ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Tuesday, May 31, 2011

घोषणा से पहले _




मैं कुछ भी रहूँ ...
क्या फर्क पड़ता है
तुम तो सलीब पे चढ़ाना जानते हो
तो उठो-
कुछ कहने से पहले सन्नाटा बिखेर दो ...


रश्मि प्रभा

 
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घोषणा से पहले _

इससे पहले कि -
मैं ;
ये घोषित कर दूँ -
डाल दो मेरे
पैरों में बेड़ियाँ !
चढ़ा दो मुझे
सूली पर ;
या फ़िर -
पिला दो
प्याला ज़हर का !
टांग के
सलीब पर ;
ठोंक दो कीलें -
मेरे ,
हाथ- पैरों पर !

इससे पहले
कि मैं;
ये घोषित कर दूँ
कि -
मैं ही धरती हूँ -
मैं ही वायु ;
आकाश, जल
और अग्नि !

मैं ही हूँ पेड़ ;
मैं ही पहाड़ ;
नदियाँ -
नौतपा;
और इन्द्रधनुष!

महौट की बारिश
भी मैं ;
जेठ का सूखा
भी मैं -
आंधी;
बवंडर -
सुनामी भी मैं हूँ !

मैं ही कनेर हूँ ,
गाजरघास हूँ ;
बेशरम का फूल -
गौतम के सिर
खड़ा हुआ बरगद भी मैं !

मैं ही दलदल हूँ;
मैं ही गड्ढे ;
कूड़ा -करकट;
कीचड़ - कचड़ा -
मैं ही हूँ !

मैं ही भूख हूँ ;
मैं ही भोजन -
मैं ही प्यास हूँ ;
मैं ही अमृत -

मैं दिखती भी हूँ ;
छिपती भी हूँ -
उड़ती भी हूँ ;
खिलती भी हूँ !

मैं देह के ,
भीतर भी हूँ -
और-
देह के बाहर भी !

मैं अनंत हूँ ;
असीम हूँ ;
अविभाज्य हूँ -
अमर हूँ मैं !

इससे पहले
कि-
मैं ये -
घोषित कर दूँ ;
मार दो गोली -
मुझे चौराहे पर !

[Copy+of+Picture0029.jpg]

मोना एस कोहली
मेरी रूह खानाबदोश है और मेरे ख्वाब आवारा ! मैं कोई हस्ती नहीं हूँ जिसे ' अबाउट मी ' कालम में बाँधा जा सके ! जो मैं आज हूँ , कल मैं वो नहीं ! मेरा एक ही नियम है कि मेरा कोई नियम नहीं! मैं हर जगह हूँ और कहीं भी नहीं ! मैं नहीं हूँ सचमुच 'मैं', नहीं मैं कुछ भी नहीं।

Monday, May 30, 2011

ख़त लिख रहा हूँ तुमको.....

जब तक न तेरे मुड़ने की आहट सुनाई देगी
मैं जाग जाग कर अपने एहसास लिखूंगा
ख़त लिखता रहा हूँ... लिखता रहूँगा ....


रश्मि प्रभा


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ख़त लिख रहा हूँ तुमको.....



न दर्द, ... न दुनिया के सरोकार लिखूंगा,
ख़त लिख रहा हूँ तुमको, सिर्फ प्यार लिखूंगा !

तुम गुनगुना सको जिसे , वो गीत लिखूंगा ,
हर ख्वाब लिखूंगा, .. हर ऐतबार लिखूंगा !

पत्थर को भी भगवान, बनाते रहे हैं जो ,
वो भाव ही लिक्खूंगा , वही प्यार लिखूंगा !

दुनिया से छिपा लूँगा, तुम्हें कुछ न कहूँगा ,
गर नाम भी लूँगा, तो 'यादगार' लिखूंगा !

सौ चाँद भी देखूं जो, तुझे देखने के बाद ,
मैं एक - एक कर, ...उन्हें बेकार लिखूंगा !

अपने लिए भी सोंचना है मुझको कुछ अभी,
'आनंद' लिखूंगा,... या अदाकार लिखूंगा !

आज कल \--आनंद द्विवेदी

Sunday, May 29, 2011

"मीरा का उलाहना"


मेरी प्रीत तो दुनिया जाने
तेरी प्रीत को जानूं मैं
जहाँ न कोई राह मिले
तू साथ चले मेरे ..........


रश्मि प्रभा


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"मीरा का उलाहना"

त्याग कर सब सुख चैन
प्रतिक्षण ध्यान तुम्हारा ध्याया
मुस्कान-उल्लास सब पीछे छूटा
रंग तुम्हारा ऐसा छाया

तज कर लोक लाज को
प्रेम का मनका मैंने फेरा
मन में प्रीत तुम्हारी डोली
तुमरा नाम जपन ही ध्येय है मेरा

मैंने वैभव को ठोकर मारी
तुमरी मूरत गले लगाई
मेरी प्रीत से सृष्टि हारी
तो, मृत्यु के संग करी बिदाई

मैंने छोड़ दिया संसार
तुम से करा प्रेम अपार
पर कान्हा तुम कैसे प्रेमी
मुझ पर डाला वियोग का भार

देवकी का ह्रदय तोड़ा
यशोदा का भी आँगन छोड़ा
राधा संग ना प्रीत निभाई
गोपी भी तुमने बहुत रुलाई

गोकुल को तुम छोड़ आये
मथुरा पल-पल नीर बरसाए
दंड दिया किस कारन उनको
यही भूल की-
-की अंतर्मन से चाहा तुमको?

दोष तुम्हारा ही है कन्हाई
रूप क्यों सलोना लाये
क्यों बहरूपि प्रेम सिखाया
क्यों स्मृति अपनी पीछे छोड़ आये

ये सब तो मित्थ्या है
तुमने तो बस चाहा है स्वयं को
तुम क्या जानो प्रेम विरह सब
तुमने तो छला है जग को

पर,
तथ्य फिर तुमसे ही पाया
तुम में तो है भुवन समाया
स्वयं से प्रीत निभा कर तुमने
समस्त ब्रह्माण्ड को प्रेम सिखाया

तुम तो मेरे प्राण हों कान्हा
तुम को उलाहना मेरा अधिकार है
उलाहने में भी प्रीत सजी है
ये तो बिरहन का श्रींगार है

मृदुला हर्षवर्धन

मृदुला हर्षवर्धन
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Saturday, May 28, 2011

विक्रम-बेताल और बिजली

सब बैठें चुपचाप ....
मैं लायी हूँ विक्रम बेताल


रश्मि प्रभा

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विक्रम-बेताल और बिजली


विक्रम का मूड बड़ा अपसेट था.एक तो गर्मी बहुत थी ऊपर से बेताल कंधे पर चढा पड़ा था.पसीने से लथपथ विक्रम के कंधे पर चढे बेताल को भी मज़ा नही आ रहा था.वो बोला “यार इत्ती गर्मी में कम से कम डियोडरेंट तो लगा लेते,पसीना बदबू मार रहा है!” विक्रम जलभुन कर बोला “रात भर बिजली नही थी,एक मिनट भी सोया नही.आँखे कडुआ रही है और तुम्हे डियोडरेंट सूझ रहा है?”बेताल चुप हो गया.गर्मी और पसीना दोनों किलिंग थे. विक्रम को बेतहाशा गरियाता, बेताल सोचने लगा कि आज तो ऐसी कहानी सुनाऊंगा कि प्रश्नों के उत्तर देने के पहले ही इसके सिर के टुकड़े हो जाएंगे.कहानी शुरू हुई.

“एक नेक इंसान था.उसके अच्छे कामों से खुश होकर भगवान ने उससे एक वरदान मांगने को कहा.वो बोला “भगवन जीवन में बहुत अन्धेरा है, कुछ उजाला करो !”भगवान ने उसके घर में बिजली का कनेक्शन दिलवा दिया.भक्त पहले गदगद फिर उदास हुआ क्योंकि बिजली बहुत कम आती थी.एक महीने बाद बिजली का बड़ा बिल आया.उससे भक्त चकराया.सब कुछ भगवान को बताया.भगवान बोले “इसमें मै हेल्पलेस हूँ.तुम बिजली विभाग से शिकायत करो.”भक्त ने बिजली विभाग में फोन लगाया.वहाँ मोबाइल स्विच ऑफ पाया.भक्त घर लौट आया.उसे भूख लगी थी पर आज पत्नी ने खाना नही बनाया.भक्त ने पूछा ऐसा क्यों? पत्नी बोली “बिजली नही थी सो पानी भी नदारद था.अब बिना पानी के भी खाना बनता है क्या?”भक्त भूखा सो गया. उसने अगले दिन बिजली विभाग के सामने धरना-प्रदर्शन और रोड जाम किया.बिजली विभाग ने तो नही पर पुलिस ने अपना काम किया.घायल भक्त अब अस्पताल में था. भक्त को बड़ा रोना आया.उसने भगवान को फोन लगाया. हे भगवान! बिजली ने मुझे इतना क्यों रुलाया?पर इस बार तो भगवान का मोबाइल भी स्विच-ऑफ आया.हे विक्रम!अब इस भक्त को क्या करना चाहिए इस प्रश्न का सही उत्तर दो वरना तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे.”

उधर से कोई जवाब नही आया.बेताल ने पीछे देखा. विक्रम का सिर टुकडों में टूटा पड़ा था.भला जिस प्रश्न पर भगवान भी फोन स्विच ऑफ कर दे उसका उत्तर इंसान क्या देगा? बेताल ने कसम खाई कि अब वो बिजली से जुडी कहानी कभी भी नही सुनाएगा और पेड़ पर चढ़ गया.

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रूह से जिस्म का रिश्ता भी अजब होता है......
उम्र भर साथ रहे और तअर्रूफ़ न हुआ.
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Friday, May 27, 2011

सहारे- यादों के



नहीं जाती वो खुशबू कभी पास से
मचलते हैं सपने आज भी गीतों में ....



रश्मि प्रभा


 
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सहारे- यादों के

वो मैं नहीं था
जिसने बर्फीली वादियों में
सुनहली किरणों से चमकती
ज़ुल्फों के साये में
गाया था वो गाना
पर जब भी कानों को
मिलती है उस गाने की आहट
तो पाता हूँ दिल की गहराइयों में ,
मैं गा रहा होता हूँ
कहीं दूर वादियों में,

वो भीनी सी खुशबू
अब भी है जेहन में
पर उस पल तो नहीं थी
तुम्हारे आस पास
जब तुम्हें देखा था जाते हुए
पता नहीं कब जुड़ गई
तुम्हारी यादों से
जब भी सैर करती
आती है वो खुशबू कहीं से
तुम्हें साथ लिए रहती है

एक आवाज़ जब भी आती है
अतीत में ले जाती है
कभी कोई लम्हा , कभी तो कोई दिन ही
कहीं पहले गुजारा हुआ लगता है
कभी बचपन की किसी तस्वीर
से बाहर आया हुआ ....

एक स्वाद,
कोई पुरानी कहानी
सुना जाता है
एक स्पर्श और एक पुराना ख़्वाब ...
कभी आईने में देखने पर
आ जाती है अपनी ही याद
खालीपन भी जोड़ लेता है कुछ यादों को
जब एक अहसास के लिए
जगह बनती है कभी दिल में
तो उससे जुड़ा
टुकड़ा , दिल का चैन
याद आ जाता है
लोगों की भारी भीड़ में भी ...

यादें सीधी नहीं जुड़ती हमसे
उन्हें जरूरत होती है
एक सहारे या एक बैसाखी की ,
छोटी सी खाली जगह
जो मिल जाए तो फिर से
एक पुराना लम्हा
जी उठता है ...

अब मुझे याद रखना
शायद , तुम्हारे लिए
कुछ आसान हो जाए ...

रजनीश  तिवारी

Thursday, May 26, 2011

बच्चों के लिए ब्लैक - मनी



खूब कमाओ मनी
दुनिया में अब सिर्फ है मनी
जितना मनी कमाओगे
उतना ही सुख पाओगे
हाँ एक बात होगी बच्चों
गीत गुनगुनाना भूल जाओगे ....

रश्मि प्रभा




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बच्चों के लिए ब्लैक - मनी

यदि
रोटी खाना चाहते हो ,
वो भी सिर्फ रूखी तो
कमाओ व्हाइट मनी

यदि खाना चाहते हो ,
बटर और हनी ,तो
जमकर कमाओ ब्लैक मनी
ब्लैक मनी का सीधा सम्बन्ध
होता है लक्ष्मीजी और उलूक से
यानि कि ,
पैसे वालों की भूख से

उलूक लक्ष्मीजी का ड्राइवर है ,
और घोर अंधकार का लवर है
इसीलिए लक्ष्मीजी को
हमेशा पसंद है -ब्लैक मनी
क्या समझे माई-डियर --हनी
छोटा -बड़ा ,नेता -अभिनेता ,
जिसे देखो वोही
काला धन कमाने में लगा है ,
रिश्ते बेमानी हो गए ,सिर्फ
काला धन ही सगा है ...........

[IMG_6189editkk.jpg]

डॉ राकेश शरद

Wednesday, May 25, 2011

बन्द लिफाफा




ख़्वाबों के चारागाह में
धड़कनों में भी एक नदी बहती है
सागर से मिलने को बेख़ौफ़ दौडती है ...

रश्मि प्रभा



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बन्द लिफाफा

मेरे मौन की अज्ञात लिपि में
पिरो दिये हैं तुमने
कुछ भीगे अक्षर
बोलो ! मैं इनका क्या करूँ
जबकि ;मैं घर पर नहीं थी
और डाकिया डाल गया
एक बन्द लिफाफा
जिसके भीतर
एक नदी है
असंख्य आवेगों से भरी
उसकी बूँदों के वर्ण
लिख रहे हैं
कथा समंदर की
उसकी लहरें
समेटें हैं अपने आँचल में
झिलमिल चाँदनी
और चाँद की महक ,
अब तो इतना समय भी नहीं
कि वापस भेज दूँ नदी को
जहाँ से वो आई है
या कह दूँ कि
चलो चुपचाप बहती रहो
भीगने मत देना एक तिनका भी
ऐसा हो सकता है भला ?
कि नदी बहती रहे
और धरती गीली न हो !

My Photo
''लिख सकूँ तो - प्यार लिखना चाहती हूँ
ठीक आदमजात - सी बेखौफ दिखना चाहती हूँ"
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Tuesday, May 24, 2011

रिमोट कंट्रोल




खट खट खट खट.........
मोह दरवाज़े पर
दस्तक देता रहता है !
कान बंद कर लूँ
फिर भी ये दस्तकें
सुनाई देती हैं -
और आंखों में
कागज़ की नाव बनकर तैरती हैं !


रश्मि प्रभा



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रिमोट कंट्रोल

जब जगह थी ज्यादा
लोग कम थे
आपस में बतियाते
सुख दुःख साझे
घर की छत से छत लगी थी
आँगन चबूतरा रोशनदान अहाता
मिलने की हज़ार जगह बनी थी
कोई किसी भी चारपाई सो जाता
तब भी भरी पूरी नींद होती
जब आसपास कितना कुछ हो जाता
पाँव लम्बा फैलाता
पसरा सन्नाटा .
दूर बजती बांसुरी की सुन पड़ती तान
आती हवाओं पर सवार लहरियाँ
भजनों में राधा के सावरियां
कंठों में वृन्दावन गान .
अल्लसुबह उठ जाता
भिनसारे सूरज से बतियाता
कार्तिक माघ नहाता
मुंह अंधियारे जाता
सरसों में नहाया बदन
बूंदों में झिलमिलाता .
कच्चे आम की केरी
गन्ने की आँक से दातों की रणभेरी
बाल्टी भर भींगे आमों की ढेरी
चूसते चूसाते दोपहरी
कुरवा भर झागवाला मक्खन मलाई
गुलाबी रेवड़ी गरम नान -खटाई.
समय अंतराल हुआ
शहर विकराल हुआ
कबूतरबाज कबूतर खानों में रहते हैं
पड़ोसी की नामपट्टिका पढ़ते हैं
गौधूलीबेला क्रॉसिंग पै लाल बत्ती चेहरा है
भीड़ है अकेला है
गौरेया नर्सरी किताबों में फुदकती है
जिन्दगी यूँ ही रूप बदलती है .
पैकेट से निकलती है बनी बनाई रसोई
भुने हुए भुट्टों की कॉर्न सी साफगोई.
देर से उठता हूँ
कोयल की कूक नहीं
शहर अब मूक नहीं
अलार्म बजाता है
सपना डर जाता है .
सूरज की धूप नहीं
एयरकंडीशंड कमरों में
एलईडी रोशनी है
दुनिया बयालीस ईंच की एलसीडी में सिमटी है
जीवन एक चलती फिरती धारावाहिक में तब्दील
झुण्ड के झुण्ड आकाश अबाबील
संपर्कों की क्षीण डोर
सब कुछ रिमोट कंट्रोल .

मेरा फोटो
मेरे विचारों , कृतियों , और सरोकारों का ब्लॉग है - शब्द और अर्थ . आशा है , पसंद आएगा
http://shabdaurarth.blogspot.com/

Monday, May 23, 2011

मुझमें प्रेम नहीं अब!(क्षणिकाएं )



जब आस पास सबकुछ ख़त्म होने लगता है
तो बहुत कुछ कहना भी क्षणिक होता है 




रश्मि प्रभा





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मुझमें प्रेम नहीं अब!


1.

हम सब
या फिर हम सब में से ज्यादातर
बड़े हुए
और फिर बूढ़े
और मर गए एक दिन
बेमतलब

और बुद्ध और कबीर के कहे पे
पानी फेर दिया

2.

प्रकृति ने भूलवश रच दी मृत्यु
और जन्म उस भूल के एवज में रचना पड़ा उसे

मृत्यु भी
झूठ लगती है अब

सभी हैं जीने को अभिशप्त !

3.

जब तक मैं शामिल नहीं हूँ
तब तक मुझे आस है
कि कुछ और लोग भी नहीं होंगे
उस बुरे कृत्य में शामिल

भले हीं दिखाई न पड़ें वे

4.

जितनी मोची पाता है
फटे जूते की मरम्मत कर के
या फिर कुम्हार घड़े बना के उठा लेता है सुख

उतना भी नहीं हासिल है मुझे
तुम्हें लिख के
कविता

मुझमें प्रेम नहीं अब!
[Image(150)Ba.jpg]

ओम आर्य

Sunday, May 22, 2011

उत्तर : अनुत्तरित प्रश्नों के !



http://hindigen.blogspot.com/

जो अनुत्तरित है उसे अनुत्तरित ही रहने दो
सच का सैलाब उत्तर बन गया
तो सारे भ्रम मिट्टी में मिल जायेंगे ...

रश्मि प्रभा


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उत्तर : अनुत्तरित प्रश्नों के !


एक दिन मन में उठा ये प्रश्न,
अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर क्यों नहीं है?
आवाज एक उठी अंतर से
ये प्रश्न अनुत्तरित इस लिए है
क्योंकि
इनका कोई उत्तर नहीं होता,
खोजोगे भी उत्तर तो
फिर नए प्रश्नों का जन्म होगा,
और प्रश्नों और उत्तरों में ही
जीवन उलझ कर रह जायेगा ।
सुलझा तो उन्हें अनुत्तरित
छोड़कर भी नहीं है।
इस लिए उन के सवाल पर
काला चश्मा लगा रहने दो
क्योंकि उत्तर देने के लिए
तुमसे आँखें मिलानी होंगी
और काले चश्मे के पीछे छिपी
सुर्ख आँखों की लाली
दिल का हाल बयान कर देंगी।
फिर प्रश्न
उस सुर्खी पर
और उस पर भी
उठे सारे प्रश्न अनुत्तरित रह जायेंगे
इस लिए
कुछ अनुत्तरित प्रश्नों को ही
जीवन का सच बन जाने दो
और सच सिर्फ सच होता है
जिसको नियति ने
प्रारब्ध में लिखा होता है।

मेरा फोटो

Saturday, May 21, 2011

तुमने जिनको छू लिया.....





साथ अपने जब ग़ज़ल की शाम होती है
ज़िन्दगी पलकें झुकाए साथ चलती है

रश्मि प्रभा



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तुमने जिनको छू लिया.....

हम लकीरों से उलझकर जब कभी बेघर हुए।
चल के तपते पत्थरों पर, चांदनी के दर हुए।

उनकी आँखों से छलक आयीं दो बूंदें गाल पर,
ख़्वाब उनके भी लो अब, नमकिनियों से तर हुए।

यूँ तो साहिल पर पड़े थे, सदियों से पत्थर कई,
तुमने जिनको छू लिया वो टुकड़े संग-मरमर हुए।

बीते बरसों भी कहा था माँ ने की अब लौट आ,
ख़्वाब शहरों के मगर मेरी राह के विषधर हुए।

याद करते ही तुझे ग़ज़लें सी उभरीं आँख में,
कोरे कागज़ थे कभी, अब तितलियों के पर हुए।

आवाजाही बढ गयी लो चाँद की गलियों में फिर,
जो सितारों के ठीये थे, आशिकों के घर हुए।
[2554.jpg]
* राकेश जाज्वल्य.
कविताओं के माध्यम से खुद को जानने - पहचानने की प्रक्रिया भी मुसलसल चलती ही रहती है........कुछ कहते-सुनते, सुनते-कहते कभी-कभी मन हो आता है कुछ गुनगुनाने का. दुनिया की आप-धापी में इसी बहाने अपने लिए भी थोडा वक्त निकल आता है. क्या कहा, कितना कहा, क्यों कहा, किसे कहा, साहित्य हुआ या लुगदी, खुद बदले या कि जमाना, इन सब बातों से परे खुद को अभिव्यक्त करने का सुख भी कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं........विचारों का व्यक्त किया जाना जरुरी है............और क्या......

Friday, May 20, 2011

प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त - मेरी और उनकी कलम में


प्रकृति के सुकुमार कवि पन्त ने मुझे किरणों से बात करना सिखाया , पक्षियों की चहचहाहट में भोर का सन्देश दिया . कक्षा में उनकी रचना ने प्रकृति के मध्य हमें लाकर खड़ा किया और प्रकृति के कण कण में व्याप्त सौन्दर्य की मुखरता से हमें रूबरू किया -

'प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
तूने कैसे पहचाना?
कहां, कहां हे बाल-विहंगिनि!
पाया तूने यह गाना?
...

शशि-किरणों से उतर-उतरकर,
भू पर कामरूप नभ-चर,
चूम नवल कलियों का मृदु-मुख,
सिखा रहे थे मुसकाना।
....
कूक उठी सहसा तरु-वासिनि!
गा तू स्वागत का गाना,
किसने तुझको अंतर्यामिनी
बतलाया उसका आना! '

सुकुमार कवि के पूरे व्यक्तित्व में प्राकृतिक संवेदना की कोमलता मिली , जब 1964 में मैं उनसे मिली . रेशम की तरह उनके बाल, एक बार छू लेने का बाल सुलभ ख्याल निःसंदेह सौन्दर्य का आकर्षण था . उनके उठने बैठने मुस्कुराने गुनगुनाने में हवा की मंद चाल सी थी . हाँ तब उस उम्र में ये व्याख्या मेरे पास नहीं थी, ना ही उस व्यक्तित्व की गरिमा के लिए शब्द थे ... पर जो दृश्य आँखों ने कैद किया , उनके छायाचित्र संभाल के रखे ... उम्र के हर पादान पर तस्वीरें मुखर से मुखरतम होती गईं .

'रश्मि प्रभा' - इस नाम ने मुझे वह गौरव दिया , वह पहचान दी - जिसका लेशमात्र भी ख्याल उस उम्र में नहीं आया .उम्र समय की घुमावदार घाटियों से गुजरता गया और मेरे जेहन में इन पंक्तियों का असर हुआ


वियोगी होगा पहला कवि,आह से उपजा होगा गान, उमड़कर आखों से चुपचाप,बही होगी कविता अनजान...


पन्त की इस रचना ने मेरी हर ख़ामोशी को शब्द दिए , बहते आंसुओं से सरगम की धुन आने लगी . ऊँची चारदीवारी में पन्त की रश्मि ने बूंद बूंद में कविता को जन्म दिया -


रात रोज आती है,
हर रात नए सपनों की होती है,
या - किसी सपने की अगली कड़ी.....
मैं तो सपने बनाती हूँ
लेती हूँ एक नदी,एक नाव, और एक चांदनी........
...नाव चलाती हूँ गीतों की लय पर,
गीत की धुन पर सितारे चमकते हैं,
परियां मेरी नाव में रात गुजारती हैं...
पेडों की शाखों पर बने घोंसलों से
नन्ही चिडिया देखती है,
कोई व्यवधान नहीं होता,
जब रात का जादू चलता है.....
ब्रह्म-मुहूर्त में जब सूरज
रश्मि रथ पर आता है-
मैं ये सारे सपने अपने
जादुई पोटली में रखती हूँ...
परियां आकर मेरे अन्दरछुपके बैठ जाती हैं कहीं
उनके पंखों की उर्जा लेकर
मैं सारे दिन उड़ती हूँ,
जब भी कोई ठिठकता है,
मैं मासूम बन जाती हूँ.......
अपनी इस सपनों की दुनिया में मैं अक्सर
नन्हे बच्चों को बुलाती हूँ,
उनकी चमकती आंखों में
जीवन के मतलब पाती हूँ!
गर है आंखों में वो बचपन
तो आओ तुम्हे चाँद पे ले जायें
एक नदी,एक नाव,एक चाँदनी -
तुम्हारे नाम कर जायें..........................(रश्मि प्रभा)

और पन्त की रश्मि के नाम स्वप्न नीड़ से

कूक उठी सहसा तरुवासिनी
गाया स्वागत का गाना

सच में , वसीयत इसे कहते हैं .... इस नाम के साथ कवि पन्त ने अपनी अभिप्सित कामना भी मेरे नाम की ----

'अपने उर की सौरभ से
जग का आँगन भर देना ...'


आह्लादित मन सुकुमार कवि से आज भी पूछता है उनके ही शब्दों में---

'बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..


गोपन रह न सकेगी
अब यह मर्म कथा
प्राणों की न रुकेगी
बढ़ती विरह व्यथा
विवश फूटते गान प्राणों से


बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..


यह विदेह प्राणों का बंधन
अंतर्ज्वाला में तपता तन
मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को
दग्ध कामना करता अर्पण
नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से



बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..'


रश्मि प्रभा
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सुमित्रानंदन पन्त


जब नहीं सह पाया
उनका कोमल मन
जीवन में अपनेपन का आभाव,
एक-दूसरे पर घात-प्रतिघात,
जब नहीं भाया उन्हें मानव-संसार
जहाँ होती थी सदा खींच-तान
चलती रहती थी हरदम तकरार,
दर्द होने लगा असह्य,अनंत
तो चले गए प्रकृति के पास
पाने को इन सबसे पार..

दर्द के दलदल में खिला कमल
हृदय था जिसका बिलकुल निर्मल .
देवकी नहीं मिली तो क्या ?
प्रकृति रही सदा उनके साथ
यशोदा बनकर,
सहलाती रही उनके कोमल गात,
बहलाती रही बालमन का अकेलापन.
यहीं मिला उन्हें नया जीवन
यहीं आ बसे थे उनके प्राण.

पादप-पुष्प,झरने,नदी ,पहाड़,
जंगल का हरा-भरा संसार
सदा रहते थे उनके उर में,
खग-वृन्द भी करते थे संवाद
सदा अपने स्वर में.
तितलियाँ उड़-उड़ आती थी
बैठकर उड़ जाती थी
मनचाहे फूलों पर,
भंवरे भी मंडराते थे,
लेकर पराग उड़ जाते थे .
जंगल के सब जीव भले थे
लगता मानों एक कोख पले थे.

हरियाली ओढ़े जंगल था ,
हिमाच्छादित पर्वतराज
झरने झर-झर गाते रहते
गीत मिलन के सारी रात.
पेड़ों की झुरमुटों से गुजरती
तेज सरसराती हवाएं
सुनाती थी लोरियां,
सुलाती थी उनके बैचेन मन को
अपने आसमानी आँचल तले
दे-देकर थपकियाँ.
जीवन-यज्ञ सदा चलता था,
जीवन मूल्य यहाँ पलता था.
सबसे सबका सरोकार यहाँ था ,
जीवन-दर्शन आधार यहाँ था.

फूल यहाँ इतराते अपनी सुन्दरता पर
मन बलिहारी जाता कोमल सी काया पर,
जीवन में आनंद भरा था,
फूलों में मकरंद भरा था.
कांटे भी उगते थे वन में,
उनमें भी थी एक कोमलता
स्व-रक्षा में चुभ जाते थे
अफ़सोस किया करते मन में,
उत्सर्ग किया सारा जीवन
जिये सदा बन प्रकृति-दर्पण .

[gq%5B1%5D.jpg]राजीव कुमार









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सुमित्रानंदन पंत

सुमित्रानंदन पंत का जन्म उत्तर प्रदेश के खुबसूरत आँचल के कौसानी गाँव में 20 मई सन 1900 में हुआ था | इनके जन्म के 6 घंटे पश्चात् ही इनके सर से माँ का साया सदा के लिए हट गया | और इनका पालन -पोषण उनकी दादी ने ही किया | इनका नाम गुसाई दत्त रखा गया | इनकी प्रारंभिक शिक्षा - दीक्षा अल्मोड़ा में ही हुई | 1918 में वे अपने मंझले भाई के साथ काशी आ गये वहां वे क्वींस कॉलेज में पढने लगे | वहां से मेट्रिक उतीर्ण करने के बाद वे म्योर कॉलेज इलाहबाद चले गये वहां इंटर तक अध्ययन किया | उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने अपना नाम बदल कर सुमित्रानंदन पंत रख लिया | 1919 में गाँधी जी के एक भाषण से प्रभावित होकर बिना परीक्षा दिए ही अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रीय हो गये | उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और स्वतंत्र रूप से बंगाली , अंग्रेजी तथा संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया |
प्रकृति की गोद , पर्वतीय सुरम्य वन स्थली में जन्मे और पले होने की वजह से उन्हें प्रकृति से बेहद प्यार था | बचपन से ही वो सुन्दर रचनाएँ लिखा करते थे | सन 1907 से 1918 के काल के स्वयं कवि ने अपने कवि जीवन का प्रथम चरण माना है | इस काल की कवितायेँ वीणा में संकलित हैं | सन 1922 उच्छ्वास और सन 1928 में पल्लव का प्रकाशन हुआ | सन साहित्य और रविन्द्र साहित्य का इन पर बड़ा प्रभाव था | पंत जी का प्रारंभिक काव्य इन्ही साहित्यिकों से प्रभावित था | सुमित्रानंदन पंत जी 1938 ईसवी में कालाकांकर से प्रकाशित ' रूपाभ ' नामक पत्र के संस्थापक भी रहे | सुमित्रानंदन पंत जी की कुछ अन्य काव्य कृतिया हैं ___ ग्रंथि , गुंजन , ग्राम्या , युगांत , स्वर्ण - किरण , स्वर्ण - धूलि , कला और बुढा चाँद , लोकायतन , निदेबरा , सत्यकाम आदि | उनके जीवनकाल में उनकी 28 पुस्तकें प्रकाशित हुई | जिनमें कवितायेँ , पद्य - नाटक और निबंध शामिल हैं | सुमित्रानंदन पंत जी आकाशवाणी केंद्र प्रयाग में हिंदी विभाग के अधिकारी भी रह चुकें हैं | पंत जी जीवन भर अविवाहित ही रहे | हिंदी साहित्य का दुर्भाग्य है की सरस्वती का वरद पुत्र 28 दिसम्बर 1977 की मध्य रात्रि में इस मृत्युलोक को छोड़ कर स्वर्गवासी हो गये |
साहित्यिक विशेषताएं _______ प्राकृतिक सौंदर्य के साथ पंत जी मानव सौंदर्य के भी कुशल चितेरे थे | छाया - वादी दौर के उनके काव्य में रोमानी दृष्टि से मानवीय सौंदर्य का चित्रण है , तो प्रगतिवादी दौर में ग्रामीण जीवन के मानवीय सौंदर्य का यथार्थवादी चित्रण | कल्पनाशीलता के साथ - साथ रहस्यानुभूति और मानवतावादी दृष्टि उनके काव्य की मुख्य विशेषताएं हैं | युग परिवर्तन के साथ पंत जी की काव्य चेतना बदलती रही है | पहले दौर में वे प्रकृति सौंदर्य से अभिभूत छायावादी कवि हैं , तो दुसरे दौर में मानव सौंदर्य की और आकर्षित और समाजवाद आदर्शों से प्रेरित कवि | तीसरे दौर की उनकी कविताओं में नये कविता की कुछ प्रवृतियों के दर्शन होते हैं तो अंतिम दौर में वे अरविन्द दर्शन से प्रभावित कवि के रूप में सामने आते हैं |
काव्यगत विशेषताएं __ भावपक्ष _
प्रकृति _ प्रेम
" छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया |
बाले ! तेरे बाल - जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन |
भूल अभी से इस जग को | "
इन पंक्तियों से ये समझने के लिए काफी है की पन्त जी को प्रकृति से कितना प्यार था | पंत जी को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है | यद्यपि पंत जी की प्रकृति चित्रण अंग्रेजी कविताओं से प्रभावित है फिर भी कल्पना की ऊँची उड़ान है , गति और कोमलता है , प्रकृति का सौंदर्य साकार हो उठता है | प्रकृति मानव के साथ मिलकर एकरूपता प्राप्त कर लेती है और कवि कह उठता है |
' सिखा दो न हे मधुप कुमारि , मुझे भी अपने मीठे गान | '
प्रकृति प्रेम के पश्चात् कवी ने लौकिक प्रेम के भावात्मक जगत में प्रवेश किया | पंत जी ने यौवन के सौंदर्य तथा संयोग और वियोग की अनुभूतियों की बड़ी मार्मिक व्यंजना की है | इसके पश्चात् कवी छायावाद और रहस्यवाद की और प्रवृत हुए और कह उठे ____
" न जाने नक्षत्रों से कौन , निमंत्रण देता मुझको मौन | "
अध्यात्मिक रचनाओं में पंत जी विचारक और कवि दोनों ही रूपों में आते हैं | इसके पश्चात् पंत जी जन - जीवन की सामान्य भूमि पर प्रगतिवाद की और अग्रसर हुए | मानव की दुर्दशा को देखकर कवी कह उठे __
" शव को दें हम रूप - रंग आदर मानव का
मानव को हम कुत्सित चित्र बनाते शव का |"
+ + + +
" मानव ! एसी भी विरक्ति क्या जीवन के प्रति |
आत्मा का अपमान और छाया से रति | "
गांधीवाद और मार्क्सवाद से प्रभावित हो पंत जी ने काव्य रचना की है | सामाजिक वैषम्य के प्रति विद्रोह का एक उदाहरण देखिये _
" जाती - पांति की कड़ियाँ टूटे , द्रोह , मोह , मर्सर छुटे ,
जीवन के वन निर्झर फूटे वैभव बने पराभव | "
कला - पक्ष
भाषा __ पंत जी भाषा संस्कृत प्रधान , शुद्ध परिष्कृत खड़ी बोली है | शब्द चयन उत्कृष्ट है | फारसी तथा ब्रज भाषा के कोमल शब्दों को इन्होने ग्रहण किया है | पंत जी का प्रत्येक शब्द नादमय है , चित्रमय है | चित्र योजना और नाद संगीत की व्यंजना करने वाली कविता का एक चित्र प्रस्तुत है |
" उड़ गया , अचानक लो भूधर !
फड़का अपर वारिद के पर !
रव शेष रह गये हैं निर्झर |
है टूट पड़ा भू पर अम्बर ! "
पंत जी कविताओं में काव्य , चित्र और संगीत एक साथ मिल जाते हैं ___
" सरकाती पट _
खिसकती पट _
शर्माती झट
वह नमित दृष्टि से देख उरोजों के युग घाट ? "
बिम्ब योजना ___ बिम्ब कवि के मानस चित्रों को कहा जाता है | कवि बिम्बों के माध्यम से स्मृति को जगाकर तीव्र और संवेदना को बढाते हैं | ये भावों को मूर्त एवं जिवंत बनाते हैं | पंत जी के काव्य में बिम्ब योजना विस्तृत रूप से उपलब्ध होती है |
स्पर्श बिम्ब _____ इसमें कवि के शब्द प्रयोग से छुने का सुख मिलता है __
" फैली खेतों में दूर तलक
मखमल सी कोमल हरियाली | "
दृश्य बिम्ब _____ इसे पढने से एक चित्र आँखों के सामने आ जाता है ____
" मेखलाकार पर्वत अपार
अपने सहस्त्र दृग सुमन फाड़
अवलोक रहा है बार - बार
निचे के जल में महकार | "
शैली , रस , छंद , अलंकार ___ इनकी शैली ' गीतात्मक मुक्त शैली ' है | इनकी शैली अंग्रेजी व् बंगला शैलिओं से प्रभावित है इनकी शैली में मौलिकता है वह स्वतंत्र है |
पंत जी के काव्य में श्रृंगार एवं करूँ रस का प्राधान्य है | श्रृगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुन्दर चित्रण हुआ है | छंद के क्षेत्र में पंत जी ने पूर्ण स्वछंदता से काम लिया है | उनकी परिवर्तन कविता में रोला छंद है _
" लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे | "
तो मुक्त छंद भी मिलता है | ' ग्रंथि ' ' राधिका ' छंद में सजीव हो उठी है ____
" इंदु पर उस इंदु मुख पर , साथ ही | "
पंत जी ने अनेक नवीन छंदों की उदभावना भी की है | लय और संगीतात्मकता इन छंदों की विशेषता है |
अलंकारों में उपमा , रूपक , श्लेष , उत्प्रेक्षा , अतिश्योक्ति आदि अलंकारों का प्रयोग है | अनुप्रास की शोभा तो स्थान - स्थान पर दर्शनीय है | शब्दालंकारों में भी लय को ध्यान में रखा गया है | शब्दों में संगीत लहरी सुनाई देती है |
" लो , छन , छन , छन , छन
छन , छन , छन , छन
थिरक गुजरिया हरती मन | "
सादृश्य मूलक अलंकारों में पन्त जी को उपमा और रूपक अलंकर प्रिय थे | उन्होंने मानवीकरण और विशेषण - विपर्यय जैसे विदेशी अलंकारों का भी भरपूर प्रयोग किया है |

[DSC02484.JPG]मीनाक्षी पन्त

मेरा अपना परिचय आप सबसे है जो जितना समझ पायेगा वो उसी नाम से पुँकारेगा हाँ मेरा उद्द्श्ये अपने लिए कुछ नहीं बस मेरे द्वारा लिखी बात से कोई न कोई सन्देश देते रहना है की ज्यादा नहीं तो कम से कम किसी एक को तो सोचने पर मजबूर कर सके की हाँ अगर हम चाहे तो कुछ भी कर पाना असंभव नहीं और मेरा लिखना सफल हो जायेगा की मेरे प्रयत्न और उसके होंसले ने इसे सच कर दिखाया |

Thursday, May 19, 2011

गरीब का भाई


मीठे आम मीठे आम
भूल गए हम सारे काम
कोई है छोटा कोई है टेढ़ा
लेकिन सब है बड़ा रसीला
आओ मिलकर खाएं आम
भूल के अपने सारे काम
मीठे आम मीठे आम ......................


 रश्मि प्रभा 



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--गरीब का भाई




सुनो कहानी एक नई
मई मास में डाली डाली
झूल रहे, हरे -रसीले
पीले -पीले आम ।


लाल -लाल गालों वाले
छोटे -छोटे हाथ उठाकर
तुम्हें बुलाते प्यारे बच्चों
दोड़ो -आओ,खाओ आम।


तेज हवा
के झोंकों से
टप से गिर गये आम
जल्दी उठाओ ,पानी से धोलो

मीठे मिश्री से आम।

चूस -चूस कर गुठली फेंको
उनको सुलाओ माटी में
उग आएगा आम का पौधा
सुन्दर सा सुकुमार।


गरीब का भाई /सुधा भार्गव

गरीब फुलवा ने ऐसा ही किया । उसकी माँ को एक दिन एक आम मिल गया |
देखते ही वह उस पर पिल पड़ा । स्वाद ले- ले कर उसे चूसने लगा और गुठली लापरवाही से झोंपड़ी के आगे डाल दी ।

दूसरे दिन सुबह वह सोकर उठा और गुठली देखने बाहर आया पर उसे कहीं न दिखाई दी । असल में रात में पानी बरसने के कारण गुठली मिट्टी में दब गयी थी ।

कुछ दिनों बाद उसने फिर गुठली खोजी ,वह तो नहीं मिली पर उसकी जगह कोमल -कोमल पत्तों वाला नन्हा सा पौधा खड़ा मिला।

उसे देखकर फुलवा मुस्करा दिया और बोला --पौधे भाई ---पौधे भाई --घर के बाहर क्यों खड़े हो।चलो मेरे साथ अन्दर, मैं तुम्हारे साथ खेलूंगा ।

- धीरे से उठाना वरना मुझे चोट लग जायेगी ।धीमी आवाज आई।
-तुम मेरे भाई हो। तुम्हें सावधानी से अन्दर ले जाकर एक गमले में रख दूँगा।

-थोड़े दिनों में मैं बड़ा हो जाऊँगा --गमला तो फिर मेरे लिए छोटा पड़ जायेगा |पौधा कमर मटकाकर बोला ।
-फिर मैं क्या करूँ ----
-तुमने मुझे अपना भाई बनाया है सो तुम्हारे साथ ही रहना पसंद करूंगा लेकिन घर के अन्दर नहीं ---बाहर।
-क्यों ?
-बड़े होने पर मेरी जड़ें नीचे गहराई तक चली जायेंगी लम्बाई-मोटाई में मैं तुमसे बड़ा हो जाऊँगा । तबतो तुम्हारा आँगन भी छोटा पड़ने लगेगा।
फुलवा सिर खुजलाते हुए बोला --कह तो ठीक रहे हो पर तुम्हारे साथ रहूँगा कैसे !
-तुम रोज मेरे पास सुबह -शाम आना ,मेरी देखभाल करना मुझे पानी और खाद की भी जरूरत होगी ।
-क्यों ?
-जिस तरह तुम्हें भूख -प्यास लगती है उसी तरह मुझे भी लगती है ।
-तुम्हारा साथ मुझे बहुत अच्छा लगता है । तुमसे मिलने सुबह -शाम जरूर आऊँगा ।

फुलवा की देखरेख में पौधा बड़ा होने लगा ।फल -फूल और पत्तों से भरपूर आम का पौधा एक बड़ा पेड़ बन गया ।


अब फुलवा उसकी देखभाल नहीं करता था बल्कि पेड़ फुलवा का ध्यान रखता था ।

फुलवा और उसकी माँ खूब आम खाते। जो बचते वे ग़रीब बच्चों में बाँट दिये जाते ताकि कोई आम के लिए न तरसे ।

एक दिन फुलवा बोला -पेड़ भाई .मैं तो बहुत पढ़ना चाहता हूं पर इसके लिए पैसा नहीं है ।
-पैसा !पैसा तो तुम कमा सकते हो ।
-मैं --मैं तो बहुत छोटा हूं।
-छोटे नहीं--- अब बड़े हो गये हो । टोकरी में आम भरकर बाजार में बेच आओ। बस आ जायेगा पैसा ।निकल आएगा फीस -किताब का खर्चा।
-तब तो मैं माँ को काम भी नहीं करने दूँगा । देख लेना--- घर में रानी बनाकर रखूँगा उसे ।
-बस देखने शुरू कर दिये सपने । सपने सच करने के लिए कुछ करना भी पड़ता है । पहले आम बेचने तो जाओ ।


बड़े -बड़े, रसीले आम देख खरीदारों ने फटाफट खरीद लिए ।पहली बार उसकी जेब में सिक्के खन -खन कर रहे थे।उनकी आवाज सुनकर वह हवा में उडा जा रहा था |

रास्ते से फुलवा ने खुशी -खुशी फूलों की एक माला खरीदी|
पेड़ भाई को उसने माला पहनाई और कहा --तुम्हारे कारण ही मेरी जेब में आज सौ रूपये हैं । यह मै कभी भूल नहीं सकता ।
घर में वह फुर्ती से गया और चिल्लाया --
-माँ --माँ --देखो तो --आम बेचकर मैं बहुत से रूपये लाया हूं ।

चकित होकर माँ अपने बेटे पर प्यार ही प्यार उड़ेलने लगी । लेकिन वह अपने दूसरे बेटे को नहीं भूली । रोली चावल लेकर बाहर आई । आम के पेड़ को तिलक लगाया ।
बोली --फुलवा ,मुझसे वायदा करो -- पेड़ भाई की हमेशा रक्षा करोगे ।.वह हमारी भलाई करने वाला है।उसे काटकर -,तोड़कर कष्ट न पहुँचाना ।


माँ --मैं सब समय तुम्हारी बात याद रखूँगा ।फुलवा ने अपने पेड़ भाई पर स्नेह से हाथ फेरा।
इतनी अच्छी माँ और भाई को पाकर पेड़ भाई तो खुशी से झूम उठा । ऐसा झूमा ----- डालियाँ भी नाच उठीं । लाल.हरे -पीले -आम दोनों के चारों ओर बिछ गये।
कह रहे थे ---

प्यार के झोंकों से

टप से गिरे हम v
लपलप -लपलप
भागम भाग -भाग
चूसो -खाओ आम
भाग -भाग -भाग
आम
हमारा राष्ट्रीय फल
-देवताओं का प्रिय भोजन ।
-कवि कालीदास ने इसकी प्रशंसा में गीत गाये।
-ग्रीक राजा एलेक्जेंडर द ग्रेट और चीनी यात्री ह्येन त्सेंग (Hieun tsang)को यह फल बहुत स्वादिष्ट लगा ।
-मुसलमान बादशाह अकबर ने दरभंगा (बिहार )में १००,०००आम के पेड़ लगवाये ।
-आमों में विटामिन ए ,सी .डी भरपूर मात्रा में पाया जाता है ।


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कविता .कहानी संस्मरण मुक्तक ,आलेख आदि विधाओं पर मेरी लेखनी गतिशील है !पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं !विभिन्न संस्थाओं से जुडाव है !प्रकाशित काव्य -संग्रह 'रोशनी की तलाश में '!इसे डा .कमला रत्नम पुरस्कार मिल चुका है !प्रकाशित बाल पुस्तकें --१ अंगूठा चूस , २ अहंकारी राजा ३ ,जितनी चादर उतने पैर पसार !तीसरी कृति 'राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान 'से अलंकृत हो चुकी है !प. बंगाल -की ओर से मुझे 'राष्ट्र निर्माता पुरस्कार 'मिला !

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण