने को श्रेष्ठ ,दूसरे को निकृष्ट कहना अच्छा लगता है
चिल्लाना और धमकाना अच्छा लगता है
बेकसूर को कसूरवार बनाना अच्छा लगता है
न्यायालय में झूठा बयान देना अच्छा लगता है
औरों को सता कर 'ताज' पहनना अब अच्छा लगता है
झूठ को सच कहना अच्छा लगता है
दिलों को ठेस पहुंचाना अच्छा लगता है
किसी ने कहा-क्या शर्म नहीं आती
शर्म को ख़ाक करना अच्छा लगता है
अब यह सब करना ही अच्छा लगता है....





(पूनम माथुर)

Friday, November 18, 2011

मिट्टी और माँ



मिट्टी में खेलकर
माँ के आँचल में छुपकर
ज़िन्दगी कितने सारे मायने दे जाती है...

रश्मि प्रभा

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मिट्टी और माँ

घर के आँगन में
गाय है और उसका बछड़ा
बच्चे गाँव के तालाब से
काली मिट्टी ले आये हैं
खिलौने बना रहे हैं है....

मिट्टी की को देखते ही में अंदर
सालों से निस्तेज हुई गज़ब की चेतना
सतेज होती हैं ...

शायद मेरा पुनर्जन्म देख रहा हूँ मैं
उन्हीं बच्चों में
अपने गाँव के कुम्हार के घर हर शाम को
उसके ही बेटे के साथ मिलकर खेलना
उनके गरीब माता-पिता की थकान की
रेखाओं को आनंद में परिवर्तित करते हुए
उनके ही बेटे के साथ उस काली मिट्टी में
पानी डालकर अपने पैरों से गोंदना ...

आज बड़ों से सुनता हूँ, खुद सोचता हूँ
मिट्टी और इंसान की फिलसूफी को
क्या फर्क हैं दोनों में....?

शरीर की ईस मिट्टी में क्या हैं?
देह तो नश्वर है, गंदकी से भरा
हाड, मांस और चरम का पिटारा
जिसे खोलते ही दुर्गंध....

तो फिर-
इस शरीर से इतना मोह क्यूं?
सुंदरता और भोग का आनंद क्यूं?

शरीर हैं तो सबकुछ हैं
शरीर सुगंध, अस्तित्त्व और पहचान है
शरीर से मन है, विचार, व्यवहार और जीवन का आनंद
शरीर भोग है तो आध्यात्म भी हैं
तो शरीर अपवित्र क्यूं हैं?.....

मिट्टी पवित्र है
मिट्टी पार्थेश्वर है, अंतिम विराम है
मिट्टी से आत्मिक लगाव है
और मिट्टी हमारी माँ हैं !

और
माँ से पवित्र ब्रह्माण्ड में कोई नहीं है !!







पंकज त्रिवेदी
संपादक नव्या www.nawya.in

Thursday, November 17, 2011

परिवर्तन



परिवर्तन की हवा तो हर वक़्त चलती है
उपदेश देने से परे
हम अपने में सुधार लायें
तो सवेरा अपना होगा
आगत सुनहरा होगा ....
रश्मि प्रभा

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परिवर्तन

कहते हैं परिवर्तन संसार का नियम है..
दुनिया बदल भी रही है...निरंतर..
आज आज हम सभी चाहते हैं..
परिवर्तन हो सुधार हो.. रूपांतरण हो..
पर ये क्यों भूल जाते हैं हम
कि "परिवर्तन" और "सुधार" पृथक हैं..
दो अलग .. दो मुक़्तलिफ़ चीज़ें हैं.. !!!!
परिवर्तन.. "बदलाव" - अच्छे भी हो सकते हैं.. बुरे भी...
पर सुधार की दिशा नकारात्मक से सकारात्मक की ओर है.. !!
तमस से प्रकाश की ओर है...!!!
हम सब की "चाहना" है.. एक क्रन्तिकारी पैदा हो..
क्रांति लाये..
एक मसीहे की तलाश में हैं सब..!!
पर साथ ही ये "इच्छा" भी..
कि वो किसी और देश किसी और प्रान्त में पैदा हो...!!!
हमारे बच्चे..... हमारा भाई.. हमारे अपने.. तो बस अच्छे पद पे कार्यरत हो बस...!!!
शहीदों को आतंकवादी बताने वाले युग में जी रहे हैं हम सब !!!!!!!!!!
फिर एक प्रश्न का जन्म .....
कि कहाँ से फूटे लौ !!
कहाँ से निकले धारा...
कहाँ से हो शुरुआत..
कहाँ से ??
फिर मनः स्थिति उत्पन्न हो जाती है.. आरोप-प्रत्यारोप की..
पर सब अवगत है एक सनातन सत्य से..
आरोप-प्रत्यारोप से निष्कर्ष नहीं आता..!
बस .. घुमते रह जाते हैं परिधि पर..!!!
इसलिए ज़रूरी है स्वयं में सुधार लाना.."मैं" में सुधार लाना..
कहा ही गया है.. "मैं सुधर जाऊं तो जग सुधर जाए..!!
बूंद ही सही पर.. पर हैं तो गागर का ही अंश..
अगर हर "मैं" शुरुआत करे ..
तो निश्चय ही सुधार आएगा.. हम में.. सब में.. जग में...!!!


RJ Mohnish (मोहनीश वर्मा )

Wednesday, November 16, 2011

कुफ्र



प्रेम , आस्था - दोनों का संबंध आत्मा से है
आत्मा पर हुकूमत नहीं चलती
जब हुकूमत हो
तो फिर आत्मा कहाँ
प्रेम और आस्था कहाँ .........

रश्मि प्रभा




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कुफ्र

मैं प्रेम करना चाहता था ईश्वर से
बिना डरे बिना झुके
पर इसका कोई वैध तरीका स्थापित ग्रंथो में नहीं था

वहाँ भक्ति के दिशा–निर्देश थे
लगभग दास्य जैसे
जिन पर रहती है मालिक की नजर

मेरे अंदर का खालीपन मुझे उकसाता
उसकी महिमा का आकर्षण मुझे खींचता
जब-तब घिरता अँधेरे में उसकी याद आती आदतन
मैं समर्पित होना चाहता था
अपने को मिटाकर एकाकार हो जाना चाहता था
पर यह तो अपने को सौंप देना था किसी धर्माधिकारी के हाथों में

मैंने कुछ अवतारों पर श्रद्धा रखनी चाही
कृष्ण मुझे आकर्षित करते थे
उनमें कुशल राजनीतिज्ञ और आदर्श प्रेमी का अद्भुत मेल था
पर जब भी मैं सोचता
भीम द्वारा दुर्योधन के टांग चीरने का वह दृश्य मुझे दिखता
पार्श्व में मंद –मंद मुस्करा रहे होते कृष्ण
मुझे यह क्रूर और कपटपूर्ण लगता था

उस अकेले निराकार तक पहुचने का रास्ता
किसी पैगम्बर से होकर जाता था जिसकी कोई-न-कोई किताब थी
यह ईश्वर के गुप्त छापेखाने से निकली थी
जो अक्सर दयालु और सर्वशक्तिमान बताया जाता था
और जिसके पहले संस्करण की सिर्फ पहली प्रति मिलती थी
इसका कभी कोई संशोधित संस्करण नहीं निकलना था
शायद ईश्वर के पास कुछ कहने के लिए रह नहीं गया था
या उसकी आवाज़ लोगों ने सुननी बंद कर दी थी

उससे डरा जा सकता था या डरे-डरे समर्पित हुआ जा सकता था

अप्सराओं से भरे उस स्वर्ग के बारे में जब भी सोचता
मुझे दीखते धर्म-युद्धों में गिरते हुए शव
हिंसा और अन्याय के इस विशाल साम्रज्य में
जैसे वह एक आदिम लत हो

मठ और महंतो से परे
उस ईश्वर से प्रेम करने का क्या कोई रास्ता है
और क्या उसकी जरूरत भी है

अपने श्रम के अतिरिक्त क्या चाहिए मुझे ?

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अरुण देव

Tuesday, November 15, 2011

पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं....



दिन किस कदर बदल गए
तेरी खुशबू के बगैर
पंछी भी उदास हो गए ...


रश्मि प्रभा
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पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं....

ज़िक्र होता नहीं जवानों में,
लोग गिनने लगे सयानों में.

होगा अपना भी खरीदार कोई,
सज गए हम भी अब दुकानों में.

वो मोहब्बत नहीं मिलेगी कहीं,
जो मोहब्बत है माँ के तानों में.

एक कमरे का घर तो बेच दिया,
कई कमरे हैं अब मकानों में.

इश्क का कारोबार चल निकला,
प्यार बनता है काखानों में.

ज़िक्र दुश्मन का कर रहे हो तुम,
नाम मेरा भी है बयानों में.

फिर बहाना करो ना आने का,
इश्क जिंदा है बस बहानों में.

पंछियों ने इन्हें छुआ भी नहीं,
तेरी खुशबू कहाँ थी दानों में.

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अखिल 

Monday, November 14, 2011

छूटना...




















किस मंजिल तक पहुंचना है
सब तो छूट जाना है ....
तेजी से छूटते रास्ते हँसते हैं
रास्तों के संग मैं भी हँस लेती हूँ .....

रश्मि प्रभा


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छूटना...


यात्राओं में सबसे सुन्दर क्या लगता है? ये मैंने अपने आपसे पूछा. एक चुप्पी जो मेरे ही भीतर थी, उसने भीतर ही भीतर चहलकदमी शुरू कर दी. जवाब जल्दी ही मिल गया. छूटना...मुझे यात्राओं में छूटना अच्छा लगता है. घर से छूटना, रिश्तों से छूटना, शहर से छूटना, रास्ते में मिलने वाले पेड़, पौधे, खेत, जानवर, नदी, पहाड़ सबका छूटना. यात्राओं की मंजिल का तय होना ज़रूरी नहीं लेकिन उस मंजिल का भी छूटना तय है. मै छूटती हुई चीज़ों को प्यार से देखती हूँ. बहुत प्यार से. आने वाली चीज़ों का मोह छूटने वाली चीज़ें अक्सर कम कर देती हैं. यूँ भी जो चीज़ छूट रही होती है उसका आकर्षण बढ़ता ही जाता है. वो खींचती है अपनी ओर. यही जीवन का नियम है. इस छूटने में एक अजीब किस्म का सुख होता है.जिस चीज के प्रति आकर्षण बढ़ रहा हो, उसका छूटना जीवन का सबसे सुखद राग है. जिसे हम अक्सर विषाद या अवसाद का नाम देते हैं असल में जीवन वहीँ कहीं सांस ले रहा होता है.

होने और न होने के बीच एक जगह होती है. जैसे आरोह और अवरोह के बीच. जैसे स्थायी और अंतरे के बीच. जहाँ हम राग को खंडित किये बगैर साँस लेते हैं. इन्ही बीच के खाली स्पेस में छूटने का सुख रखा होता है. अगर रियाज़ में जरा भी कमी हुई तो वो खाली स्पेस जहाँ छूटने का सुख और सांस लेने की इज़ाज़त ठहरती है वो जाया हो जाती है. मैं इस स्पेस में हर उस सुख को उठाकर रख देती हूँ, जिससे छूटना चाहती हूँ. इसके लिए यात्राओं में होना ज़रूरी नहीं सम पर होना ज़रूरी है. यात्रा इस सम पर होने को नए अर्थ देती है. जीवन को समझने का नया ढंग. ओह, मैं भटक गयी शायद. मैं छूटने की बात कर रही थी. हाँ तो मुझे जवाब मिला कि मुझे छूटना पसंद है यात्राओं के दौरान. जीवन यात्रा हो एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा.

सफ़र मुझे ट्रेन से किया हुआ ही पसंद है. दरवाजे पर खड़े होकर घंटो छूटते जा रहे संसार को देखना. हवा को मुठ्ठी में कैद करने की कोशिश करना और उसका लगातार छूटता जाना. ये छूटना छू जाता है दिल को. कभी कभी लगता है हमें जिन्दगी का ककहरा गलत पढाया गया. हम चीज़ों को पाने में सुख ढूँढने लगे, और उसके खोने में दुःख महसूस करने लगे. लेकिन इसके उलट की स्थिति भी कम आनंददायक नहीं थी. बस कि हम उस आनंद को जीना नहीं सीख पाए. जीवन के सफ़र में हर छूटती हुई चीज़ को याद करते हुए लगा कि कितना प्रेम था उन चीज़ों से जो छूट गयीं, उन लम्हों से जो छूट गए, वो लोग जीवन में आते आते रह गए. वो रह जाना, वो छूट जाना ही सुख कि ओर धकेलता है. मिल जाना या पा लेना सुख के प्रति विमुख होना है. तलाश है नए सुख की...मैंने छूटना स्वीकार किया, उसके सुख को सिरहाने रखा और महसूस किया कि हर उलझन से, हर दुविधा से, हर मुश्किल से छूटती जा रही हूँ. ट्रेन चलती जा रही है और मै खुद से भी छूटती जा रही हूँ. बस एक चाँद कमबख्त छूटता नहीं साथ दौड़ता रहता है...मै मन ही मन सोचती हूँ तू मेरा कितना भी पीछा कर ले बच्चू, भोर की पहली किरण के साथ तू भी छूट ही जायेगा. अचानक घडी पे निगाह गयी...सुबह सर पर खड़ी थी. अब चाँद के भी छूटने का समय आ गया था. एसी कम्पार्टमेंट का नीला पर्दा हटती हूँ और छूटते हुए चाँद को हसरत से देखती हूँ...वो मुझे देखकर मुस्कुराता है और बाय कहता है. ठीक इसी वक़्त सूरज की पहली किरण का जन्म होता है.

एक दोस्त की बात याद आती है अगर कुछ छूटता है तो नए के लिए स्पेस बनती है...इसलिए छूटना अच्छा ही होता है...वैसे इस जीवन को जिससे इतना लाड लगाये बैठे हैं इसे भी तो छूटना ही है एक दिन...

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प्रतिभा कटियार 

Saturday, November 12, 2011

"एक बदसूरत सच जिंदगी का"
















सबसे बड़ा पाचक
नींद की गोली
- दूसरे की आलोचना , सिर्फ आलोचना !
अपनी ज़िन्दगी सबको चमकती सफेदी लगती है
रश्मि प्रभा



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"एक बदसूरत सच जिंदगी का"

सुनो बहन आज उसकी लड़की बाईक से एक लड़के के साथ गयी
मिसेज वर्मा ने धीमे से फुसफुसाया
मिसेज शर्मा को समाचार से अवगत कराया .
हर घटना का आदान प्रदान यहाँ
अक्सर इसी प्रकार होता है
हर समाचार से हर एक इंसान
आपस में बात कर परिचित होता है .
किस घर में आज क्या बना है खाने में ,
कहाँ आपस में किससे किसका झगडा हुआ,
किस लड़की का किस लड़के के साथ ,
कहाँ कहाँ, कब-कब कोई लफड़ा हुआ .
कहते है सब फिर यही समाज है ,
इसी प्रकार से घटनाओ को ,
सब तक पहुंचाना इसका कामकाज है .
फिर क्या हुआ इस समाज को?
सात माह तक वो बंद रही घर में
पल –पल उनका अंतर्मन रोता रहा ,
समाज सारा जो हर घटना को
नमक मिर्च लगा सब तक पहुंचाता है,
अनजान बना कहाँ सोता रहा ??
लगभग २१० दिन तक पडोस को
पड़ोसी की कोई खबर नहीं मिली ,
न कोई जुबान पांच हजार चालीस घंटे तक
इस घटना के बारे में किसी के सामने हिली .
लगभग तीन लाख दो हज़ार चार सौ मिनट
वो पल-पल खुदकुशी कर रही थीं,
अपने ही घर में अपनी कब्र बनने का,
इंतज़ार वो दो बहनें कर रही थी .
फिर अचानक क्या हुआ था अब ,
जो घटना सबके सामने आ गयी,
लगभग एक करोड इक्यासी लाख चवालीस हज़ार उन,
पलों से सडती उनकी जिंदगी की गंध ,
पडोसी की नाक से टकरा गयी .
अब खुद का रहना इस बदबू में
जब सहन करना मुश्किल था ,
तब अपना ये तथा कथित समाज
एक बार फिर से जाग गया ,
उनकी ऐसी बदतर हालत के बारे में ,
तब हर एक पडोसी जान गया .
उनकी हिम्मत भी तो जैसे टूट चुकी थी
बड़ी बहन की सांस भी अब छूट चुकी थी,
अंतिम सांसे लेती लाशो को अब
अस्पताल पहुँचाया गया था ,
टीवी चेनलों से यह खबर प्रसारित कर
सोते समाज को फिर जगाया गया था .

sakhi with feelings

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण