ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवयित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल
परिकल्पना की नयी पहल :वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Saturday, December 31, 2011

मैं आत्म हत्या नहीं करना चाहता हूं?





आत्महत्या आसान नहीं .
लोग कहते हैं इसे कायरता - पर उत्तेजना की स्थिति हो या डूबते मन की स्थिति ,
यह आसान नहीं...





रश्मि प्रभा
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मैं आत्म हत्या नहीं करना चाहता हूं?


मरना कौन चाहता है?
किसे अच्छा लगता है
जीना, बनकर एक लाश।

करने से पहले आत्महत्या,
करना पड़ता है संधर्ष,
खुद से।

पर पाने से पहले
रेशमी दुनिया,
खौलते पानी में डाल देते है
कोकुन में बंद जमीर को।

महत्वाकांक्षा
परस्थिति
समय और
काल
के तर्क जाल में उलझ
आदमी
मारकर जमीर को
कर लेता है आत्महत्या,
और फिर
अपने ही शव को
कंधे पर उठाये
जीता रहता है
ता उम्र....

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अरूण साथी
http://sangisathi.blogspot.com/

8 comments:

S.N SHUKLA said...

सार्थक पोस्ट, आभार.

नूतन वर्ष की मंगल कामनाओं के साथ मेरे ब्लॉग "meri kavitayen " पर आप सस्नेह/ सादर आमंत्रित हैं.

सदा said...

अक्षरश: सही कहा है ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

नववर्ष की अनंत शुभकामनाओं के साथ बधाई ।

मनीष सिंह निराला said...

बहुत सुन्दर !
नव वर्ष की बधाई !

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

अच्छी रचना
बहुत सुंदर

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

bahut prabhaavshali aur ati sundar rachna ..Satya vachan bhi..

Anita said...

मरने से पहले ही मर जाना क्या जीवन का अपमान नहीं है...इंसान जो अपने भीतर खुदा को तलाश सकता है खुद को भी खो दे कैसी विडंबना है !

डॉ.मीनाक्षी स्वामी said...

सकारात्मक पोस्ट के लिये आभार।
नव वर्ष की अनंत शुभकामनाएं।

सागर said...

सुन्दर अभिवयक्ति....नववर्ष की शुभकामनायें.....

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण