ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Monday, January 31, 2011

बहुत लड़ता था तुझसे






बीते हुए पल
किस कदर साथ साथ चलते हैं
आज कितना भी सुहाना हो
पर वो बचपन .... वो लड़ाई
याद आते ही दिल मचल जाये ...



रश्मि प्रभा



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बहुत लड़ता था तुझसे

बहुत लड़ता था तुझसे!

पतीले भर दूध का बड़ा टुकड़ा
किसे मिले,
सेवैय्यों की बड़ी लड़ी
किसके हिस्से जाए,
राशन के साथ मुफ़्त में नसीब हुए
कुछ नेमचुस (लेमनचुस)
बँटे तो कैसे,
"घुरा" पर आग तापते वक़्त
पापा के लिए "पीढा"
कौन लाने जाए?

तेरी जिद्द से हारकर
मैं हीं ले आता था,
लेकिन लड़ता ज़रूर था
और हाँ, डाँटता भी था,
"बड़ा जो हूँ,
इतना हक़ तो बनता है,"
बस यही सोचता था हर बार
और डपट देता था तुझे।

तू गुस्साती थी,
"सोणे" चाँद जैसे मुखरे को
फुलाकर "सूरज" बन जाती थी.. लाल-लाल.. सुनहरा
और सिमट जाती थी खुद में हीं..
मैं "डरपोक"
कभी भी मना न पाया तुझे,
हर बार माँ से कहकर
तुझे तेरे "कवच" से निकलवाकर बाहर मंगाता था
और फिर से
लड़ बैठता था।

सब कहते थे-
"एक पीठ पर के बच्चे हैं"
तो नोंक-झोंक होगी हीं,
लेकिन हमारे लिए यह
कुछ और हीं था,
मेरा खाना नहीं पचता था
तेरी हर बात को काटे बिना
शायद!
और तू?
तू अपने मन की मुराद
कह नहीं पाती थी खुल के
और मैं या शायद सभी
तुझे घमंडी मान बैठे थे,
इसलिए तू गुस्सा होती थी और बाकी सब
नाराज!

यही चलता रहा
और फिर एक दिन
तेरी डोली सज गई।
तू बन-सँवरके बैठी थी
गोटीदार लहँगे में,
शर्माई-सी, सकुचाई-सी
और चुटकी भर परेशान..
मैं कमरे में जाता,
तुझे मुझ पर तकता पाता
और "अवाक" रह जाता।
क्या बोलूँ मैं?
कैसे बोलूँ मैं?
कैसे लड़ूँ मैं?
यही सोचता हुआ
निकल आता मैं बाहर।
सच्ची
मैं पूरे दो दिन तक
चुप हीं रहा... सच्ची!

भैया!

जब मैं पूरी ताकत से
तुझे ठेल रहा था
किसी और की हथेली में
और खुलने हीं वाला था अपना रिश्ता
नोंक-झोंक वाला..
तूने पूरे ज़ोर से यही पुकार लगाई थी
"नहीं भैया"
और मैं "काठ"-सा हो गया था पल भर को..
सबकी आँखें नम थीं,
लेकिन मैं "निर्मोही" तब भी
एक बूँद न ठेल पाया आँखों से..
मैं "कसाई"!

तेरे जाने के बाद
मैं ढूँढता रहा "उसे"
जिसकी हर बात पर मैं
कसता था फिकरे,
लेकिन आह!
मुझे कोई न मिला
और तब सच्ची
मेरी आँखों से "गंगा" निकल आई।
तब जाना मैंने
तू क्या थी,
पूरे बाईस-तेईस साल
मैंने क्या खोया था
और अब क्या खो दिया है
किसी "खास" के हाथों!

तब से आज तक
प्रायश्चित हीं करता रहा हूँ,
उस "ऊपर वाले" से हर पल
माँगता था.. वो बीते हुए दिन!
और आज
"नए पैकेट" में मुझे पुराने लम्हे
अता कर दिए उसने!

आज एक पीढी ऊपर हो गया मैं!

सुबह-सुबह ढलते चाँद
और जगते सूरज ने मुझे ख़बर दी
कि
मेरी "मुँह फुलाने वाली" भगिनी (संस्कृत की)
ने मुझे भगिनी (भांजी) का तोहफ़ा दिया है..

इस बार गलती नहीं करूँगा..
इस बार जी भरकर लड़ूँगा अपनी भगिनी से
लेकिन हर बार हारूँगा
जान-बूझकर
सच्ची!

बहुत लड़ा था तुझसे,
अब इसकी बारी है.. हाहा!


My Photo
विश्व दीपक (Vishwa Deepak)
my google profile:
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Sunday, January 30, 2011

तुम




रिश्तों की बंदिशों से परे
एक ख्वाब हो
जिसे देखने की खातिर
मैं सबकुछ भुलाकर चलती हूँ
चाँद जलता है तो जले
मैं अपनी बन्द पलकें खोलूंगी नहीं
सुबह से पहले कुछ और नहीं ....

 




रश्मि प्रभा







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[parul2.jpg]
तुम 


नींद की हथेली पर
एक ख्वाब रख गए थे तुम
या कि मेरी उम्र का
हिसाब रख गए थे तुम!
यूँ भी कुछ नमकीन था
तेरा अनकहा आफरीन था
ख़ामोशी की आह पर
एक किताब लिख गए थे तुम!
हरफ-हरफ जैसे बरस
मैं देर तक जीता गया
जिंदगी के सवाल पर
शायद एक जवाब रख गए थे तुम !
सुलगी तिल्ली रात की
और चाँद जैसे जल उठा
जानता हूँ वो बदरंग हुआ
तो नीला नकाब रख गए थे तुम !
()पारुल

Saturday, January 29, 2011

बेबस ज़िन्दगी




मुझे अकेलेपन से घबराहट तो नहीं होती पर जब एक लम्बा$$$$$$$ वक़्त गुज़र जाता है तो यादें अलसाने लगती हैं दीवारें जुम्हाइयां लेने लगती हैं फिर मैं उम्मीदों की नन्हीं उंगलियाँ थामती हूँ- जल्दी ही रात होगी चाहूँ ना चाहूँ नींद भी आ जाएगी और सवेरा हो जायेगा ....
 



रश्मि प्रभा




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बेबस ज़िन्दगी
ज़मीन और जिस्म के बीच सुगबुगाता आदमी
जैसे फूट रही हो बाँस की कोपलें
छू ली मैंने बहती हुई रात
कितनी सर्द, कितनी बेदर्द
करने लगी मज़ाक अपने आप से गरीबी
कितनी रातों से नहीं सोती है नींद मेरी
भीग गये अब तो आँसू भी रोते-रोते
एक सदी का सा एहसास देता है पल
घाव-सा कुछ है सितारों के बदन पर
आँखं छिल जायेंगी देखोगे अगर चाँद
काट दिये किसने पर हवाओं के
बिल्ली के पंजों में आ गया बादल
आज फिर मुसलाधार बरसा है लहू
पानी का रंग लाल है सारे नालों में
एकत्र करता हूँ बोतल में काली धूप
मुट्ठी से फिसल जाती है ज़िन्दगी मेरी
देख रहा है उदास काँच का टूकड़ा
आज भी टेढ़ी है उस कुतिया की दुम
मचलती जाती है नदी मेरी बाहों में
कितना मटमैला है शाम का क्षितिज
टूट गया कोई हरा पत्ता डायरी से
वर्षों से खाली पड़ा है एक कमरा
चूम लेती है मुझे तस्वीर बाबूजी की
याद का कोहरा घना है बहुत
वह जो मिला था पॉकेटमार था शायद
चॉकलेट नहीं है अब जेब में मेरी
हर एक पल बढ़ती रही भूख बच्चों की
उबलता रहा सम्बन्ध का सागर
खो गई जाने कहाँ दूध-सी मुस्कान
पिछले साल माँ ने मेरी स्वेटर पर
उकेरा था एक नदी और एक चिड़िया
नदी में डूब कर मर गई वह चिड़िया
और बन्द हो गया आदमी का सुगबुगाना

