ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Monday, February 28, 2011

दोहरे चेहरे-- लघु कथा --



मुखौटे के भीतर से कैसी धुन आएगी
कौन जानता है !!!

रश्मि प्रभा







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दोहरे चेहरे-- लघु कथा --

 

आज जोशी जी अपने लडके के लिये लडकी देखने जा रहे थे। वो उच्च पद से रिटायर्ड व्यक्ति थे एक ही बेटा था इस लिये चाहते थे कि शादी धूम धाम से हो। उच्च पद पर रहने से शहर मे उनकी मान प्रतिष्ठा थी। कई संस्थायें उन्हें अपने समारोह मे बुलाती जहाँ कई बार उन्हें समाज मे पनप रही बुराईओं पर वक्तव्य भी देने पडते। इस लिये लोग उन्हें समाज सुधारक भी मानते थे।


लडकी के घर पहुँचे। लडके लडकी मे बात चीत हुयी और दोनो ने एक दूसरे को पसंद कर लिया। लडकी के पिता को अन्दर से ये डर खाये जा रहा था कि पिछली बार की तरह इस बार भी दहेज पर आ कर बात न्न अटक जाये। पिछली बार लडके ने कार की माँग रख दी थी। उन्होंने अपना शक मिटाने के लिये जोशी जी से पूछा- " जोशी जी , अब आगे की बात भी हो जाये।यूँ तो हर माँ बाप अपनी बेटी को कुछ न कुछ दे कर ही विदा करता है, फिर भी अगर आपकी कोई डिंमाँड हो तो हमे निस्संकोच बता दें ।"


" शर्मा जी आपको पता है हमारे घर मे भगवान का दिया सब कुछ है अगर फिर भी आप इतना आग्रह कर रहे हैं तो बता देना चाहता हूँ कि हमे कुछ नही चाहिये, आप कन्यादान स्वरूप इन दोनो के नाम एक ज्वाँइट एकाउँट खुलवा कर उसमे राशी जमा करवा दें"
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निर्मला कपिला
http://veerbahuti.blogspot.com/

Sunday, February 27, 2011

मेरे हिस्से का सूरज ...




मेरे दिल के ख्वाबगाह में
गुनगुनाता है एक ग़ज़ल कोई
जो तुम्हारी शक्ल लेता है !
मेरी तूलिका ने बाँधा है इन लम्हों को
आज तुमने मुझे
शायराना ख्यालों की वसीयत दी है....

रश्मि प्रभा




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मेरे हिस्से का सूरज ...

तुमसे मिलना ,
एक अजीब इतफाक था
अँधेरे मे गूम होते
मेरे अस्तित्व
को एक सूरज तुमने दिया था
जिसकी रौशनी मे
मैंने खुद को जाना
जीवन ख़तम नहीं हुआ
इस बात को भी पहचाना
अजीब मंज़र था वो भी
अपना हाल
किसी को भी न सुनाने वाली लड़की
एक अजनबी के सामने
तार तार होके बिखर गयी थी
तुमने बहुत ख़ामोशी
से सबकुछ सुना था
तुम्हरी मदद से
मैंने वापस जिंदगी का
ताना बाना बुना था
तुम्हारा संतावना देता स्पर्श
आज भी महसूस करती हूँ
आज भी जब भी अँधेरा होता है
वो सूरज रोशन करता है जीवन
जो तुमने मुझे दिया था
तब मैंने जाना था
एक पुरुष और स्त्री
का सम्बन्ध
ऐसा भी हो सकता है
अगर इसे नाम देना
जरुरी हो तो
कह सकती हूँ
तुम हो
मेरे हिस्से का सूरज .

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मंजुला
बहुत साधारण हूँ चीजों को पेचीदा बनाना मुझे पसंद नहीं , कोशिस करती हूँ किसी को मेरे वजह से दुःख न पहुचे...!

Saturday, February 26, 2011

क्या ऐसा भी हो सकता है भला कभी!!!!!!




कई बार होता है ऐसा
जब अकेलापन गहराता है
बुखार से सर तपता है
किसी का स्नेहिल स्पर्श
सर पे गीली पट्टी सा काम करता है ...
सच था या झूठ ... जब तक जानूं
बुखार उतर जाता है
और एक एहसास साथ होता है
हम अकेले नहीं . वह साथ है !
  • रश्मि  प्रभा  

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क्या ऐसा भी हो सकता है भला कभी!!!!!!

जानते हो.....
कल रात सर में,
तेज दर्द हुआ था मुझे.
मालुम नहीं कहाँ से-
लेकिन हाँ,
वो आ बैठी थी मेरे सिरहाने!

ज्यादा तो नहीं...
पर इतना याद है मुझे,
वह तमाम रात,
अपने आसुओं से,
भिगो-भिगो सर पे रक्खी पट्टी,
बदलती रही.

शायद...
कुछ नाराज भी थी,
बोली..रोहित अपना ख्याल भी,
कर लिया करो कभी.
पकड़ हाथ उसका तब कहा मैंने उससे,
कैसे...अब तुम साथ भी तो नहीं होती मेरे?

वह...
मुस्कुराई थी तब,
झुका सर अपना मेरे पलकों को चुम,
कहा उसने-
पगले..ऐसा क्यों कहते हो तुम,
क्या ऐसा भी हो सकता है भला कभी!!!!!!



जब आप कल्पना की दुनिया को जीते हो..
और ऐसा कुछ हो जाता हो!
तो यथार्थ व्यर्थ हो जाता है...है न ?

...............
My Photo
रोहित
==============
परिचय के नाम पर मेरे पास बताने को जयादा कुछ नहीं है.प्रारंभिक शिक्षा डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल,औरंगाबाद (बिहार) से हुआ.१०+२ (बारहवी) सेंट्रल हिन्दू ब्वायज स्कूल,वाराणसी से उत्तीर्ण. वर्त्तमान में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से ग्रेजुएसन (विज्ञानं विषय से ) कर रहा हूँ.साहित्य में रूचि है बस.
मेरा ब्लॉग लिंक है- http://shabdgunjan.blogspot.com/ 
 

Friday, February 25, 2011

अजनबी



एक अजनबी ही सही
राह बड़ी लम्बी है ...
कुछ तो छोटी हो जाएगी !

रश्मि प्रभा



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अजनबी

किसी लम्बी सी राह पर दो अजनबी का मिलना ,
एक साथ है ,
दो हाथ है ,
एक ख़ामोशी है ,
दो जुबाँ है ,
एक चाह है ,
फिर भी दो राह है ....
एक चाह होती है ,
फिर भी दोनों की राह बदलती है .....
चलते चलते रुक जाओ ,
अपने सपने को फिर से सोचो ,
शायद सामने वही तो है
जो सपने में पुकारता था ,
जो दिल पर दस्तक देकर छुप जाता था ,
जिसका तुम्हे इंतज़ार था ,
आपका दिल हर पल बेक़रार था ,
ये संयोग है ,
चलो आज उसके भरोसे जिंदगी सौंप दो ,
उसकी ख़ामोशी को पढ़ लो ...

My Photoप्रीति टेलर


मैं प्रीति हितेश टेलर .... ब्लॉग हाँ ये आज कल बहु प्रसिध्ध आयाम है लेखन कलाका ...पर इसके लिए लेखक होना शायद जरूरी न हो ...अपनी अनुभुतिओंको शब्दोकी लड़ियोंमें पिरोने का एक सुन्दर माध्यम ...यहाँ आप अपने दिल को टटोलते है ,उसकी भावना शब्दों बनाकर बहार ले आते है .... बस कुछ ऐसा ही मेरा प्रयत्न ...पर ये मेरी कोशिश की दुनियाको जो मैं हरदम अपने चश्मेसे देखती हूँ उसका अक्स शायद आपके साथ बाँट लूँ ....वो चाहे शब्द्पाशमें बंधी एक कविता हो शायरी हो या कोई लघुकथा ....मेरे रोजाना जिंदगीसे चुराया हुआ एक पल ..एक मौसम ...एक ज़िद ...एक ख़ुशी ...या फिर एक गम ...जहाँ शब्दों में बारिश भी हो या रेगिस्तान की धुप भी ...हाँ यहाँ सिर्फ मैं नहीं हूँ ......सिर्फ है प्रीति ....

Thursday, February 24, 2011

या देवी सर्वभूतेषु दृष्‍टि‍ रूपेण संस्‍थि‍ता



आंसू हर पल आंखों में नहीं तैरते,
लम्हा-दर-लम्हा -
जब्त हो जाते हैं,
विरोध का तेज बन जाते हैं.........
तुमने अपनी गरिमा में,
आंसुओं को बेमानी बना डाला,
अच्छा किया,
मैं वक्त की नजाकत का पाठ ,
भला कैसे सीख पाती!
तुमने मेरे वजूद की रक्षा में
ख़ुद को दाव पर नहीं लगाया ,
अच्छा किया,
मैं अपनी ज़मीन कहाँ ढूँढ पाती !
तुमने मेरे प्रलाप में चुप्पी साध ली,
अच्छा किया,
मैं पर्वत-सी गंभीरता कैसे ला पाती!
तुमने जो भी किया,
अच्छा किया,
मैं तुम्हारे पीछे भागना कैसे छोड़ पाती!


() रश्मि प्रभा





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या देवी सर्वभूतेषु दृष्‍टि‍ रूपेण संस्‍थि‍ता



इससे पहले कि तुम
मेरे आगे दोस्ती का दाना डालो
फिर प्रेम के रोने रोओ
और फिर
शादी के कागजों पर अंगूठा लगवाओ
तुम्हें जानना चाहिये
मैं तुम्हारी
सुबह की ताजा और गर्मा-गर्म
बेड-टी नहीं हूं
इसी तरह
वक्त पर
दोपहर, और रात का भोजन भी नहीं।
मैं वो कम्प्यूटराईज्ड मशीन नहीं हूं
जिसमें तुमने अपनी पसंद के
सारे शेड्यूल फीड कर रखे हैं
और वो मशीन
तुम्हें कपड़े, जूते, मोजे तुरन्त देगी
टूटे बटन टांक देगी
तुम्हारी मर्दानगी के सुबूत
बच्चे पैदा करेगी
पालेगी उन्हें तुम्हारे हिसाब से
मैं तुम्हारी वो जागीर नहीं हूं
जिसके रूप और समझदारी पर इतराते फिरो
कार में बगल वाली सीट पर सजाते फिरो।
जिसे तुम दोस्तों को दिखाते फिरो
मैं तुम्हारी शाम का रोमांस नहीं हूं।
मैं तुम्हारी रात का बिस्तर नहीं हूं।
मैं तुम्हारे वासनाओं की खूंटी नहीं हूं
कि कभी जींस, कभी स्कर्ट, कभी साड़ी
मुझ पर हर तरह के कपड़े टंगे रहें
जो तुमने फिल्मी हिरोइनों पर देखे हों, पसंद हों।
मैं जिम की वो मशीन नहीं
जिस पर
तुम वात्सयायन की नीली सीडियों में
रक्तचाप और बेहोशी बढ़ाती
उत्तेजक मुद्राएं आजमाओ।
तुम जिसके सपने देखते हो
मैं वो महिला आरक्षण भी नहीं
कि मैं सारे कामों के साथ
नौकरी भी करूं
इंतजाम करूं
तुम्हारे मोबाईल, टीवी, इंटनेट, कार के लिए पेट्रोल का
बच्चों के साथ सैर सपाटों का
मैं वो आधुनिक महिला नहीं
जो तुम्हारा अहसान माने
कि तुमने बिना कुछ किये
उसे आधुनिक होने दिया
और घर के साथ ही किसी दफ्तर और
दुनियां भर की जिम्मेदारियां, मगजमारियां दे दी।
मैंने पढ़ा सुना है
लक्ष्मी, शिवानी, ब्रम्हाणी के बारे में
गार्गी, मैत्रैयी, झांसी की रानी के बारे में
अगर तुमने भी सुना हो....
अगर किसी पूर्णता की तलाश में हो तुम भी
तो दो और
जीती जागती आंखों की सामर्थ्‍य की तरह
मुझे भी साथ ले चलो।
My Photo


()राजे शा
http://rajey.blogspot.com/

Wednesday, February 23, 2011

मृगमरीचिका नहीं --मुझे है जल तक जाना




बहुत रही भुलावे में हरि
अब लक्ष्य साधो
क्षितिज के भ्रम से
अब मुझे उबारो
प्यास हुई ये वर्षों की
अब पार उतारो ....................

रश्मि प्रभा



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मृगमरीचिका नहीं --मुझे है जल तक जाना


दूर दीखता निर्मल पानी
चमक देख मन में हैरानी
चमकीला सा पानी
जाकर झट पी जाऊं
अटक -भटक थी मेरे मन में
प्यास बुझाऊँ --


पृथ्वी की गति -वेग न पाऊँ---
भाग भाग फिर मैं थक जाऊं-
मैं रुक जाऊं -
चंचल मन में मोह था मेरे -
फिर उठ जाऊं -

पृथ्वी की गति -वेग न पाऊँ -
भाग- भाग फिर मैं थक जाऊं-
मैं रुक जाऊं .....!!!!
जीवन का यह चक्र -
समझ में पल ना आता -
काम -क्रोध-मद -लोभ से --
मेरा मन भरमाता --

मिथ्या पीछे चलते- चलते -
जब मैं थक कर हार गयी -
तब समझी मैं--- मार्ग मेरा क्या ॥?
निश्चित अब पहचान गयी -

जाग गयी चेतना --
अब मैं देख रही प्रभु लीला --
प्रभु लीला क्या -जीवन लीला ....
जीवन है संघर्ष तभी तो --
जीवन का ये महाभारत --

युद्ध के रथ पर --
मैं अर्जुन ...तुम सारथी मेरे ..
मार्ग दिखाना -
मृगमरीचिका नहीं ---
मुझे है जल तक जाना ...!!!

[IMG_8042.JPG]



अनुपमा सुकृती

Tuesday, February 22, 2011

अडवांसड टेक्नॉलजी... परेशाँ सा ख़ुदा !!




पतझड़ में गिरे शब्द फिर से उग आए हैं
पूरे दरख़्त भर जायेंगे फिर मैं लिखूंगी


रश्मि प्रभा





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अडवांसड टेक्नॉलजी... परेशाँ सा ख़ुदा !!



हैरां परेशाँ सा ख़ुदा एक दिन, बैठा-बैठा सोच रहा था
इन्सान की खाल चढ़ाए ये मशीन आख़िर किसने बनायी ?

मैंने जो बनाया था "इन्सां", उसमें तो एक दिल भी था !

बेचारा ख़ुदा!! कहाँ सोचा होगा उसने कि उसकी बनायी सबसे अनुपम कृति एक दिन इस क़दर बदल जायेगी कि उसे पहचानना तक मुश्किल हो जाएगा... मनु से उत्पन्न हुआ मनुष्य, मनुष्य ने बनायी मशीन और मशीन ने इस मशीनी युग का मशीनी इन्सान... जिसमें इंसानियत के सिवा बाक़ी सब कुछ है... समय के साथ इन्सान एकदम हाई-टेक हो गया है... रहन-सहन... खान-पान... आचार-विचार... यहाँ तक की बोल-चाल की भाषा भी... हर चीज़ बदल गयी है... और तो और इमोशंस तक प्लास्टिक हो चले हैं...

कम्प्यूटर के इस युग ने ख़ासा प्रभाव डाला है आज की पीढ़ी पर... कुछ चीज़ें तो जैसे आत्मसात सी हो गयी हैं आज हमारी ज़िन्दगी में... आज ये हाल हो गया है की कंप्यूटर ही क्या आम ज़िन्दगी में भी कुछ ढूँढना हो तो मुँह से बरबस ये ही निकलता है की "गूगल" कर लो :) ... पढ़ते हुए अगर किताब में कुछ नहीं मिलता है तो लगता है काश इस किताब में भी Ctrl+F (Find Key) काम करता या फिर कहीं से कुछ देख कर लिखना पड़े तो लगता है "क्या यारCtrl+C (Copy Key), Ctrl+V (Paste Key) होता तो कैसे चुटकियों में काम हो जाता..." कभी कुछ गलती होती तो झट से Ctrl+Z कर के Undo कर देते... ये कुछ ऐसी आदतें और ऐसे जुमले हैं जो बड़ी तेज़ी से प्रचलित हो रहे हैं आज की युवा पीढ़ी के बीच...

इस बदलती दुनिया की बदलती भाषा से प्रेरित हो कुछ बे-ख़याल से ख़याल आये थे कभी और यूँ ही कुछ अब्स्ट्रैक्ट सा लिख गया था... "इमोशंस" और "टेक्नॉलजी" की एक कॉकटेल सी बन गयी है... जाने कैसा स्वाद आया हो... ज़रा चख के बताइये तो :)


"Advanced Technology"


सुनते हैं टेक्नॉलजी बहुत अडवांसड हो गयी है
इन्टरनेट ने इन्सान की दुनिया बदल दी है
दुनिया भर की जानकारी पलों में ढूढ़ देते हैं
ये सर्च इंजन...
मैं बहुत टेक्नॉलजी सैवी नहीं हूँ
मेरी हेल्प करोगे क्या प्लीज़ ?
थोड़ा सा सुकून ढूंढ़ दो इस पर
और थोड़ा सा प्यार और विश्वास
हाँ थोड़े से फ़ुर्सत भरे पल भी...

"Oxygen"

तुम्हारे साथ के पल
अब बहुत छोटे हो चले हैं
इतने, की अब ठीक से
साँस भी नहीं आती
बीती यादों का ऑक्सीजन
कब तक ज़िन्दा रखेगा इन्हें
देखना, एक दिन इन पलों का भी
दम घुट जाएगा...

"Shift+Del"


कोई ई-मेल हो तो डिलीट कर दूँ
चैट हो तो चैट हिस्टरी से इरेज़ कर दूँ
कोई पुराना डॉक्युमेंट हो तो
शिफ्ट+डिलीट कर के
रिसाइकल बिन से भी हटा दूँ
पर क्या करूँ इन यादों का,
कि दिल की हार्ड डिस्क पर
कोई कमांड नहीं चलता...

"Dialysis"


तुम कहते हो
गुज़रे लम्हों को याद ना करूँ
"वो लम्हें" जो हर इक रग में
बह रहे हैं ज़िन्दगी बन कर...
तो फिर आओ
कुछ नये ताज़ा लम्हें
डोनेट कर दें इस रिश्ते को
डायलिसिस कर के
इसे फिर नयी ज़िन्दगी दे दें...


 

-- ऋचा
अपने बारे में क्या बताऊँ आपको , नवाबों के शहर लखनऊ में पली बढ़ी एक आम लड़की हूँ , a software engineer by profession. लेखिका नहीं हूँ सो शब्दों से खेलना नहीं आता पर सराहना ज़रूर आता है और ज़िन्दगी की छोटी छोटी चीज़ों में खुशियाँ तलाशना आता है ... बच्चों की मासूम किलकारी , फूलों की खुशबु , प्रकृति की शांति , रंग बिरंगी तितलियाँ , हवा में उड़ते गुब्बारे , बारिश की बूँदें , मिट्टी की सौंधी सी महक ... बरबस ही हमें अपनी ओर खींच लेते हैं ... i believe, with all its complications and uncertainties, life is still beautiful and worth living... u just have to face it with a positive attitude and take everything in ur stride !!

Monday, February 21, 2011

क्षणिकाएं




जीवन के विविध रूप,
विविध ख्याल
विविध एहसास ...... कुछ एक सा
कुछ जुदा सा
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रश्मि  प्रभा  







=====================================================

(1)

क्रेश
यह जानते हुए भी
कि
उसे मारपीट कर
जबरन सुला दिया जाता है वहाँ
मैं छोड़ जाती हूँ
अपनी सम्वेदनाओं के अबोध शिशु को
तर्कशक्ति के नज़दीकी क्रेश में.
क्या करूँ ?

यथार्थ के ऑफ़िस में ले जाने पर
काम ही नही करने देता
यह नन्हा
यह नादान.

(2)
जीवन के रंगमंच पर
माँ,बहन,बेटी,पत्नी,
देवरानी,जिठानी,बहू,सास,नन्द
जैसे चरित्रों को
संजीदगी से निभाते-निभाते
एक दिन
आँख भर आई मेरी
इन सारे चरित्रों के बीच
अपने "स्व" के कहीं खो जाने पर.
मन की इस व्यथा पर
कुछ बोलना चाहा होठों ने
किंतु शब्द मौन हो गए
लेकिन आँखे वाचाल होकर बोल उठीं
आँसुओं की भाषा...
उसी दिन मेरे कानों ने सुना था
औरत को कोई समझ पाया है आज तक?
सब त्रिया-चरित्र है
ऐक्टिंग मार रही है
नाटकबाज़ कहीं की!

(3)
"मेरे शरीर में रहता है एक वायरस
वैसे ही
जैसे अपने शरीर में रहता हूँ मैं खुद...
वैसे ही
जैसे रहते हैं यहाँ
खून,पानी,ऑक्सीजन,साँसें,
फेफड़े,गुर्दे,
चिंता ,
मुस्कुराहटें,
ह्ताशाएँ,निराशाएँ,आशाएँ..."

लोग बताते हैं
वायरस बहुत खतरनाक है.
लोग खतरों से डरते हैं
इसीलिए लोग वायरस से डरते हैं
इसीलिए लोग मुझसे भी डरते हैं
क्यों की मेरे ही तो शरीर में वायरस रहता है...
मैं वायरस से नही डरता
जो हमेशा साथ रहे उससे क्या डरना?
वो खतरनाक है
पर वो हमेशा मेरे साथ रहेगा,
मेरी अंतिम साँस तक ..
वो मुझे छोड़ कर कभी नही जाएगा
जैसे मेरे सभी दोस्त एक-एक कर चले गए
मुझे छोड़ कर
वायरस के कारण...
मरने से भी ज्यादा
मुझे 'छोड़े जाने' से डर लगता है
इसीलिए मुझे
वायरस से नही
दोस्तों से डर लगता है.
() मीनू  खरे  
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मीनू खरे: एक परिचय
भौतिक विज्ञान विषय से परास्नातक; शिक्षा, संगीत और जन-संचार विषयों से स्नातक; आकाशवाणी में ‘कार्यक्रम अधिशासी’पद पर कार्यरत सुश्री मीनू खरे ‘जन प्रसारण’के क्षेत्र में एक जाना-माना हस्ताक्षर हैं | रेडियो के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दस से अधिक राष्ट्रीय एवँ अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित, जिसमे भारत सरकार द्वारा ‘आउटस्टैंडिंग साइंस रिपोर्टिंग इन कम्युनिकेशन इन इलेक्ट्रानिक मीडिया’का राष्ट्रीय पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय रेडियो फेस्टिवल, ईरान में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित, ‘एशिया पेसेफिक इंस्टीच्यूट फॉर ब्राडकास्टिंग डेवलपमेंट’द्वारा पुरस्कृत, राष्ट्रीय एकता का ‘लासा कौल पुरस्कार’उल्लेखनीय; राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न सम्मानित पत्र-पत्रिकाओं में ‘रेग्युलर कॉलम’लेखन, कविता, कहानियाँ, लेख आदि प्रकाशित | ‘साइंस इज़ इंट्रेस्टिंग’और ‘मीनू खरे का ब्लॉग’में नियमित लेखन |

Sunday, February 20, 2011

दबंग यादें *********




यादों के गाँव से चिठ्ठी आई है
याद किया है अमरुद के पेड़ ने नन्हे पैरों की चहलकदमी को
जो उसकी पतली शाखाओं पर भी मचलते थे
याद किया है गोलम्बर ने
जिसके किनारे रजनीगन्धा की खुशबू हुआ करती थी
अब उसके किनारे दरक चले हैं कहीं कोई खुशबू नहीं
याद किया है आँगन ने जहाँ रात की ठंडी चादरों पर अन्ताक्षरी का दौर चलता
याद किया हैगन्ने से भरी बैलगाड़ी ने जिससे गन्ना खींच हमारी हँसी हवाओं में लहराती
याद किया हैस्कूल के पायों ने जो छुप्पा छुप्पी का आधार बनते थे
याद किया है हर यादों ने जहाँ हम बच्चे थे और हमारी आँखों मेंख्वाब ही ख्वाब थे ..........
इन यादों की चिठ्ठियों का क्या जवाब दूँ?





रश्मि प्रभा




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दबंग यादें
*********


मुई यादें हमेशा
पीठ पीछे करती हैं वार....
कई-कई तीर बिंध जाते हैं
छाती में और
उसके अन्दर का यन्त्र
कुछ पल के लिए
टीस के मारे
अपना काम भूल जाता है...
अतीत के चाक पर
समय बेतरतीब नाचने लगता है
घटनाएँ दर्शक बन
अगली पंक्ति में बैठने को
करने लगती हैं मारामारी
कुछ दबंग यादें
अपना रौब दिखाकर
चाक के बीचो-बीच
बैठ जाती हैं
जहाँ से कोई भी
माई का लाल उठा न पाए...
उसकी खुशामद में
दासानुदास बन जाते हैं
सोच के यन्त्र
अब चढावा चढ़ाओ
सारी सोच का
तब तक चढाते रहो
जब तक वे खुश न हों ...
आत्म शोषण का
एक रोमांचक खेल
भावनाएं एक अति से
दूसरे अति पर कूदती हुई
हम निरीह होकर
सिर्फ देखते रहते हैं....
दबंग यादें -इतनी बाहुबली कि
अतीत को भी
वर्तमान बनाने का
दम- ख़म रखती हैं....
और हम
उसी यंत्रणा-काल जनित
सुख-दुःख के भंवर में
उलझते चले जाते हैं .
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() मैं.... अमृता तन्मय ...पटना से ...शब्द मेरी जो पहचान बना दे .... या शब्द ही पहचानी जाने लगे ....ख़ुशी होगी .

Saturday, February 19, 2011

सफलता



एक ही सच !कहीं सही, कहीं गलत, और कहीं वक़्त की मांग !
रोटी में कभी चाँद कभी भूख कभी हवस !
कोई शरीर को आत्मा बना जीता है कोई शरीर को माध्यम बना जीता है

कोई शरीर को टुकड़े-टुकड़े में विभक्त कर जीता है
बात कहीं गलत तो कहीं सही कहीं व्यथा बनकर चलती है
किसी की ज़िन्दगी थम जाती है
कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता ...एक ही कैनवस पर सोच अलग-अलग होती है !



रश्मि प्रभा




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सफलता

 
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बहुत कुछ खोना पड़ता है
एकलव्य की तरह
आगे बढ़ने लिये |
राह चुननी पड़ती है
उस पर चलने के लिये |
होता आवश्यक
नियंत्रण मन पर
भटकाव से बचने के लिये
ध्यान केन्द्रित करने के लिये |
किसी कंधे का सहारा लिया
और बन्दूक चलाई भी
तब क्या विशेष कर दिया
यदि अपनी शक्ति दिखाई होती
सच्चाई सामने होती |
झूठा भरम टूट जाता
निशाना सही था या गलत
स्पष्ट हो गया होता |
सफलता चूमती कदम उसके
जो ध्यान केन्द्रित कर पाता
मनन चिंतन उस पर कर पाता |
जो भी सत्य उजागर होता
उस पर सही निर्णय लेता
यही क्षमता निर्णय की
करती मार्ग प्रशस्त उसका |
उस पर कर आचरण
जो भी फल वह पाता
शायद सबसे मीठा होता |
है सफलता का राज़ यही
कभी सोच कर देखा होता |

आशा

I am M.A. in Economics& English.Though I was a science student and
wanted to become a doctor,I could not. I joined education department
as a lecturer in English.I have a little literary taste .

Friday, February 18, 2011

अपराध बोध




अगर तुम चाहो
तो परिवर्तन संभव है...
पर तुम इस चाह से परे
दूसरों की प्रतीक्षा करते हो !
असंभव को संभव का आयाम तो दो
पानी की धारा को बदलने का सामर्थ्य
तुम्हारे ही भीतर है !

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रश्मि प्रभा





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अपराध बोध
...............

मैंने कब कहा
मैं औरों से अलग हूं,
मैंने कब कहा
मैं दुनिया से विलग हूं?
मैं मानता हूं
मैं भी उन्हीं के बीच से हूं
उसी समाज का अंग हूं,
जहां बहुओं को
दहेज के लिए जलाया जाता है।
जहां कन्याओं को
गर्भ में ही दफनाया जाता है,
जहां औरों के हक लूटकर
खुद का घर भरा जाता है।
जहां अपनों को ठगने का चलन
अपनाया जाता है,
और असल तो
ज्यों का त्यों
सूद के नाम पर
गरीबों के लहू से निचौड़ा जाता है।
......................
मैं भी उन्हीं के बीच
उन्हीं के समाज में रहता हूं
जहां बेटी से भी
कम उम्र की लड़की को
बुरी नजरों से देखा जाता है।
जहां सच को छुपाकर
झूठ और छद्म से
औरों की भावनाओं को छला जाता है।
मैं उस समाज
उस देश की परधि से
अलग कैसे हो सकता हूं?
.....
हां वेदना दुख
और कई बार
अन्तस में बहुत रोष होता तो है
लेकिन मैं
अपनी हद से आगे बढ़कर
कुछ कर नहीं पाता
कुछ बदल नहीं सकता।
जानता हूं, देखता हूं
लेकिन कुछ कर नहीं पाता
जिन हाथों में गरीब, मजलूमों
बेटियों, महिलाओं
और समाज की सुरक्षा का जिम्मा है
उन्हीं हाथों को
लहू से लिपटा पाता हूं।
अब तो आये दिन
आम होतीं ऐसी वीभत्स खबरें
किसी को भी विचलित नही करतीं।
नगरों-महानगरों में
किसी की अस्मत
किसी की गरीबी
किसी की जिन्दगी,
किसी की भावनाओं से खिलवाड़
बंद कमरों में
खबर बनकर उभरती हैं,
जो मीडिया से लेकर
नीति नियंताओं के लिए
मात्र औपचारिकता भर
प्रचार का माध्यम बन
रह जाती है।
मैं भी उसी खबर में
उसी भीड़ में
जब खुद को शामिल पाता हूं
तो अन्दर तक
अपराध बोध से घिर जाता हूं।।
दिनेश ध्यानी

Thursday, February 17, 2011

चुन ली मैंने जो राह नयी है ....




नए कदम दृढ़ हैं
अपनी राहों पे उन्हें भरोसा है
तो मंजिलें भी चलकर पास आने लगी हैं ....



रश्मि प्रभा

 


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मेरी तुकबन्दियाँ झेलते हुए आप लोगों को काफी समय हो गया है ...बर्दाश्त की आपकी हद की मैं कायल हो गयी हूँ और कृतज्ञ भी ... कल शाम यूँ ही अपनी डायरी पलटते बेटी ने अपनी कुछ पंक्तियाँ सुनायी ...मैं हैरान ...अंग्रेजी माध्यम से पढ़ी मेरी बेटी ने हिंदी के ये शब्द कब और कैसे चुन लिए ....बढ़ते बच्चे आपको किस कदर हैरान कर देते हैं ... बुलंद हौसले और उनकी चुनी हुई राह पढ़िए उसके ही शब्दों में और उसे अपना स्नेह और आशीर्वाद देकर अनुग्रहित करें ...

वाणी शर्मा
http://teremeregeet.blogspot.com/ 
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मेरी बेटी की पहली कविता ....


चुन ली मैंने जो राह नयी है ...


चुन ली है मैंने अपने लिए जो राह नई है
सपनों में पंख लगे हैं उड़ान नई है ....

एक मैं हूँ और एक मेरा विश्वास जवां है
इस राह पर देता जो मुझे आसरा है ...

कुछ जिद मेरी है कुछ मेरे उसूल भी हैं
जो मेरी इस राह के पुल बांधे हुए हैं ....

देते नहीं है मुझे भी इजाजत इसे तोड़ने की
दिन -दिन बिता कर रोज और मजबूत हुए हैं ...

सपने भी हैं संजोये यहाँ बड़ी शिद्दत से मैंने
तन्हाई की एक सच्चाई का सामना भी है ...

समझा है जिसने उनसे मिला प्यार भी है
जो ना है समझा उनसे मिली दुत्कार भी है ...

दुःख भी मिले सुख के एहसास भी हैं
कडवापन है इसमें तो कुछ मिठास भी है ...

हर पल मिली मुझे इस पर एक सीख भी है
हर पल मिली खुश रहने की एक चाह भी है ...

राह है जिस पर मिलता मुझे भगवान् मेरा है
डगमगाऊं जो मैं कभी तो मुझको थामता है

कहता है वो ये तू है जिसे मैंने चुना है
इंसान बन और बता कि एक इंसान क्या है

यही राह सिखलाती है मुझे इंसान बनना
दूसरों के आंसूं पोछना है खुशगवार कितना ...

दिल में ठनी एक रार और तकरार सी है
कहती है मुझे तू सही तेरा ईमान सही है

रख मजबूती से कदम भले राह कठिन है
तेरा विश्वास सही है तूने चुनी जो राह सही है


यही मिलती है मुझे मन की तृप्ति मेरी
करती है मेरे इरादों को बुलंद वह चाह यही है

इन्ही हौसलों से मैं कुछ कर गुजरना चाहती हूँ
राह सही है मेरी यही सिद्ध करना चाहती हूँ ...

......श्रुति शर्मा

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण