
किस मंजिल तक पहुंचना है
सब तो छूट जाना है ....
तेजी से छूटते रास्ते हँसते हैं
रश्मि प्रभा
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छूटना...
यात्राओं में सबसे सुन्दर क्या लगता है? ये मैंने अपने आपसे पूछा. एक चुप्पी जो मेरे ही भीतर थी, उसने भीतर ही भीतर चहलकदमी शुरू कर दी. जवाब जल्दी ही मिल गया. छूटना...मुझे यात्राओं में छूटना अच्छा लगता है. घर से छूटना, रिश्तों से छूटना, शहर से छूटना, रास्ते में मिलने वाले पेड़, पौधे, खेत, जानवर, नदी, पहाड़ सबका छूटना. यात्राओं की मंजिल का तय होना ज़रूरी नहीं लेकिन उस मंजिल का भी छूटना तय है. मै छूटती हुई चीज़ों को प्यार से देखती हूँ. बहुत प्यार से. आने वाली चीज़ों का मोह छूटने वाली चीज़ें अक्सर कम कर देती हैं. यूँ भी जो चीज़ छूट रही होती है उसका आकर्षण बढ़ता ही जाता है. वो खींचती है अपनी ओर. यही जीवन का नियम है. इस छूटने में एक अजीब किस्म का सुख होता है.जिस चीज के प्रति आकर्षण बढ़ रहा हो, उसका छूटना जीवन का सबसे सुखद राग है. जिसे हम अक्सर विषाद या अवसाद का नाम देते हैं असल में जीवन वहीँ कहीं सांस ले रहा होता है.
होने और न होने के बीच एक जगह होती है. जैसे आरोह और अवरोह के बीच. जैसे स्थायी और अंतरे के बीच. जहाँ हम राग को खंडित किये बगैर साँस लेते हैं. इन्ही बीच के खाली स्पेस में छूटने का सुख रखा होता है. अगर रियाज़ में जरा भी कमी हुई तो वो खाली स्पेस जहाँ छूटने का सुख और सांस लेने की इज़ाज़त ठहरती है वो जाया हो जाती है. मैं इस स्पेस में हर उस सुख को उठाकर रख देती हूँ, जिससे छूटना चाहती हूँ. इसके लिए यात्राओं में होना ज़रूरी नहीं सम पर होना ज़रूरी है. यात्रा इस सम पर होने को नए अर्थ देती है. जीवन को समझने का नया ढंग. ओह, मैं भटक गयी शायद. मैं छूटने की बात कर रही थी. हाँ तो मुझे जवाब मिला कि मुझे छूटना पसंद है यात्राओं के दौरान. जीवन यात्रा हो एक शहर से दूसरे शहर की यात्रा.
सफ़र मुझे ट्रेन से किया हुआ ही पसंद है. दरवाजे पर खड़े होकर घंटो छूटते जा रहे संसार को देखना. हवा को मुठ्ठी में कैद करने की कोशिश करना और उसका लगातार छूटता जाना. ये छूटना छू जाता है दिल को. कभी कभी लगता है हमें जिन्दगी का ककहरा गलत पढाया गया. हम चीज़ों को पाने में सुख ढूँढने लगे, और उसके खोने में दुःख महसूस करने लगे. लेकिन इसके उलट की स्थिति भी कम आनंददायक नहीं थी. बस कि हम उस आनंद को जीना नहीं सीख पाए. जीवन के सफ़र में हर छूटती हुई चीज़ को याद करते हुए लगा कि कितना प्रेम था उन चीज़ों से जो छूट गयीं, उन लम्हों से जो छूट गए, वो लोग जीवन में आते आते रह गए. वो रह जाना, वो छूट जाना ही सुख कि ओर धकेलता है. मिल जाना या पा लेना सुख के प्रति विमुख होना है. तलाश है नए सुख की...मैंने छूटना स्वीकार किया, उसके सुख को सिरहाने रखा और महसूस किया कि हर उलझन से, हर दुविधा से, हर मुश्किल से छूटती जा रही हूँ. ट्रेन चलती जा रही है और मै खुद से भी छूटती जा रही हूँ. बस एक चाँद कमबख्त छूटता नहीं साथ दौड़ता रहता है...मै मन ही मन सोचती हूँ तू मेरा कितना भी पीछा कर ले बच्चू, भोर की पहली किरण के साथ तू भी छूट ही जायेगा. अचानक घडी पे निगाह गयी...सुबह सर पर खड़ी थी. अब चाँद के भी छूटने का समय आ गया था. एसी कम्पार्टमेंट का नीला पर्दा हटती हूँ और छूटते हुए चाँद को हसरत से देखती हूँ...वो मुझे देखकर मुस्कुराता है और बाय कहता है. ठीक इसी वक़्त सूरज की पहली किरण का जन्म होता है.
एक दोस्त की बात याद आती है अगर कुछ छूटता है तो नए के लिए स्पेस बनती है...इसलिए छूटना अच्छा ही होता है...वैसे इस जीवन को जिससे इतना लाड लगाये बैठे हैं इसे भी तो छूटना ही है एक दिन...

प्रतिभा कटियार






18 comments:
आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा ।
http://tetalaa.blogspot.com/
bahut achchi lagi......
कभी कभी लगता है हमें जिन्दगी का ककहरा गलत पढाया गया. हम चीज़ों को पाने में सुख ढूँढने लगे, और उसके खोने में दुःख महसूस करने लगे. लेकिन इसके उलट की स्थिति भी कम आनंददायक नहीं थी. बस कि हम उस आनंद को जीना नहीं सीख पाए.
सटीक.....
बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
जानते हैं सब छूट ही जाना होता है फिर भी !
दार्शनिक अभिव्यक्ति!
बहुत ही गहरे विचारों वाली रचना है यह आपकी जो जीवन के रंग का एक अलग पहलू दिखती है बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....शुभकामनायें
sach hai kuch milna aur kuch choot jana ....bahut hi sundar bhaav sanjoye hai aapne
छूटने के बाद ही मिलने का सुख निहित है। बहुत अच्छा सृजन।
आपकी पोस्ट की खबर हमने ली है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - १ दिन बाल दिवस - ३६४ दिन भाड़ में जाओ दिवस - ब्लॉग बुलेटिन
सिर्फ छूट नहीं रहा है...कुछ नया भी मिल रहा है...इसीलिए छूटना भी ज़रूरी है...यात्राएं कुछ ऐसा ही एहसास देतीं हैं...
विराग में भी एक प्रकार का राग है ....शान्ति में अनहद नाद की तरह. यात्रा के माध्यम से जीवन के गहन दर्शन पर गंभीर चिंतन.
साधुवाद !!!
बढिया प्रस्तुति।
आलेख अच्छा लगा।
बढिया प्रस्तुति।
बहुत सुंदर
behtreen prstuti....
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