My Photoत्रिपुरारि कुमार शर्मा
http://tanhafalak.blogspot.com/
शिक्षा- एम.ए. (पत्रकारिता) अध्ययन जारी ।
प्रकाशन- दैनिक हिन्दुस्तान, साहित्य अमृत,(वेब),जानकी पुल (वेब), सरिता,मुक्ता, संचेतना, दि गौड़सन्स टाइम्स जैसी पत्र-पत्रिकाओं – में कविता,कहानी, ग़ज़ल एवं लेख प्रकशित । जानकी पुल और सृजनगाथा के लिए लेखन ।
सह-लेखन- स्मृति में साथ (डॉ. नरेंद्र मोहन पर केंद्रित संस्मरण-संग्रह) ।
सम्मान- श्री गुरू तेग़ बहादुर खालसा महाविद्यालय (दिल्ली विवि) में (2007-09) तक ‘बेस्ट ऑल
राउन्डर स्टूडेंट’ (हिन्दी) का सम्मान । दिल्ली विश्वविद्यालय की (अंतर महाविद्यालय) काव्य एवं अन्य
प्रतियोगिताओं में कई बार पुरस्कृत ।
विशेष- हिंदी, मैथिली और उर्दू में कविता-कहानी लेखन । मैथिली, उर्दू और अँगरेज़ी कविताओं का हिंदी
अनुवाद ।
संप्रति- सह-सम्पादक @ स्वाभिमान टाइम्स (हिंदी दैनिक अख़बार) ।

Friday, January 28, 2011

आहट



हवा मुझे छूकर गई है
कानों में गुनगुना के गई है
बांयी आँख फड़की है
हिचकी भी आई है .... कहीं यह सब तुम्हारे आने की आहट तो नहीं !

रश्मि प्रभा




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कहीं यह तुम्हारे आने की आहट तो नहीं !

घटाटोप अन्धकार में
आसमान की ऊँचाई से
मुट्ठी भर रोशनी लिये
किसी धुँधले से तारे की
एक दुर्बल सी किरण
धरा के किसी कोने में टिमटिमाई है !
कहीं यह तुम्हारी आने की आहट तो नहीं !

गहनतम नीरव गह्वर में
सुदूर ठिकानों से
सदियों से स्थिर
सन्नाटे को चीरती
एक क्षीण सी आवाज़ की
प्रतिध्वनि सुनाई दी है !
कहीं यह तुम्हारे आने की आहट तो नहीं !

सूर्य के भीषण ताप से
भभकती , दहकती
चटकती , दरकती ,
मरुभूमि को सावन की
पहली फुहार की एक
नन्हीं सी बूँद धीरे से छू गयी है !
कहीं यह तुम्हारे आने की आहट तो नहीं !

पतझड़ के शाश्वत मौसम में
जब सभी वृक्ष अपनी
नितांत अलंकरणविहीन
निरावृत बाहों को फैला
अपनी दुर्दशा के अंत के लिये
प्रार्थना सी करते प्रतीत होते हैं
मेरे मन के उपवन में एक
कोमल सी कोंपल ने जन्म लिया है !
कहीं यह तुम्हारे आने की आहट तो नहीं !
मेरा फोटो

साधना वैद
मेरे बारे में
एक संवेदनशील, भावुक और न्यायप्रिय महिला हूँ । अपने स्तर पर अपने आस पास के लोगों के जीवन में खुशियाँ जोड़ने की यथासम्भव कोशिश में जुटे रहना मुझे अच्छा लगता है ।

Thursday, January 27, 2011

देखो न !


कौन है
जो ब्रह्ममुहूर्त में
चिड़ियों को दाने देता है?
ये कौन है !



रश्मि प्रभा




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देखो न !
धड़कने बढ रही है ,
सांसे तेज हो रही है ,
ऑंखें बंद हो रही है ,
मै शिथिल पड़ रही हूँ !
ये कैसा डोर है
जो मुझ तक
तेरी हर आहट
को पहुंचा जाती है !
ये कौन सा बंधन है
मै तो मुर्ख हूँ
तू तो ज्ञानी है
मुझे समझा दो न ..!!!

My Photoसाधना

Wednesday, January 26, 2011

इमरोज़- मेरी कलम से .....

२६ जनवरी : इमरोज़ जी की वर्षगांठ पर वटवृक्ष की विशेष प्रस्तुति




पत्तों पर छलकती ओस की बूँदें
आती हैं बनकर इमरोज़
आतुर रहती हैं हर प्रातः
एक नज़्म सुनाने को
चिड़ियों का कलरव बनकर
पायल कि रुनझुन बनकर
प्रेम राग में डूबी-सिमटी
चाँद के रथ में आती छनकर
हर रोज़ शक्ल ले नज्मों की
कोई प्यार का गीत सुनाती है
गिर कर सुर कोई न भटके
बढ़ती हूँ हथेली में भरने
छन से गिरते हर साज़ को मैं
अपनी आँखों से लगाती हूँ
फिर जीती हूँ पूरे दिन को
इमरोज़ बना कर आँखों में...

 




रश्मि प्रभा



 

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इमरोज़ की कलम से इमरोज़
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खेतों में खेलने के बाद रंगों से खेलने के लिए मैं लाहौर के आर्ट स्कूल में पहुँच गया कुछ बनने कुछ ना बनने से बेफ़िकर तीन साल आर्ट स्कूल में मैं रंगों से खूब खेला
जो कुछ हो चुका हैउसे दुहराने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं कुछ नए की तलाश में रहता हूँ-इंतज़ार भी करता
हूँ ...

मेरे लिए ज़िन्दगी एक खेल हैअपने बैट से ज़िन्दगी को ख़ूबसूरती से खेलता रहता हूँ...
आर्ट्स स्कूल के बाद ज़िन्दगी के स्कूल में भी रंगों से खेलना जारी रहा --कभी सिनेमा के बैनरों के रंगों सेकभी फिल्मों के पोस्टरों के रंगों सेखेल चलता रहा...
एक दौर कैलीग्राफी का भी आयाउर्दू के 'शमा' मैगजीन में कोई छः सालमैं अपनी तरह की कैलीग्राफी करता रहारंगों में भी खेल जारी रहाज्यादातर पेंटिंग बनी-ख़ास तरह के टेक्सटाइल केडिजाईन भी बने और घड़ियों के नए-नए डायल भी --और ज़िन्दगी कमाने के लिए बुक कवरसरंगों से खेलते-खेलतेज़िन्दगी चलती रही है
एक उम्र शायरा अमृता के साथमुहब्बत और आजादी का सत्संगसारी ज़िन्दगी ने देखाऔर जब अमृता पेड़ से बीज बन गईतो एक नया मौसम आ गयाअनलिखी नज्मों को लिखने का मौसम--जो मैं अब लिख रहा हूँ ....

और आखिर में मुझसे यूँ कहते हुए--------------

रश्मि,

कई सवाल होंगे जो तुमने अभी पूछे नहीं पर वो ज़िन्दगी में हैं कई शक्लों में
मेरी नज्में अक्सर सवाल भी उठाती हैं और जवाब भी ढूंढती हैं

इमरोज










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इमरोज़

My Photo

इमरोज़ !
यानि आज -
रब की देन
इबादत में सर झुक जाता है!
इमरोज़ !
ओस नहाई भोर
या पूनम की रात
कोई इतना सहज,सरल,पारदर्शी हो सकता है
यह सुबह शाम
उनके बारे में सुनते हुए जाना ...
इमरोज़ !
प्यार के बेमिसाल स्तम्भ
मधुर भावनाओं की सच्चाई हैं
- स्फटिक की तरह ...
इमरोज़ - अमृता के
प्यार को पूजा माननेवालों के दिलों में रहते हैं !
सरस्वती प्रसाद
http://kalpvriksha-amma.blogspot.com/
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जब कविता में

My Photo
इन्द्रधनुषी रंग घुलने लगें,
एक स्पंदित चित्र उभरने लगे,
तो संशय न करना ---
जो व्यक्ति काव्य में,
जीवित है,
वो "इमरोज़" ही है---
जब चित्रों के मौन में,
शब्द गूँजने लगें,
प्रेम घोलने लगें,
आसक्ति से विद्रोह कर,
अनुरक्ति बोलने लगे,
समझो कि-----
चित्रों में रंग नहीं,
"अमृता" बसी है---

ज्योत्स्ना पाण्डेय


काश एक इमरोज.........

काश एक इमरोज मेरी भी ज़िन्दगी में होता......
तो जीने का फलसफा ही कुछ और होता,
मैं चलती, मेरे संग संग चलता वो......
जो रूकती, तो पल भर को ठहर जाता वो भी,
हर अश्रु को मोती बना देता वो.....
जो रोती तो पल भर को सहम जाता वो भी,
मैं हंसती खिलखिला उठता वो......
जो मुस्कुराती तो अपने गम में भी मुस्कुरा उठता वो भी,
मेरी हर हार को जीत बना देता वो......
मेरी जीत के लिए जीती बाजी हार जाता वो भी,
मेरी धुन में गूँज उठता वो........
जो गाती मैं तो संग संग गुनगुना उठता वो भी,
मैं झूमती तो नाच उठता वो........
जो गिरती मैं तो चलते चलते लड़खड़ा जाता वो भी,
जो मरती तो मुझे अमर कर जाता वो,
मेरे मरने के बाद भी अपनी कलम से मुझे जिवंत कर जाता वो.........
काश एक इमरोज.........

रानी मिश्रा

My Photoइमरोज़ मेरी कलम से .....
"एक सूरज आसमान पर चढ़ता है. आम सूरज सारी धरती के लिए. लेकिन एक सूरज ख़ास सूरज सिर्फ़ मन की धरती के लिए उगता है,इस से एक रिश्ता बन जाता है,एक ख्याल,एक सपना,एक हकीक़त..मैंने इस सूरज को पहली बार एक लेखिका के रूप में देखा था,एक शायरा के रूप में,किस्मत कह लो या संजोग,मैंने इस को ढूंढ़ कर अपना लिया,एक औरत के रूप में,एक दोस्त के रूप में,एक आर्टिस्ट के रूप में,और एक महबूबा के रूप में !"

कल रात सपने में एक
औरत देखी
जिसे मैंने कभी नही देखा था
इस बोलते नैन नक्श बाली को
कहीं देखा हुआ है ..

कभी कभी खूबसूरत सोचे
खूबसूरत शरीर भी धारण कर लेती है...

ऐसे शब्द लिखने वाला इंसान ,कहने वाला इंसान यदि सामने बैठा हो तो उस से एक रूहानी रिश्ता खुद भी खुद जुड़ने लगता है ...अमृता से मिलने की इसी चाह ने मुझे उनके घर तक पहुंचाया पर वहां तब जब अमृता सशरीर उपस्थित नहीं थी पर इमरोज़ के लफ़्ज़ों से आज भी वो वही थी ...तभी तो इमरोज़ के मुहं से एक बार भी थी नहीं सुना अमृता के लिए और वो प्यार जिसको कभी कहने की बताने की जरुरत नहीं पड़ी एक दूजे को वह प्यार कितना पावन होगा ....

मैंने अमृता प्रीतम को बहुत छोटी उम्र से पढना शुरू किया था ,इमरोज़ उस लिखे में एक साये की तरह साथ साथ चलते रहे ..और अमृता की तरह ही मेरी सोच ने भी एक साया खुद में बुन लिया ..पर हर किसी को इमरोज़ मिले यह कहाँ मुमकिन है ...पर साक्षात् जब इमरोज़ से मिली और जो प्यार मैंने अमृता के लिए उनकी आँखों में उनके न रहने पर भी देखा तो सच कहूँ ...एक ख़ुशी के साथ कि प्यार अभी भी इस जमीन से उठा नहीं ,एक हलकी सी जलन भी दे गया कि क्या आज के युग में भी कोई किसी को इतना प्यार कर सकता है ..बिना किसी स्वार्थ के ....

चालीस साल में कभी भी अमृता और इमरोज़ ने एक दूसरे को I LOVE U नही कहा ..उन्हें कभी इस लफ्ज़ की ज़रूरत ही नही पढ़ी ..वैसे भी प्यार तो महसूस करने की बात है उसको लफ़्ज़ो में ढाला भी कैसे जा सकता है ......बस दोनो ने एक दूसरे की ज़रूरत को समझा ....कभी एक दूजे को बदलने की कोशिश नही की .... .यही तो प्रेम की प्रकाष्ठा है ..इस से उपर प्रेम और हो भी क्या सकता है ..

इमरोज़ नाम मेरे लिए तो प्यार लफ्ज़ का एक दूसरा नाम है एक ऐसा लोक गीत.एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे सामाजिक मंजूरी की जरुरत नही पड़ती है ...

मैं एक लोकगीत
बेनाम ,हवा में खड़ा
हवा का हिस्सा
जिसे अच्छा लगूं
वो याद कर ले
जिसे और अच्छा लगूं
वो अपना ले --
जी में आए तो गा भी ले
मैं एक लोकगीत
जिसको नाम की
जरुरत नही पड़ी...

इमरोज़ शब्द मतलब आज टुडे ..उन्होंने अपना यह नाम खुद ही रखा उनसे मिलने पर यह भी जाना कि उनका सेन्स ऑफ़ हयूमर भी बहुत गजब का है वह छोटी छोटी बातो में भी हंसने की वजह तलाश लेते हैं और बहुत ही दार्शनिक बातें कह जाते हैं ..एक बार एक दोपहर में खाना लगा हुआ था कि इमरोज़ कहीं चले गए ...अमृता ने आवाज़ दी ----इम्मा जी (वह इमरोज़ को इम्मा कह कर बुलाती थी कभी कभी ) और कभी अलीजा जिसका मतलब है सखी मित्र सखा या आदर योग्य सबका अजीज अलीजा ....और इमरोज़ अमृता को कभी माँ सदके ,कभी बुल्ले शाह या अधिक माजा कह कर बुलाते .प्यार के कितने नाम ...कभी कभी तो जिंदगी एक नाम के लिए किसी विशेष से सुनने को तरसती रह जाती है और इंतज़ार रह जाता है कि कोई तो हो जो उसको प्यार के नाम से न सही उसके नाम सी ही पुकार ले ...खैर यहाँ बात अमृता के इमरोज़ की हो रही है ....माजा नाम उन्होंने अमृता का एक स्पेनिश नावल से पढ़ कर रखा जिसका मतलब होता है बिलकुल मेरा अपना ...तो अमृता ने इमरोज़ को पुकार कर कहा कि रोटी के वक़्त आप कहाँ उठ कर चले जाते हैं इम्मा जी ...इमरोज़ बोले माजा छत पर तेरी टंकी में पानी लगाने गया था ,तेरी टंकी में पानी लगाने के लिए बाकी टंकियों का पानी बंद करना पड़ता है ...........और आगे कहा ..जैसे तुझसे मिलने के लिए बाकी समाज से मिलना बंद करना पड़ता है ..अमृता ने यह सुन कर इमरोज़ का माथा चूम लिया ....
समाज की परवाह कब की इमरोज़ ने ..वह अमृता के लिए एक उस घने पेड़ की तरह रहे जिसकी छांव में अमृता बेफिक्री से सोती जागती ,मुस्कारती रही ...इमरोज़ ने एक जगह लिखा है
कानून
किसी अजनबी मर्द औरत को
रिश्ता बनाने का
सिर्फ मौका देता है
रिश्ता नहीं ...
रिश्ता बने या न बने
इसका न कानून
फ़िक्र करता है
और न जिम्मा लेता है

इमरोज़ मेरी कलम से जितना भी लिखूं उतना ही कम होगा ..मेरे लिए वह अमृता से ही पूजनीय हैं और जब जब यह एहसास दिल में जागेगा कि प्यार लफ्ज़ में बहुत सच्चाई है अभी भी इस दुनिया में तो इमरोज़ का ही मुस्कराता चेहरा यह गुनगुनाते हुए सामने आ जायेगा ..........

प्यार सबसे सरल
इबादत है
बहते पानी जैसी ....

ना इसको किसी शब्द की जरुरत
ना किसी जुबान की मोहताजी
ना किसी वक़्त की पाबंदी
और ना ही कोई मज़बूरी
किसी को सिर झुकाने की

प्यार से ज़िन्दगी जीते जीते
यह इबादत अपने आप
हर वक़्त होती रहती है
और --जहाँ पहुँचना है
वहां पहुँचती रहती है ....


रंजना (रंजू ) भाटिया

Tuesday, January 25, 2011

ग़ज़ल



चाँद फिसलकर आ गया है खिड़कियों पर
ग़ज़ल की ताबीर ही कुछ ऐसी है ...



रश्मि प्रभा





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(ग़ज़ल)

चाहते हैं लौ लगाना आप गर भगवान से
प्‍यार करना सीखिये पहले हर इक इंसान से

खार के बदले में यारो खार देना सीख लो
गुल दिया करते जो, वो लोग हैं नादान से

जब तलक उनको जरूरत थी मुझे अपना कहा
और उसके बाद फिर वो हो गए अनजान से

आजकल हैं लोग ऐसे क्यूँ जरा बतलाइये
सांस तो लेते हैं पर लगते हैं बस बेजान से,

एक दिन तन्हा वही पछताएंगे तुम देखना
तौलते रिश्‍तों को हैं जो फायदे नुकसान से

आप बेहतर है कि मेरे काम ही आएं नहीं
गर दबाना चाहते हैं बाद में एहसान से

बढ़ के कोई पांव छूता है बुजुर्गों के अगर
लोग रह जाते हैं उसको देख कर हैरान से

ढूंढते ही हल रहे हम उन सवालों का सदा
जो हमें लगते रहे हरदम बड़े आसान से

खेलने के गुर सिखाना तब तलक आसान है
जब तलक हो दूर ‘नीरज’ खेल के मैदान से
...
My Photoनीरज गोस्वामी

मेरे बारे में
अपनी जिन्दगी से संतुष्ट,संवेदनशील किंतु हर स्थिति में हास्य देखने की प्रवृत्ति.जीवन के अधिकांश वर्ष जयपुर में गुजारने के बाद फिलहाल भूषण स्टील मुंबई में कार्यरत,कल का पता नहीं।लेखन स्वान्त सुखाय के लिए.

Monday, January 24, 2011

खून अपना पराया - लघु कथा





बात अपने खून की होती है , दूसरे का खून पानी होता है - दर्द की भी क्या परिभाषा है !

जहाँ ज़िन्दगी मौत सी सूनसान हो , वहाँ अपनत्व के ख्याल का कतरा ... लगता है जैसे

दिल-दिमाग पर कोई हथौड़ा चला रहा हो !!!

 

 

रश्मि प्रभा




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खून अपना पराया



वो रो रही थी | हाथ जोड़ रही थी | तुमने घर के सभी लोगो को मार दिया | हमने क्या बिगाड़ा था | तुम्हें कहा भी था – घर में जो कुछ भी है ले जाओ तुम, पर तुम लोग नहीं माने .. माना हमारे दिन दरिद्रता में गुजर रहे है किन्तु घर में राशन- पानी, शादी के गहने बर्तन हैं, सब ले जाओ सब और मुझे भी मार दो पर मेरी इस दुधमुँह बच्ची को तो छोड़ दो, वो किसी को नहीं पहचान सकती | तुम्हारा कभी कुछ नहीं बिगाड़ेगी | सामने खड़े नौ कातिलों में से किसी के भी चेहरे पर कोई भी दया का भाव न उभरा | एक लड़का लगभग उन्नीस साल का, आगे बढ़ा | बच्ची को गोद से छीन लिया| महिला रोती गिडगिडाती रही और पर उस दरिंदे कातिल को रंच मात्र भी दया नहीं आई | उसने बच्ची को पानी के टेंक में फैंक दिया और बाकियों ने महिला का काम तमाम किया | मिल कर घर का सामान लूटा और चल दिए अपने अपने घर को...
कल्लू को चिंता थी कि राकू ( बेटा ) की शादी कैसे होगी और तिस पर मुखिया भवरे की बेटी से | कच्छाबनियान धारी कहते हैं लोग उनके गिरोह को और राकू का गिरोह के मुखिया भवरे पर अच्छी छाप है किन्तु अभी तक राकू ने महज चोरी चकारी, लूटपाट और ठगी ही की थी| कोई बड़ा काम नहीं किया था| अभी तक उसकी गिनती में एक का आंकड़ा भी जमा नहीं था | नाक नीची हो जाती जब बिरादरी वाले पूछते रिश्ता करने चला, पहले बेटे को लायक तो बना| और आज राकू ने कर दिखाया| आज उसने दो की संख्या जोड़ ली| एक दूधपीती और एक जवान |
घर पहुंचा तो राकू की माई बोली -ओए आ गया | इबकी कुछ नया कर के आया भी तू या यूँ हि वापस आ ग्ग्या | कल्लू ने सीना चौड़ा कर के बताया -आज तो दो जोड़ लिए अपने राकू ने, इब तू भवरे से बात चला राकू की शादी की | बैसे आज उस घर के पांच लोगों का सफाया किया | माई ने पूछा वहाँ मारामारी में कोई जोराजारी तो नहीं करनी पड़ी | कल्लू बोला - हां छोटी को तो आराम से बस पानी में .. पर वो जवान लौंडा थोडा तकड़ी काठी का दबंग था सो राकू को परेशानी हुवी तो हमने भी साथ जोर लगा दिया और कर दिया उसको साफ़ .. माई बोली ऐ राकू कहीं चोट तो न लग्गी तुझे , तुझे तो खूब तेल मल कर भ्भेज्जा था | राकू ने दिखाया - कुहनी में खरोंचे थे नाख़ून के | माई का दिल दर्द से भर गया .. पट्टी के लिए चुन्दडी का किनारा फाड़ के हल्दी तेल का मलहम बनाने लगी |

[niti.bmp]
डॉ नूतन गैरोला 

..http://amritras.blogspot.com/
मेरे बारे में -


जीती रही जन्म जन्म... पुनश्च मरती रही.... मर मर जीती रही पुनः..... चलता रहा सृष्टिक्रम... अंतविहीन पुनरावृत्ति क्रमशः~~~~... पेशे से डॉक्टर / स्त्री रोग विशेषज्ञ... बहुत दुखी देखे है |... जिंदगी और मौत की गुत्थमगुत्था -.. छटपटाता जीवन- घुटने टेकता मिटते देखा है |.. जिंदगी की जंग जीती जाए.. अमृतरस की आस है |..


बहुत कुछ सोचने को है, बहुत कुछ बोलने को है, पर चुप हूँ - देखतीं हूँ आप सभी के क्या विचार हैं |

Sunday, January 23, 2011

कॉफी विद कुश (एक कप कॉफी.. कई राज़ खुलवा देती है )



एक कप कॉफ़ी ... नरम गरम दिलचस्प बातें ...
कुश जी हों या करण जौहर ....
दोनों जानते हैं कॉफ़ी की खासियत - तो चलिए एक कप कॉफ़ी हमारी भी हो जाये .................




रश्मि प्रभा




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नमस्कार दोस्तो,

कॉफी विद कुश के एपिसोड में आप सभी का स्वागत है.. आज हम आपको मिलवाने वाले है एक ऐसी ब्लॉगर से जो एक नही, दो नही पूरी पंद्रह ब्लॉग्स पर लिखने वाली लेखिका से.. इनका अमृता जी, मीना कुमारी जी और गुलज़ार प्रेम तो हम इनकी ब्लॉग्स पर देख ही चुके है.. आइए जानते है कुछ और खास बाते इनके बारे में.. तो दोस्तो स्वागत कीजिए कॉफी विद कुश के आज के एपिसोड में ब्लॉग 'कुछ मेरी क़लम से' की लेखिका रंजना जी (रंजू) से..

कुश : स्वागत है रंजू जी आपका कॉफी विद कुश में... कैसा लग रहा है आपको यहा आकर ?
रंजना जी : अच्छा!! माहोल अच्छा है यहाँ का..काफी पीते हुए कुछ लिखा जा सकता है :)


कुश : सबसे पहले तो ये बताइए ब्लॉग्गिंग में कैसे आना हुआ आपका ?
रंजना जी : अपनी छोटी बेटी की वजह से ..उसके ब्लॉग को देख कर अपना ब्लॉग बनाया


कुश : हिन्दी ब्लॉग जगत में किसे पढ़ना पसंद करती है आप ?
रंजना जी : बहुत हैं सब के नाम लेने यहाँ बहुत मुश्किल होंगे ..सब अपने तरीके से अच्छा लिखते हैं .समीर जी का ब्लॉग और उनकी लिखी पुरानी कई पोस्ट मैं अक्सर पढ़ती रहती हूँ खासकर जब मूड बहुत ऑफ़ होता है .कुश जी .अनुराग जी ,ममता जी हिंद युग्म लावण्या जी सागर नाहर जी ,बालकिशन जी ,संजीत ,मोहिंदर ,दिव्याभ [यह अब आज कल नही लिख रहे हैं ] अभिषेक ओझा अल्पना अनीता रचना शोभा .महक .बहुत हैं किसका नही पढ़ती मैं :) सभी पसंद है सिर्फ़ बहस वाले कुछ ब्लॉग छोड़ कर :)


कुश : काफ़ी सारे नाम लिए आपने.. इसी बात पर ये लीजिए हमारी स्पेशल कॉफी आपके लिए..
रंजना जी : वाह!बहुत ही बेहतरीन और मजेदार कॉफी..



कुश : अच्छा ये बताइए हिन्दी ब्लॉग जगत की क्या खास बात लगी आपको ?
रंजना जी : यहाँ अपने दिल की बात अपनी भाषा में बहुत ही सहज रूप से कही जा जा सकती है और बहुत से विषय हैं यहाँ पढ़ने को जो मुझे बेहद पसंद हैं ..



कुश : सुना है आपकी लंबाई की वजह से आप कॉलेज में चर्चित थी ?
रंजना जी : जम्मू का वूमेन कालेज था मेरा कद बहुत लंबा है पेपर चल रहे थे .और मैं आराम से अपना पेपर कर रही थी तभी एक्जामिनर सामने से जोर से बोला "हे यू लास्ट बेंच गर्ल बैठ जाओ क्यूँ खड़ी हो ? " मैंने कहा "सर मैं तो बैठी हूँ" उसने विश्वास नही किया और वहां आ कर देखा और मुस्करा के कहा ठीक है .असल में उस से पहले में सर झुका कर शराफत से अपना पेपर कर रही थी पीठ सीधी की तो उसको लगा कि मैं खड़ी हो कर नक़ल करने की कोशिश कर रही हूँ


कुश : आपके बचपन की कोई बात जो अभी तक याद हो ?
रंजना जी : बहुत हैं और याद भी सभी है ..पर सबसे ज्यादा याद आता गर्मी कि छुट्टियां होते ही नानी और दादी के घर जाना .और नानी जो कि अपने पानी के घडे को किसी को हाथ नही लगाने देती थी .जान बूझ कर उन्ही के घडे से ठंडा पानी पीना हालाँकि वहां जाते ही वह हम सब बच्चो को अलग अलग सुराही दे देती थी पर जो मजा उनके अपने रखे घडे से पानी पीने में था वो और कहाँ :)और दादा जी के साथ गांव में बाग़ की सैर को जाना और खूब सारे फालसे तोड़ कर लाना .सच में आज भी बहुत याद आता है


कुश : कैसी स्टूडेंट थी आप ?
रंजना जी : एक गणित को छोड़ कर बाकी सब में अच्छी थी ..दसवीं तक था यह कमबख्त मेरे साथ ..और सिर्फ़ इसकी वजह से पापा से पढ़ाई में मैंने मार खायी


कुश : जीवन की कोई अविस्मरणिय घटना ?
रंजना जी : जीवन का हर पल याद रखने लायक है और सुख दुःख का नाम ही जिंदगी है वैसे तो पर माँ का बहुत छोटी उम्र १० साल में साथ छोड़ जाना बहुत दुःख देता है आज भी ..और बहुत छोटी उम्र १९ साल में शादी हो जाना हंसा देता है आज भी :)


कुश : अपने परिवार के बारे में बताइए ?
रंजना जी : परिवार में दो प्यारी सी बेटियाँ है पति है ससुर हैं
बेटियाँ दोनों नौकरी करती है बड़ी बेटी एच आर इन मर्सर कंपनी में है दूसरी इ टी नॉव में जर्नलिस्ट है


कुश : सुना है ब्लॉगिंग की वजह से लोगो ने आपका ऑटओग्रॅफ भी लिया था ?
रंजना जी : जब हिंद युग्म का बुक फेयर में स्टाल लगा था और इस बात का प्रचार हम सबने अपने अपने ब्लॉग पर किया, उसको पढ़ कर जब कुछ पाठक जो मेरा लिखा निरन्तर पढ़ते हैं मेरा आटोग्राफ लेने उस स्टाल पर आए थे .तब लगा लिखना सार्थक हो गया और मेरी अब अपनी एक पहचान है :)


कुश : आप ही की लिखी हुई आपकी कोई पसंदीदा रचना ?
रंजना जी : सभी बहुत पसंद है ..पर याद है अपनी पहली कविता जिस पर शायरी नेट का पहला इनाम मिला था वोह थी "'कल रात की खामोशी'' और अपनी लिखी कविता तोहफा बहुत पसंद है


कुश : कोई फिल्म जो आपको बेहद पसंद हो?
रंजना जी : यह तो बहुत मुश्किल सवाल है जी ..पिक्चर बहुत कम देखती हूँ पर जो देखी हैं वह पसंद की ही देखी है :) एक बतानी है तो इजाजत पिक्चर अपनी कहानी और सबके किए गए उस फ़िल्म में सहज अभिनय के कारण पसंद है


कुश : बचपन में आप बहुत जासूसी करती थी?
रंजना जी : हा हा हा! करती नही थी जी एक बार की थी, तब मैं कोई १४ साल कि हूंगी तब दीवाना और लोट पोट चंदामामा बच्चो की किताबे आती थी उस में कहीं जासूसी कहानी पढ़ कर छोटी बहनों को डराने की सूझी और पापा का ओवर कोट ,हेट और उनके गम शूज पहन कर दरवाज़े के पीछे छाता तान कर खड़ी हो गई और जैसे ही वह दोनों अन्दर आई छाता उनकी तरफ कर दिया और जब वह दोनी चीखी तो उनकी चीखे सुन कर मैं ख़ुद डर गई और जो हम तीनों चीखे तो सारा मोहल्ला वहां पर जमा हो गया और पापा ने जो शामत बनाई मेरी की आजतक जासूस बनने की सोचना तो दूर कोई किताब नही पढ़ती इस विषय पर


कुश : क्या कोई ऐसी आदत है आपमे जो आप बदलना चाहेंगी ?
रंजना जी : नही मैं बहुत अच्छी बच्ची हूँ :) एक आदत मुझे लगता है कि शायद मुझे बदल देनी चाहिए मैं विश्वास करती हूँ डू आर डाई मतलब करो या मरो शायद आर्मी माहोल में रहने के कारण यह आदत मुझ में आज भी मौजूद है पर घर में सबको लगता है कि यह आदत मुझे बहुत जल्दबाजी की ओर ले जाती है ..और इस से परेशानी हो जाती है


कुश : किताबो से काफ़ी प्यार लगता है आपको?
रंजना जी : किताबे तो मेरी लाइफ लाइन हैं :) अमृता प्रीतम की सभी किताबे कई बार पढ़ चुकी हूँ सबसे ज्यादा पसंद है उनकी नागमणि [३६ चक ] और रसीदी टिकट पसंद इसलिए है उनका लेखन क्यूंकि वह दिल सेलिखा हुआ हैऔर सच के बहुत करीब है


कुश : सुना है आपकी लिखी एक पुस्तक भी आ रही है?
रंजना जी :जी हाँ 'साया' मेरी वह ड्रीम बुक है जिसको मैंने अपनी कविता लेखन के साथ साथ बड़ा होते देखा है और फ़िर यही सपना मेरी छोटी बेटी की आँखों में भी पलने लगा और आज उसकी वजह से मेरा यह सपना साया पब्लिश हो चुकी है .उस के बाद बच्चो को एक किताब पर काम कर रही हूँ जिस में उनकी बाल कविताएं और रोचक जानकरी सरल लफ्जों में लिखने की कोशिश है ताकि आने वाली पीढी सहजता से अपनी भाषा से जुड़ सके और किताबो को पढने की रूचि बनी रहे .. किसी अच्छे पब्लिशर से मिलते ही यह सपना भी जल्द पूरा हो जायेगा


कुश : आप नारी विमर्श जैसी कई ब्लॉग्स पे भी लिखती है, क्या वजह रही उससे जुड़ने की?
रंजना जी : नारी से जुड़ना अकस्मात ही हुआ ..लगा कि कुछ बातें जो अब तक सिर्फ़ सोचती हूँ नारी को लेकर उनको अब लफ्ज़ देने चाहिए
पर यहाँ कोई आन्दोलन नही है सिर्फ़ अपनी बात है हर नारी के दिल की जो दिल में सब वही लिखते हैं


कुश : क्या आप मानती है की नारी को आज भी मुक्त होने की ज़रूरत है?
रंजना जी : नारी को नही उसके विचारों को सम्मान देने की ज़रूरत अभी भी है.. नारी कोई बँधी हुई नही हुई अब


कुश : कहा जाता है की नारी विमर्श जैसी कई ब्लॉग्स पर एक ही तरह की बात होती है, लोग अब उससे उबने लगे है ?
रंजना जी : उब तब होती है ..जब लगता है की कुछ कहने की जो कोशिश हो रही है वो कामयाब है...पर जिस रोज़ किसी स्त्री की कामयाबी देखते हैं.. ठीक उसी दिन कोई नया रेप या पढ़ी लिखी नारी को पीटती हुए देख लेते हैं तब लगता है की कहना बहुत हद तक सफल नही हो रहा है


कुश : लेकिन इसे यू भी तो देख सकते है की किसी दिन रॅप या किसी नारी को पीटने की खबर मिले.. उसी दिन उसकी कामयाबी भी पढ़ने को मिले तो लग सकता है की अब सब बदल रहा है?
रंजना जी : हाँ यूँ भी सोचा जा स्कता है ..पर शायद अभी समाज को पोज़ेटिव कम और नेगेटिव देखने की ज़्यादा आदत है, और उसी समाज में हम भी है..



कुश : तो इसका मतलब नारी ब्लॉग में नेगेटिव नज़रिए से लिखा जाता है?
रंजना जी : मैं नेगेटिव नही लिखती.. बाकी जो लिखते हैं लिखे


कुश : जब एक कम्यूनिटी ब्लॉग में लिखा जाता है तो वहा व्यक्तिगत सोच क्या मायने रखती है? क्या आपके विचार वहा के बाकी लोगो से अलग है ?
रंजना जी : हाँ विचार सबके व्यक्तिगत हो सकते हैं ..वैसे मेरे अपने ख्याल पोज़ेटिव सोच से ज़्यादा मिलते हैं.. मुझे कामयाबी पर लिखना जयदा पसंद है जिससे औरो को सीख मिल सके..


कुश : क्या वजह है की नारी मुक्ति या स्त्री विमर्श की बात करने वाले ब्लॉग पर अक्सर कमेंट नही देखे जाते जबकि उसी ब्लॉग के लेखको की व्यक्तिगत ब्लॉग पर कमेंट होते है?
रंजना जी : आपको समीर जी की हिन्दी चिट्ठाकारी पोस्ट याद है :) बस वही हाल है जब कई एक साथ मिल कर लिखते हैं तो शायद सामने वाले को पिटने का डर ज्यादा होता है :) मजाक कर रही हूँ ...मेरे ख्याल से सबके अपने व्यक्तिगत विचार है इस बारे में ,,जब जब नारी विमर्श की बात होती है तो अक्सर न ख़तम होने वाली बहस शुरू हो जाती है और हल तो सबने अपनी समस्या का ख़ुद ही तलाश करना है जबकि व्यक्तिगत ब्लॉग में शायद बात दिल तक जाती है और विषय में अलग होते हैं ..तो पढने वाले पाठक भी अधिक मिल जाते हैं ..


कुश : तो क्या इसका मतलब नारी विमर्श वाले सभी ब्लॉग्स सिर्फ़ बहस करने के लिए है?
रंजना जी : नही यह वह मंच है जहाँ समस्याओं का हल आपसी बातचीत से निकाला जा स्कता है
एक संदेश तो उन नारियों तक देने की कोशिश होती है जो इस वक़्त किसी दुविधा से गुजर रही हैं

कुश : यह तो बड़ी अच्छी बात है, अब तक कितनी समस्याओ का हाल निकाला जा चुका है?
रंजना जी : हल कितना निकला पता नही पर नारी ब्लॉग में निरन्तर सदस्यों की बढ़ती संख्या बताती है की वह यहाँ सार्थक बातचीत कर सकती है

कुश : तो आपके अनुसार किसी ब्लॉग की सफलता का मापदंड उसके सदस्यो की संख्या है?
रंजना जी : कुश तुम तो मुझे पिटवाओगे, बहुत शरारती सवाल पूछ रहे हो..


कुश : कुश : हा हा हा! तो अब समझ में आया आपके.. खैर हमारे पाठको ने आपसे इतने अच्छे अच्छे सवाल पूछे है तो आप भी अच्छे से उनका जवाब दीजिएगा.. आइए चलते है हमारे पाठको के सवाल की ऑर
कुश : आपके जीवन का कोई ऐसा वाक़या जिसे याद करके किसी की गमी में बैठे बैठे भी हसी आ जाए? - पल्लवी जी
रंजना जी : जम्मू में हमारे मकान मालिक जिन्हें उनके बच्चे बाबू जी और हम लोग डब्बू जी कहते थे उनकी एक आदत बहुत अजीब थी वह तेज बारिश आने पर छाता ले कर अपने घर के आँगन में लगे निम्बू ,अमरुद और बाकी पौधो को पानी देते थे ..और मैं यदि घर में हूँ तो अपने निम्बू के पेड़ पर लगे निम्बू गिनना नही भूलते थे जिन्हें में उनकी नजर बचा कर चुरा लिया करती थी ..


कुश : आपको लिखने की इतनी ऊर्जा कौन प्रदान करता है? नीरज जी
रंजना जी : मेरे लिखे को पढने वाले पाठक .जब उनकी ढेरों मेल मेरे पास आती है ..:) जनून भी है कुछ न कुछ हर वक्त पढने लिखने का ....अच्छा है न ...कहते हैं कि खुराफाती दिमाग को खाली नही रहना चाहिए :)


कुश : कोई ऎसा वाक़या, जो आप भूलना चाहती हों ? डॉ अमर कुमार
रंजना जी : हाँ एक वाकया जब मेरी बड़ी बेटी जब ४ साल की थी तो दूसरी मंजिल से गिर गई थी और उसके बाद के ७२ घंटे मेरे लिए जीवन मरण का प्रश्न बन गए थे ..ईश्वर की असीम कृपा रही कि वही ७२ घंटे हम पर भारी पड़े उसके बाद वह ठीक हो गई ..जाको राखे साईँ मार सके न कोय ...:)उस हादसे को मैं जिंदगी में कभी याद नही करना चाहती ..


कुश :आपको किन किन लेखक या फिर किन किन किताबों ने बिगाड़ा? - सुशील जी
रंजना जी : हा हा सही है यह भी .बहुत से लेखको का लिखा पढ़ा है धर्मवीर भारती ,इस्मत चुगताई ,आबिद सुरती पर .मुझे सबसे ज्यादा बिगाडा अमृता जी ने फ़िर शिवानी , .गुलजार और मीना जी की लिखी नज़मो ने मेरे सपनो को वो आसमान दे दिया जहाँ आज भी मेरा खुराफाती दिमाग अपनी उड़ान भरता रहता है :)


कुश : अगर अमृता जिंदगी में ना आयी होती तो क्या तब भी आप ऐसी ही होती ? - अनुराग जी
रंजना जी : ऐसी होती से क्या मतलब है आपका :) अच्छी या बुरी ? मतलब कैसी हूँ मैं?
हा .हा अनुराग जी पहले आप जवाब दे
फ़िर मैं बताती हूँ कि मैं क्या हूँ और क्या हो सकती हूँ :) ...

कुश : मुझे किसी ने बताया था कि एक अच्छा रिपोर्टर अच्छा लेखक नहीं हो सकता है। कविता तो उसके बस की ही नहीं है, क्या यह सही है? -मन्विन्दर जी
रंजना जी : जिसने भी कहा वह उसका अपना ख्याल होगा :) ऐसा कोई जरुरी नही है, कविता दिल की हालात की भावना से जन्म लेती है और वह जब दिल में उमड़ती है तो यह नही देखती की उसको लिखने वाला रिपोटर है या कवि लेखक
जिस भाषा में हम बात करते हैं ,उसी भाषा में साहित्य सृजन करना कहाँ तक तर्क-संगत है ....

यह तो बड़े बड़े लेखक गण ही बता सकते हैं .:) मैं अदना सी कुछ भी लिखने वाली क्या कह सकती हूँ इस विषय में .....मुझे तो अपनी उसी भाषा में लिखना अच्छा लगता है जो आम बोल चाल की है क्यूंकि मुझे लगता है वही सहज है लिखने में अपनी लगती है और दिल की बात दिल तक पहुँच जाती है ...


कविता और गजल में कोई एक चुनना हो, तो कविता लिखना पसंद करेंगी अथवा गजल?

अशोक जी मैं कविता लिखनी पसंद करुँगी ..गजल लिखने में अभी बहुत छोटी कक्षा की विद्यार्थी हूँ ..सीख रही हूँ अभी लिखना इसको ..:)


१.अगर आपको अपने से कोई एक सवाल पूछना हो तो क्या पूछेंगी?anup ji
२.उस सवाल का संभावित जबाब क्या है?

:) मैं तो रोज़ ख़ुद से कई सवाल करती हूँ ..शायद आपने पढ़ा नही मेरे ब्लॉग के परिचय में ख़ुद से बात करने की बुरी आदत है मुझे :) चलिए आपको भी बता देते हैं की रंजू ख़ुद से क्या सवाल पूछती है :) कि क्या आज रंजू ने कोई एक ऐसा काम किया जिस से किसी को खुशी मिली ..या कोई ऐसा काम जिस से किसी को दुःख पहुँचा हो ? यदि खुशी दी है तो जिंदगी का एक दिन जो आज है वह सफल हो गया और नही तो जिंदगी का एक दिन जो बीत गया वह बेकार हो गया :)


ब्लाग जगत को महिलाएं क्या दे रही हैं और महिलाओं को ब्लाग जगत से क्या मिल रहा है। abraar ahamd
मैं आपका प्रश्न शायद सही से समझ नही पा रही हूँ ..यदि आप एक ब्लागर की हेसियत से पूछ रहे हैं तो जो एक पुरूष ब्लाग जगत से हासिल कर रहा है वही महिला भी कर रही है ..क्यूंकि ब्लॉग स्त्रीलिंग या पुलिंग लेखन में अलग अलग नही बँटा है ...पर यदि आप आज की महिला के बारे में पूछ रहे हैं तो यह तो सब जानते हैं कि कंप्यूटर की दुनिया ने सब तरफ क्रान्ति ला दी है ..एक महिला जो अभी तक सिर्फ़ घर में गृहणी थी वह घर में ही रह कर घर की चार दिवारी से निकल कर तकनीकी जानकारी से परिचित हो रही है दुनिया को जान रही है अपनी नजर से पढ़ कर लिख कर ... .और इस से उसको भी आत्मसंतुष्टि मिल रही है जो एक पुरूष ब्लागर को :)


कौन कौन से ब्लॉग पढ़ना नहीं पसंद, जरा दो तीन नाम तो बताईये?? और क्यूँ?SAMEER JI

समीर जी आप को तो मैं ब्लाग जगत का हनुमान समझती हूँ ..जो पलक झपकते ही संकट मोचन बन कर सबका संकट हर लेते हैं ..पर लगता है आपकी ड्यूटी बदल गई है यह प्रश्न लिखते वक्त ..नारद मुनि लग रहे हैं इस वक्त आप मुझे :) नारायण नारायण !!
तो सुनो प्रभु जी मुझे राजनीति बिल्कुल पसंद नही है ,इस लिए उस से सबंधित ब्लाग भी नही पढ़ती हूँ ..और यह क्या अनर्थ कर रहे हैं प्रभु ..नाम में क्या रखा है :)



मुझे किसी ने बताया था कि एक अच्छा रिपोर्टर अच्छा लेखक नहीं हो सकता है। कविता तो उसके बस की ही नहीं है, क्या यह सही है?

जिसने भी कहा वह उसका अपना ख्याल होगा :) ऐसा कोई जरुरी नही है ..कविता दिल की हालात की भावना से जन्म लेती है और वह जब दिल में उमड़ती है तो यह नही देखती की उसको लिखने वाला रिपोटर है या कवि ..लेखक
मेरा दूसरा सवाल,
क्या यह सच है कि दर्द से गुजर कर ही लेखनी में निखार आता है? दर्द की स्याही से ही गजल लिखी जाती है?

किसी ने कहा है ..
खाली जगहें भरते रहना अच्छा है
कागज काले करते रहना अच्छा है !:)

दर्द और खुशी तो साथ साथ चलते हैं जिंदगी के ...कौन किस हालत में क्या लिख कर कमाल कर जाए कौन जाने :) पर मेरा अपना ख्याल है की दर्द में लिखा दिल के हर ज़ख्म को भर देता है ...मेरी ही लिखी कुछ पंक्तियाँ है ..जिनको मैं हजल कहती हूँ :)

दर्द के प्याले में डूबा हर लफ्ज़ अच्छा लगा
यही है ढंग जीने का तो सनम ,अच्छा लगा

इक कोहरा सा बिछा है हर रिश्ते के दरमियाँ
इनको उम्मीद के उजाले में देखना अच्छा लगा

हर तरफ़ यहाँ कहने को इंसान ही है सारे
इस बस्ती में सबको आइना दिखाना अच्छा लगा

बाकी फ़िर कभी :)



कुश : बढ़िया जवाब रहे आपके.. अब वक़्त है रॅपिड फायर राउंड का. शुरू करते है हमारा रॅपिड फायर राउंड

कुश : रंजना - रंजू
रंजना जी : रंजू


कुश : एकता कपूर - करीना कपूर
रंजना जी : दोनों बर्दाशत नही


कुश : ज़्यादा पैसा - थोड़ा प्यार
रंजना जी : थोड़ा प्यार ...थोड़े से पैसे के साथ ..महंगाई बहुत है भाई :)


कुश : घर की दाल - बाहर की मुर्गी
रंजना जी : घर की दाल .शुद्ध शाकाहारी हूँ :)


कुश : चलिए अब बारी है हमारे वन लाइनर राउंड की

कुश :अमृता प्रीतम
रंजना जी : बिंदास मोहब्बत का एक नाम


कुश :अनुराग आर्य
रंजना जी : एक बेहतरीन संवेदन शील इंसान जिस से हर कोई दोस्ती करना चाहता है


कुश : ब्लॉगिंग
रंजना जी : दिल की बात दूसरों तक पहुंचाने का बेहतरीन जरिया ..


कुश : कुश की कॉफी
रंजना जी : बहुत अच्छी संतुलित मिठास लिए जो आपनी बातो के झाग से होंठो पर मुस्कान चिपका देती है :)


कुश : काफ़ी बढ़िया राउंड रहा. अब बारी है हमारी खुराफाती कॉफी की जिसे पीकर आपको देने होंगे खुराफाती सवालो के खुराफाती जवाब

कुश : अगर आप पुरुष होती तो?
रंजना जी :तो मैं इमरोज़ की तरह किसी अमृता से मोहब्बत करती ..हा हा :)



कुश : नाच नही जानने पर आँगन टेढ़ा ही क्यो होता है?
रंजना जी : रंजू कैन डांस :) जिन्हें नही आता उनसे पूछो


कुश जी: अगर आप 1 करोड़ रुपया जीत जाए तो सबसे पहला काम क्या करेंगी?
रंजना जी :वाह कुश जी लिफ्ट होने के सपने दिखा रहे हैं :):) थोडी सी तो लिफ्ट ...तो आधा मैं जो बच्चे देख नही सकते [मैं एक अंध महाविद्यालय में समय मिलने पर जाती हूँ ] उन बच्चो के इलाज मैं लगा देती ताकि वह यह खुबसूरत दुनिया देख सके और आधा घूमने और किताबे खरीदने पर लगा देती


कुश : बिना दूध, पत्ती और शक्कर की चाय कैसे बनाएँगे?
रंजना जी : कुश आप काफ़ी बनाते पिलाते चाय बनाना भूल गए हैं शायद :)तो कहवा या टी बेग्स उबले पानी में डाल कर बना लो लगता है आपने कभी फौजी चाय नही पी :)


कुश :अगर पार्ट्नर फिल्म आपको लेकर बनाई जाए तो आप ब्लॉग जगत में से किसे अपना पार्ट्नर चुनेंगी?
रंजना जी :अगर यह सवाल स्त्रीलिंग या पुल्लिंग के बीच का चुनाव होता तो खुराफाती होता ..:) मैं घाघुती जो को अपना पार्टनर चुनती .उनके साथ बीते पल मैं भूल नही पाती :)

कुश : चलते चलते कुछ ऑर सवाल, हिन्दी ब्लॉगिंग का भविष्य कैसा देखती है आप?
रंजना जी : बहुत उज्जवल ..आने वाला वक्त अच्छा होगा हर लिहाज से हिन्दी ब्लागिंग में .साहित्य .कविता और अन्य विषय पर अच्छी जानकारी मिलेगी .


कुश : हमारे ब्लॉगर मित्रो से क्या कहना चाहेंगी आप?
रंजना जी : बस यही की हिन्दी भाषा को बढावा दे सार्थक लिखे ...बेकार की बहस में न पड़े ..वैसे यह एक परिवार है और सबके विचार मिले यह जरुरी नही पर उसको सभी सभ्य भाषा से सुलझाए और नए हिन्दी ब्लागेर्स का उत्साह बढाए वैसे यहाँ सब बहुत ही समझदार इंसान है पर अध्यपिका होने की आदत से एक छोटा सा लेक्चर मौका मिलते ही मैंने दे दिया इसको अन्यथा न ले :)

कुश : बहुत अच्छे जवाब रहे आपके रंजना जी.. मान तो नही है लेकिन इस इंटरव्यू को अब यही विराम देना पड़ेगा.. हमे बहुत अच्छा लगा आप यहा आई और आपने अपने जीवन की कई अच्छी बुरी बाते हमारे साथ शेयर की. .बहुत बहुत धन्यवाद आपका..
रंजना जी : मुझे भी बहुत अच्छा लगा.. यहा की कॉफी वाकई में बहुत बढ़िया है..


कुश : शुक्रिया रंजू जी. तो ये लीजिए ये है आपका गिफ्ट हैम्पर..
रंजना जी : शुक्रिया कुश! बहुत बहुत शुक्रिया



ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण