ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Friday, December 31, 2010

..... अब मैं चला


लो यह साल भी गया ...
अब फिर है एक नया साल
नए संकल्प
नई संभावनाएं
नए मौके !


यह साल गया
इसे जाना ही था
पर जब तक यह रहा
तुम्हें तुम्हारे संकल्पों की
याद दिलाता रहा
पर मस्ती की धू धू जलती अग्नि में
तुमने उन संकल्पों को घी बना दिया ...
तुम्हें तो यह भी होश नहीं रहा
कि तुम्हारे हाथ जल गए
मरहम बने माँ बाप ने
जलन होने ही नहीं दिया !


पर आज मैं तुम्हें आगाह कर दूँ
....
कल से जो वर्ष साथ चलनेवाला है
वह रहस्यों का साल है !
अगर तुमने कोई चाल चली तो.....
सुलझाते-सुलझाते चेतनाशून्य हो जाओगे !
..... अब मैं चला
कल के संकल्प पर गौर करना
जो भी कदम उठाना
सोच समझकर उठाना



सुमन सिन्हा
http://zindagikhwaabhai.blogspot.com/

Thursday, December 30, 2010

क्षणिकाएं


कुछ बातें क्षणों की होती हैं
पर बड़ी गहरी होती हैं
ज्यों किताब के बीच रखे सूखे फूल
सूखते नहीं
ये क्षण भी सदियों तक साँसें लेते हैं ....
रश्मि प्रभा





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१. कुछ लिखना

तू चाहती थी कि
मैं लिखूं तुझ पर कुछ
पर पाता हूं खुद को असमर्थ
कि तुम
जो खुद एक किताब हो
उसके पन्ने पलटते पलटते
खुद मैं खो जाता हूं
पर हाँ, इतना लिखना काफी है
कि मेरी ज़िन्दगी की किताब के
मुखपृष्ठ पर छपी तेरी आँखें
डूबने के लिए काफी हैं!!!


२. बदलियाँ

बेशक सूख चुकी हैं
मेरी आँखे
लेकिन देखकर
कल की तेरी भीगी आँखें
और आज कि तेरी याद से
बरस पड़ी मेरी आँखों से
बदलियाँ!!!




३. मासूमियत

कल देखी थी तेरे
चेहरे की मासूमियत
अब अगर मेरी ऑंखें
देखने में धोखा खा जाये
तो भी
मुझे मंज़ूर है!!!


४. उसूल

कुछ तो हम नादाँ थे
कुछ कुसूर था तेरी मासूमियत का
वक्त यूँही गुज़रता गया
हम उसूल निभाते रहे.!!!


५. कोई अनकहा अध्याय

तेरी कलम को मैंने
कहीं छुपा कर रख दिया है
डरता हूं कहीं
ये फिर से ना लिख दे
कोई अनकहा अध्याय!!!


६. असली पन्ना

हवा के झोंखे पलटते रहते हैं
मेरी ज़िन्दगी के पन्ने
मैं हमेशा कि तरह उधेड़बुन में
उलझा रह जाता हूं
और हर बार
पढने से छूट जाता है
ज़िन्दगी का एक
असली पन्ना!!!


७. प्यार जताना

तुने मुझे सिखाया है
बोलना, सोचना
महसूस करना
अब प्यार करना और
जताना भी सिखा दे!!!


८. मेरे जज़्बात

कल तुने कहा था-
मैं उतना परिपक्व हूँ नहीं
जितना समझता हूं
तुने सही कहा है
शायद इसीलिए
हर बार क़त्ल हो जाते हैं
मेरे जज़्बात
मेरे ही हाथों!!!


९. होठों के निशाँ

तू जाते जाते
छोड़ गई थी गिलास पर
अपने होठों के निशाँ
मैं भी पी गया था फिर
उसी गिलास से पानी
अब किसी और से पीना
फीका फीका सा लगता है!!!


()देवेन्द्र कु. शर्मा --
Devendra K Sharma "Man without Brain"
Resident of-Bundi (Rajasthan)-323021.
Qualifications: ACS, ICWA, M.Com
Occupaton:
Management Trainee (Finance)
Coal India Limited
094519-83612
078696-38689
097836-56152
www.coalindia.in
www.csdevendrapagal.blogspot.com

Wednesday, December 29, 2010

विश्वासघाती


जब भी कोई बाहरी आवाज़ आती है,
चिड़िया मासूम निगाहों से
मुझे देखती है,

छोटी कटोरी में पानी देकर
मैं उसे भरोसा देना चाहती हूँ..........
पर आघात से उबर पाना
आसान तो नहीं ...

रश्मि प्रभा






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विश्वासघाती


सवेरे-से कटोरी-भर चावल
रखे थे मैंने,
कोई तो उन्हें चुगने आएगा;
डिब्बे में बंद सड़ रहे थे दाने,
किसी का तो भला हो जायेगा.
पर नहीं..
अब तो मैना मुझसे भी ज्यादा
सयानी हो गई है;
उनकी आंखों में अब अपनों के लिए भी
खौफ़ पैदा हो गई है.
चलो कोई नहीं..
सबकी अपनी इच्छा;
अब तो दुनिया भी ऐसी ही हो चली है,
शायद इसकी कहानी भी यही हो गई है.
सांझ ढलते दो मैना
दिख ही गए, घास में कुछ चुन रही थी वो,
मैंने भी विश्वास का जाल फेंकना चाहा,
सो सारी कटोरी ही उडेल डाली;
डर मत! मैं धीरे से विश्वास का पैबंद लगाने का प्रयत्न कर रही थी.
परन्तु..
उनका विश्वास मुझसे भी अधिक था,
उड़ के चली गई पासवाले बरामदे पर;
और छुप के ढूँढने लगी मुझे
कि इस बार कौन नया विश्वासघाती है !



वंदना
http://vandanamahto.blogspot.com/

मेरा नाम बंदना महतो है. मैं मूलत: रांची, झारखण्ड की रहनेवाली हूँ. वैसे पढाई के सिलसिले में काफी जगह रही हूँ. मैंने बी.आई.टी. सिंदरी, धनबाद, झारखण्ड से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक, तथा आई.आई.टी. गुवाहाटी, असम से स्नातकोत्तर की डिग्री ली है. विगत चार वर्षों से इसी क्षेत्र में पी.एच.डी., आई.आई.टी. खडगपुर से भी कर रही हूँ। ब्लॉग्गिंग की शुरुआत भी यहीं आकर हुई. दिन भर के रिसर्च के बाद जब भी मुझे अवसर मिलता है, मैं ब्लॉग में रचनाएँ पढ़ने लग जाती हूँ. इसी दौरान काफी लोगो को पढ़ा, जाना, कई अच्छे व सुलझे सद्विचारों से अवगत भी हुई.

मेरे बारे में

"Life is beautiful"-ऐसा मेरा सदा से मानना रहा है, पर इसकी सुन्दरता के मायने मैंने जीवन के हर कदम में बदला हुआ सा-ही पाया, जैसे कोई "बूझो तो पहेली"- प्रतियोगिता हो रही हो. आज भी मैं इस जीवन की पहेली को सुलझाने में व्यस्त हूँ. कुछ अर्थ समझ में तो आये, पर सब लिख न सकी ..और कुछ जिन्हें न समझ सकी, उसे अंकित करने की कोशिश करती गयी...

Tuesday, December 28, 2010

इन बेज़ुबां ख़्वाबों का क्या करूं


चाहा है इन ख़्वाबों से कुछ बातें करूँ
गर्म कॉफ़ी के उठते धुंए से कोई नाता जोडूँ
जाने क्यूँ ये ख्वाब कुछ कहने से कतराते हैं
पर हर सुबह मेरे तकिये को
नम कर जाते हैं ...

रश्मि प्रभा




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इन बेज़ुबां ख़्वाबों का क्या करूं


एक ख़्बाब मिलता है सुबह सिरहाने,
कैसी बेचैनी है जो तकिए पर लेटी दिखती है।
जहां जाती हूं, घर में पीछे-पीछे चलती है।
लफ़्ज़ हैं कि तितलियों जैसे फड़फड़ाते हैं,
थाम भी लूं तो काग़ज़ पर उतरने से डरते हैं।

आंखों के कोने पर लटका एक आंसू
आज क्यों बाढ़-सा बहने को बेताब है?
क्या उलझन है जो मन में
एक गांठ-सी बनी बैठी है
किसे झकझोरूं, किसको खोलूं।

खिड़की से बाहर आसमां का कोई कोना
अपना नहीं लगता।
नीले-नीले बादलों की नाव
मुझे मंझधार में क्यों छोड़ जाती है
क्यों सब डूबता उतराता-सा लगता है।

सुबह सिरहाने मिला वो ख़्वाब
कुछ कहता ही नहीं,
बस साथ-साथ चलता है।
वो बेचैनी जैसे आंखों में उतर आई है
धूप में भी सब नमनाक दिखता है।

अनु सिंह चौधरी
http://mainghumantu.blogspot.com/
मैं एक प्रशिक्षित टीवी पत्रकार हूं। एनडीटीवी में चार-पांच साल रही। फिर जुड़वां बच्चों को बड़ा करने के लिए नौकरी छोड़ी। पति को सहयोग देने के लिए डॉक्युमेंट्री फिल्में बनाना शुरू किया, और अब डेवलेपमेंट सेक्टर में कम्युनिकेशन्स कंसल्टेंट हूं। थोड़ा बहुत लिखना-पढ़ना यहीं हो पाता है, ब्लॉग पर। वैसे लेखन भी अनायास ही शुरू हुआ।
मेरे बारे में ----
मकसद वो सब कहना है जो सुनती, समझती, देखती, गुनती आई हूं। यहां मेरे दायरे के हर रंग मिलेंगे - गांव की मिट्टी की खुशबू, पर्व-त्यौहारों की रौनक, औरत के कई मूड्स, यहां तक कि राजनीतिक और वैचारिक टिप्पणियां भी। लेकिन सब मेरे अपने विचार होंगे, मेरी सीमित संभावनाओं का दर्पण। भाषा की कोई बाध्यता नहीं होगी, कभी मैं हिंदी में लिखूंगी, कभी अंग्रेज़ी में। और लिख सकी तो भोजपुरी में भी!

Monday, December 27, 2010

ज़िन्दगी का स्वाद


अब वो चाँद कहाँ
कहाँ है वो मासूम स्वाद
बड़े होने की कौन कहे
अब तो घुटनों चलते , खड़े होते
हम बेईन्तहा समझदार होते हैं
कहाँ से लाएगी माँ अब वो जादू
चाँद से अब कोई रिश्ता ही कहाँ !


रश्मि प्रभा






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ज़िन्दगी का स्वाद


वो भी क्या दिन थे
जब हम चाँद का स्वाद चखा करते थे
कभी खीर में देती थी माँ
कभी दूध में घोल देती थी
कभी रोटी के टुकड़े में
दबा कर खिला दिया करती
तब चाँद बहुत मीठा होता था
अब तो बहुत खारी लगती हैं रातें
जब आँखों में सारी रात
जगती हैं रातें
दिन भी कितने फीके लगते हैं अब
बड़े होने पर क्यूँ
बेस्वाद हो जाती है
ज़िन्दगी

()शेफाली श्रीवास्तव

http://wordsbymeforme.blogspot.com/

Sunday, December 26, 2010

व्यंग -- बुढापे की चिन्ता समाप्त


ख़्वाबों में ही सही
खेली हमने राजनीति
हकीकत में सोचा है लेंगे एक टिकट हम भी
आप सब तो साथ होंगे ही
ब्लॉग बंधुत्व की भावना लिए
क्यूँ है ना ?

रश्मि प्रभा




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व्यंग -- बुढापे की चिन्ता समाप्त



आज कल मुझे अपने भविष्य की चिन्ता फिर से सताने लगी है। पहले 20 के बाद माँ बाप ने कहा अब जाओ ससुराल। हम आ गये। फिर 58 साल के हुये तो सरकार ने कहा अब जाओ अपने घर । हम फिर आ गये। फिर दामाद जी ने सोचा सासू मां अकेले मे हमे पुकारती रहेगी तो पहुँचा दिया ब्लागवुड मे। हम फिर आ गये। अब लगता है आँखें ,कमर ,बाजू अधिक दिन तक यहाँ भी साथ नही देंगे तो कहाँ जायेंगे? मगर भगवान हमेशा अपनी सुनता है जब पता चला कि महिला आरक्षण विधेयक पास हो रहा है तो अपनी तो बाँछें खिल गयी। बडी बेसब्री से आठ मार्च के एतिहासिक दिन का इन्तज़ार किया। क्यों कि हम जानते हैं नकारा,बिमार आदमी और कहीं चले न चले मगर राजनिती मे खूब चलता है। चलता ही नही भागता है< आस पास चमचे, विदेश मे बिमारी का ईलाज क्या क्या सहुलतें नही मिलती और फिर पैसा?___ उसे अभी राज़ ही रखेंगे और हम ने सोच लिया था कि जैसे तैसे इस बार जिस किसी भी पार्टी का टिकेट मिले ले लेंगे।पार्टी न भी हो आज़ाद खडे हो जायेंगे। मगर आठ तारीख ऐसी मनहूस निकली कि संसद मे हंगामा हो गया उस दिन तो आलू टमाटर ही हाथ लगे। अब देखिये न अगर औरत ही औरत के खिलाफ खडी न हो तो किसी भी काम का क्या मज़ा रह जायेगा । ये अपनी ममत दी अपनी ही बहनों के खिलाफ खडी हो गयी। अब इन्हें कौन समझाये कि अभी रोटी हाथ मे तो आने दो बाद मे छीनाझपटी कर लेने फिर चाहे हमारी चोटी ही हाथ मे पकड कर घुमा देना। मगर नही। धडकते दिल से अगले दिन यानी 9 मार्च का इन्तज़ार किया था मगर दी के तेवर देख कर दिल और धडक गया।,-- शाम होते होते अपना तो हाल बेहाल था-- डर था कि कहीं बिल पास होते होते रह गया तो अपना भविष्य तो चौपट हो जायेगा। भगवान ने सुन ली सारा दिन पता नही कितने देवी देवताओं को मनाया। जैसे ही बिल पास होने की घोषणा हुयी अपनी तो मारे खुशी के जमीं पर पाँव नही पड रहे थी । बेशक अभी रोटी तवे पर है पता नही कहीं लोक सभा मे पकते पकते जल गयी तो क्या होगा? मगर अपने हौसले बुलन्दी पर हैं---- बार बार अपनी एक गज़ल का शेर मन मे घूम रहा था--
जमीँ पर पाँव रखती हूँ ,नज़र पर आसमा उपर
नही रोके रुकूँगी अब कि ठोकर पर जमाना है
कहाँ अबला रही औरत कहाँ बेबस ही लगती है
पहुँची है वो संसद तक सभी को ये दिखाना है

रात को खूब लज़ीज़ खाना बनाया और पति को खिलाया। आखिर मुर्गा हलाल करने से पहले पेट भर खिलाना तो चाहिये ही। बस फिर क्या सो गये। तो क्या देखते हैं कि जो टिकेट हमारे पति को मिली थी वो कट कर हमे मिल गयी। पहले तो घर मे ही विरोधी दल खडा हो गया। मायके वाले मेरे साथ और ससुराल वाले इनके साथ मगर जीत तो अपनी होनी ही थी। पार्टी को इस बिल को भुनाने का अवसर तो नही खो सकती थी। पतिदेव सिर पीट रहे थे कि क्यों उन्होंने इस बिल के हक मे वोट डाला। मगर अब बात हाथ से निकल चुकी थी। खैर मानमनौवत से विरोधियों को शान्त किया। टिकेट तो मुझे मिलना ही था मिल गया। अब एलेक्शन कम्पेन मे देख रही हूँ बेचारे पति घर मे इलेक्शन आफिस सम्भाल रहे हैं और मै बाहर गलियों मे घूम रही हूँ। जैसे तैसे इलेशन हो गया और मै जीत गयी। क्या देखती हूँ कि लोगों की भीड मुझे हार डालने के लिये उतावली हो रही है। इनके दोस्त तो और भी उतावले बडी मुश्किल से मुझे हार डालने का उन्हे अवसर मिला था तो कैसे हाथ से जाने देते? जिन्हों ने नही भी वोट डाला वो भी मेरे मुँह मे काजू की कतली डालना चाह रहे थे और मेरी नजरें इन्हें ढूँढ रही थी--- दूर गेट के पास ये भीड मे उलझ्गे हुये नज़र आये--- शायद दोस्तों ने ही शरारत से वहाँ उलझा रखा था इन्हें भीड मे से निकलने ही नही दिया और जब सभी हार डाल कर चले गये तो बेचारे पतिदेव हार ले कर आये। सारे फूल भीड मे झड चुके थे, हमने अवसर की नज़ाकत को समझ कर सभी हार अपने गले से उतार कर इनके गले मे डाल दिये -- और मुस्कुरा कर इनकी तरफ देखा बेचारे मेरे हार डालना ही भूल गये। चलो अच्छा हुया एक बार का डाला हार आज तक गले से नही उतर है।आधी रात तक जश्न चलता रहा।

अगले दिन से घर का इतिहास,भुगोल,गणित सब बदल चुका था। आज इनके दफ्तर मे मेरा राज था । इन्हें मैने रसोई का दरवाजा दिखा दिया था। आने जाने वालों के लिये चाय-नाश्ता,खाना जैसे मै बना कर देती थी अब इनके जिम्मे हो गया। फिर देखती हूँ । रात को जैसे ही फारिग हुयी पतिदेव भोजन की थाली ले कर खडे हैं। मैने थाली के लिये हाथ बढाया ही था कि जोर जोर से मेरा हाथ हिला--- ये क्या--- ये सपना था?--- मेरे पति जोर से मेरा हाथ पकड कर हिला रहे थी * आज क्या सोती रहोगी? सुबह के 7 बज गये? नाश्ता पानी मिलेगा कि नही? वाह रे किस्मत! क्या बदला? एक दिन सपना भी नही लेने दिया। खैर अब भी आशा की किरण बची है--टिकेट तो हम ही लेंगे। बस दुख इस बात का है कि तब आप लोगों से दूर जाना पडेगा । या फिर राजनीति मे रह कर अमर सिन्ह की तरह कुछ लिख पाऊँ। मगर एक बात की आप सब से उमीद करती हूँ मेरे ईलेक्शन कम्पेन मे बढ चढ कर हिस्सा लें। धन्यवाद {अग्रिम}। जय नारी जय भारत ।

निर्मला कपिला
http://veerbahuti.blogspot.com/

Saturday, December 25, 2010

मेरी तलाश मेरी जिजीविषा


कहाँ भटकते रहे मन?
तुम्हारे सारे अर्थ तो तुम्हारे ही भीतर थे,
जो "कस्तूरी" की तरह,
तुम्हारे रोम-रोम में सुवासित थे,
तुम्हारी आँखों में प्रदीप्त थे
तुम्हें जन्म दिया माँ ने
सिखाया समय ने
तराशा खुद को तुमने
तेज दिया ईश्वर ने
यूँ कहो अपना प्रतिनिधि बनाया ...
इसलिए नहीं कि तुम सिर्फ निर्माण करो
अनचाहे उग आए घासों को हटाना
यानि नेगेटिविटी को मारना भी तुम्हारे हाथों में दिया ...


रश्मि प्रभा





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मेरी तलाश मेरी जिजीविषा


मैं माध्यम हूँ ईश्वर का
जीवन के हर कोनों से मैं निकला हूँ
एक सत्य की तलाश में !
मैं प्रह्लाद नहीं
पर जिया मैंने प्रह्लाद को
समय होलिका का छद्म रूप ले
अग्नि में मुझे बिठाता गया
वह वक़्त जल गया
मेरी परिक्रमा जारी रही ...

मैं बुद्ध नहीं
पर महाभिनिष्क्रमण को मैंने जिया
यशोधरा को त्याग
निर्वाण की तलाश में
खो गया
....
नहीं था मोह राज्य का
नहीं था मोह ऐश्वर्य का
पर तथाकथित बुद्धिजीवियों को
उनकी ज़मीन दिखाने के लिए
मैं राजा बना
और दिखाया
किसे कहते हैं सामर्थ्य
क्या है यश !...

मैं कर्ण नहीं था
पर मुक्त हाथों से दान
मेरी जिजीविषा बनी ...

मैं कृष्ण नहीं
पर निःसंदेह उनका सुदर्शन चक्र हूँ
उनकी गीता का सार हूँ
हर बार मैंने यही कहना चाहा है
ज़मीन से रिश्ता बनाकर रखो
झुककर मिलो
फिर देवदार बनो
अपने हर निशान को
वटवृक्ष की शाखाओं सा रूप दो
...
परिवेशिये सुकून से बाहर निकलो
वेद ऋचाओं से जन्मे संस्कारों का
संकल्प लो
यकीनन तभी किसी महाग्रंथ की रचना होगी
और घर का आँगन लौटेगा ...


सुमन सिन्हा

http://zindagikhwaabhai.blogspot.com/

Friday, December 24, 2010

एथेंस का सत्यार्थी


सच को देख
एथेंस का सत्यार्थी
अंधा हो गया ...
सच की भयानकता से
या उस विपरीत सत्य के साक्षात्कार से
जिसका एक कोमल खाका उसने खींच रखा था !
... आह !
पर एथेंस के सत्यार्थी की इस विडंबना ने
मुझे अपंग और अपाहिज नहीं किया
चेतनाशून्य मनोदशा की हर गहरी ख़ामोशी ने
मुझे केशव का विराट स्वरुप दिखाया
अहोभाग्य !
सत्य के आगे लड़खड़ाते मेरे क़दमों के आगे
कृष्ण ने हर बार मेरी ऊँगली थामी
और दुर्योधन से बचाया !!!


रश्मि प्रभा

Thursday, December 23, 2010

झूठी हँसी


दर्द अपने अपने हिस्से का
तुम भी जीते रहे
हम भी जीते रहे
न तुम्हें हमारी उदास आँखें पसंद थीं
ना मुझे
तुम मेरे लिए जीते रहे
हम तुम्हारे लिए जीते रहे
इतनी संजीदगी थी जीने में
कि दर्द भी शर्मिंदा हुआ ...

रश्मि प्रभा




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झूठी हँसी

उसके जख्‍मों पर,

जब भी मैने मरहम लगाया,

इक दर्द

उसके लबो पे उभर आया

घुटनों में

मुंह छिपाकर

वो दर्द को पी लेती थी

आंसुओं को आखों के किनारों से

बहने से पहले

रोक कर खड़ी हो जाती थी

हंसते हुये पूछती,

तुम्‍हें क्‍या हुआ

मुझे देखो

मैं हंस रही हूं

तुम्‍हें हंसाने के लिए

और तुमने मुंह क्‍यों बना रखा है

मुझे झेंपकर

हंसना पड़ता उसका साथ देने के लिए

.........

पर उसे भी पता था

और मुझे भी पता था
हँसी दोनों की झूठी है !

Wednesday, December 22, 2010

प्याज बन कर रह गया है आदमी


चलो ना भटके
लफ़ंगे कूचों में
लुच्ची गलियों के
चौक देखें
सुना है वो लोग
चूस कर जिन को वक़्त ने
रास्तें में फेंका थ
सब यहीं आके बस गये हैं
ये छिलके हैं ज़िन्दगी के
इन का अर्क निकालो
कि ज़हर इन का
तुम्हरे जिस्मों में
ज़हर पलते हैं
और जितने वो मार देगा
चलो ना भटके
लफ़ंगे कूचों में

(गुलज़ार)






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प्याज बन कर रह गया है आदमी

मौन स्वर है सुप्त हर अंतःकरण
सत्य का होता रहा प्रतिदिन हरण

रक्त के संबंध झूठे हो गए
काल का बदला हुवा है व्याकरण

खेल सत्ता का है उनके बीच में
कुर्सियां तो हैं महज़ हस्तांतरण

घर तेरे अब खुल गए हैं हर गली
हे प्रभू डालो कभी अपने चरण

आपके बच्चे वही अपनाएंगे
आप का जैसा रहेगा आचरण

प्याज बन कर रह गया है आदमी
आवरण ही आवरण बस आवरण


दिगम्बर नासवा
http://swapnmere.blogspot.com/

जागती आँखों से स्वप्न देखना मेरी फितरत है .........
बरसों मेरे स्वप्न डायरी में कैद रहे
आज में उनको मुक्त करता हूँ ......

Tuesday, December 21, 2010

मेरे जीने का थोड़ा सा, सामान कर दिया...


चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?

महादेवी वर्मा




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मेरे जीने का थोड़ा सा, सामान कर दिया...

उनकी नज़रों ने मुझे फिर से जवाँ कर दिया,

मुझे छू कर मुझ पर, एहसान कर दिया...


कब से बैठी थी मैं, गुमसुम सी यूँ ही,

दिल में मिरे, इक तूफान कर दिया...


मेरा अब कुछ भी रहा नहीं मेरा,

नाम उसके मैंने जिस्म-ओ-जान कर दिया...


उसकी आँखों ने कुछ ऐसे देखा,

हाल-ए-दिल उसको बयान कर दिया...


वादा जब से किया उसने मिलने का,

मेरे जीने का थोड़ा सा, सामान कर दिया...



मानव मेहता


मेरे ब्लॉग ............


Monday, December 20, 2010

बेबसी


ख़ुशी भी दुःख का कारण बनती है
आशीर्वाद भी बोझ बन उठता है
जीना मुझे है या उसे
बहुत बड़ा प्रश्न बनता है
रश्मि प्रभा





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बेबसी
एक दिन एक रोजगार बाप ,
अपने बेरोजगार बेटे की
किसी बात पर खुश हो गया
और अनजाने में अपनी उम्र
उसको लग जाने का ,
आशीर्वाद दे गया
जब उसे कुछ ध्यान आया
तब वह कुछ
सोच कर पछताया
अगर वह अपनी ,
उम्र से पहले मर जायेगा
तब उसका बेटा ,
भूख से मर जायेगा
सुनील कुमार
जन्म : बरेली , उत्तरप्रदेश
प्रकाशन : स्वतंत्र वार्ता, हैदरबाद पल्लव टाइम्स, चेन्नई कादम्बिनी , तथा गृह पत्रिका नाभकीय भारती में
कविताएँ प्रकाशित स्थानीय कवि सम्मेलनों में सक्रीय भागीदारी
सम्प्रति : नाभिकीय इधन समिश्र , हैदराबाद में कार्यरत
साहित्य और समाज सेवा में संलग्न हैदराबाद की संस्था अनुभूति सांस्कृतिक मंच के संस्थापक सदस्य
www.sunilchitranshi.blogspot.com

Sunday, December 19, 2010

प्रिज्म और ब्लैक होल


मैं तो घड़े का पानी हूँ
तेरी प्यास बुझाने को हर दिन भर जाती हूँ
सोंधी सोंधी खुशबू
सोंधे सोंधे स्वाद में डूबा तेरा सोंधा सोंधा चेहरा
इन्द्रधनुषी किरणें ही तो हैं ...

रश्मि प्रभा





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प्रिज्म और ब्लैक होल
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शक्सियत मेरी दुनिया में
किसी सूरज कि मानिंद थी
कि जिसमें आग थी केवल
दहकती,रूह झुलसाती...

तुम आई जो मेरे पास
कोई प्रिज्म हो जैसे ..
मेरे अंतस को सहलाया
तो कितने रंग बिखरे हैं

गुलों को बैगनी रंगत
लहर को नील बक्शा है
फलक है आसमानी सा
धनक धरती पे रखा है

फुलाई पीली सरसों का
हवाओं में घुला है रंग
वो रंगत केसरी सी है
जो बैठी है शफक के संग

हया ने जो चुना है रंग
वो लाली मुझसे बिखरी है
तेरी ही सादगी में घुल
ये रंगत मेरी निखरी है

मगर अब भी मेरी जाना
है दिल में आरज़ू बाकी
कि तुम न प्रिज्म सी होकर
उफक कि ब्लैक होल होती ...

मेरा रौशन हर एक कतरा
फकत तेरे लिए होता ..
मैं बस तुझसे गुजरता
और तेरी आगोश में सोता


रवि शंकर
http://mujhme-tera-hissa.blogspot.com
rsdivinedevil@gmail.cओम
एक आज़ाद रूह जो रवि शंकर नाम के एक ज़िस्मानी ढाँचे में कैद है। यूँ कहने को तो परास्नातक का छात्र हूँ computer applications में और आजीविका से एक web-designer पर साधक सदैव कला का ही रहा हूँ। कलम और कैनवास मेरे मित्र हैं जो मेरी अव्यवस्थित अभिव्यक्तियों को वर्षों से झेलते आ रहे हैं। एक फ़क्कड़ भारतवासी जो वर्तमान में पटना में डेरा डाले बैठा है। अर्जित उपलब्धियाँ नगण्य हैं, बस एक आशाओं और आशीषों कि पोटली रह्ती है साथ ।

Saturday, December 18, 2010

बैचलर पोहा!!!


आपने बनाया होगा बहुत कुछ अपने किचेन में
पर बैचलर पोहा ....
बनाया तो होगा बहुतों ने
पर यह नाम जुबां पे आया न होगा
तो चलते हैं किचेन में
लेते हैं सामग्री
बनाते हैं बैचलर पोहा
और मनाते हैं पिकनिक ---------- बिंदास !
रश्मि प्रभा


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बैचलर पोहा!!!

भाईयों और सहेलियों,
ज़िंदगी की किचेन में मुहब्बत का पकवान फ़िर तैयार है! जी हां, आज हम आपको सिखायेंगे बैचलर पोहा!


इनग्रीडिएंट्स
ब्राऊन ब्रैड (5-6 स्लाईस)
प्याज़ (दो बारीक कटे हुए)
टमाटर (एक चोप्ड)
शिमला मिर्च (दो बारीक कटी हुई)
दही (पांच रुपये की)
करी पत्ता (कुछ नए पत्ते)
उड़द-चने की दाल (थोड़ी सी)
नमक (स्वादानुसार, कम ही रखें,अच्छा है)
देसी घी (एक रमचा/ चमचा)
लाल मिर्च, पिसा हुआ धनिया, हल्दी, गरम मसाला (सभी अंदाज़े से)
सौस, नमकीन और चीनी


बैचलर विधि

बैचलर पोहा बनाने के लिए आपको चाहिए सन्डे की एक उबाऊ दोपहर, मोबाईल पर हेडफोन की मदद से बजते गाने और पेट की आग! अपने शरीर को गुप्ताजी के सन्डे वाले स्पेशल छोले-भठूरे और लस्सी से जनित नींद की खुमारी से आज़ाद कर किचेन का रुख करें! कमरे से निकलने से पहले बुनियादी कपडे पहनना ना भूलें, कहीं आपको किसी की बुरी नज़र ना लगे!
सबसे पहले अपनी पहली सच्ची मुहब्बत को याद करते हुए प्याज़ को बारीक-बारीक काटें. साथ में अगर राहत फ़तेह अली खान साब का 'मैं जहाँ भी रहूँ, तेरी याद साथ है...' कानों में बज रहा हो तो विरह की पूरी फीलिंग आप एन्जॉय कर सकते हैं! आपके आंसूओं से आपके इश्क की मैय्यत को भी तस्सली मिलेगी और प्याज़ का भी मान रह जाएगा! अब अपने बॉस को याद करते हुए ब्राऊन ब्रैड के छोटे-छोटे टुकड़े कर लें! लेकिन याद रहे इन्हें कुत्तों को नहीं खिलाना है, खुद खाना है! ये गाना आपके फोन में नहीं होगा, मन ही मन दोहरायें: 'एक रावण को राम ने मारा, एक रावण को मैं मारूंगा! तेरी लंका आज उजाडूंगा, जय जय श्री राम पुकारूँगा!' आप हल्का फील करेंगे! अब टमाटर और शिमला मिर्च को भी बारीक काट लें! ऐसा करते समय कोई भी गाना काम कर जाएगा, ध्यान रहे के टमाटर गला हुआ ना हो और कैप्सिकम (शिमला मिर्च की संस्कृत) में कीड़ा ना हो!

अब कढ़ाई में थोडा सा देसी घी डाल कर गैस जला दें. घी पिघलने पर इसमें प्याज़ रुपी श्रद्धा-सुमन अर्पित करें. अब इसे अकेला छोड़ कर कूलर में वाटर-लेवल चेक कर आयें. वापिस आने पर शिमला मिर्च भी कढ़ाई में डाल दें. अब जब तक 'तड़प-तड़प के इस दिल से आह निकले', तब तक मंदी आंच पे प्याज़ और कैप्सिकम को घी की सरपरस्ती में इश्क फरमाने दीजिये. प्याज़ के भूरा और कैप्सिकम के अधकचरा (कृपया इसे कूड़े वाले कचरे से ना जोड़ें) होने पर उड़द-चने की दाल डाल दें. दोनों दालों के सुनहरा और करारा होने तक भूनें और फ़िर टमाटर की आहूति दें. ठीक इसी समय इस मिश्रण में करी-पत्ता डाल दें. सही स्वाद और सुगंध के लिए ज़रूरी है के करी-पत्ता माँगा हुआ ना हो. पर आपके बैचलर घोंसले में तो इसका पौधा है ही नहीं! घबराईये नहीं, इसका उपाय भी है हमारे पास. जब सामने वाली खिड़की में कौशल जी की बेटी रूपिका खड़ी हो, ठीक उसी समय उनकी क्यारी में लगे हुए पेड़ से बिना पूछे पूरी टहनी तोड़ लें. पूछना आपकी बैचलर इमेज के अगेंस्ट है! अब इस टहनी को रुपिका की तरफ ऐसे उठाएं मानो सचिन ने एक और शतक ठोक दिया हो! आगे क्या करना है ये रुपिका के रीऐक्शन पर निर्भर करता है!

इसके बाद कढाई में स्वादानुसार (कम हो तो सेहत के लिए बेहतर) नमक,लाल मिर्च, पिसा हुआ धनिया, हल्दी, गरम मसाला आदि डाल दें. अगर एमडीएच का छोले मसाला बचा हुआ है, तो वो भी आप इसमें डाल सकते हैं. अब वक़्त आ गया है दोस्तों के ब्रैड के रूखे-सूखे जीवन में प्रेम की तरलता का आगमन हो. लेकिन ये क्या? आप दही लाना तो भूल ही गए! कोई बात नहीं, टेंशन नहीं लेने का. पास ही के मायाराम हलवाई से पांच रुपये का दही ले आयें. दही को ब्रैड में आधा-अधूरा मिक्स कर दें. अब दही और ब्रैड के अमर-प्रेम को आज़माने के लिए उसे अग्नि-परीक्षा की आंच पर चढ़ा दीजिये! मेरा मतलब, कढ़ाई में!

इस मिली-जुली सरकार को मंदी आंच पर थोड़ी देर तक सिकने दें और फ़िर प्लेट में परोसें. गार्निशिंग के लिए थोड़ी सी सौस, काफी सारी नमकीन (शाही मिक्सचर हो तो क्या बात है!) और ऊँट के मूंह में ज़ीरा के बराबर चीनी प्लेट में चारों तरफ बिखरा दें. बैचलर पोहा तैयार है. सन्डे की एकमात्र अच्छी बात, एचटी मैट्रीमोनियल्स के ऊपर रख कर खाएं. प्लेट को हिला-हिला कर आप अपनी जानकारी में इज़ाफा भी कर सकते हैं! और हां, नुसरत साब को गाने दीजिये: 'मस्त नज़रों से अल्ला, अल्ला बचाए..... हर बला सर पे आ जाए लेकिन, हुस्न वालों से अल्ला बचाए'!!!!!


चलते-चलते डायरी के भीगे पन्नों से कल की बातें:

आज के रंगीं महकते लम्हें
कल तेरा माज़ी बन जायेंगे,
पलट के देखोगी जब इनको तो
हम भी कहीं नज़र आयेंगे!


खुशियाँ बांटते प्यार लुटाते
हम तो हमेशा शाद रहेंगे,
दीद हुई जो आब तुम्हारी
अश्कों में भी मुस्कायेंगे!


कल तेरे आज को रोशन करना
हो तो बेहिचक बताना,
अपना क्या है हम मनमौजी
मुस्तकबिल में चले आयेंगे!


सूरत क्या है एक लम्हा है
कितना रोको बदल जायेगी,
सीरत पर हम आज मरें हैं
सीरत पर कल मिट जायेंगे!


शायर हूँ तुम सबका हिस्सा
मैं बन जाऊं ये लाज़िम है!
मेरा हिस्सा कोई बन जाए
ऐसे दिन कब आयेंगे?
हा हा हा.....


आशीष
http://myexperimentswithloveandlife.blogspot.com/

Friday, December 17, 2010

हमें गर्व है कि हम विकसित हो रहे हैं....


हम सभी विकसित होना चाहते हैं
पर कैसा विकास
किस ढंग से .........
क्या विकास के नाम पर
हम विनाश की ओर अग्रसर नहीं हो रहे ?

रश्मि प्रभा



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हमें गर्व है कि हम विकसित हो रहे हैं.....

विकास के कौटिल्य ने चाहा
कि बेहद ख़ूबसूरत हों फूल
खिलें,
पहले से भी अधिक /
और एक दिन.........
सचमुच, ऐसा हो गया.......
परन्तु कीमत ले ली इसकी.......
चुरा ली सुगंध,
पी गया मकरंद
घोल दिया विष ......सारे उपवन में /
कलियाँ ,
विषकन्या सी खिलकर झूम उठीं
झूम गए हम भी
बन गए विषमानव /
ऑक्सीटोसिन पोषित सब्जियों के साथ
कीटनाशकों से संरक्षित अनाज की रोटी
और पीकर नकली दूध .........
बड़ी निर्ममता से ......नपुंसक बन गए हम भी /
इतने नपुंसक ......
कि खरीदकर खाते हैं विष
और उफ़ तक नहीं करते /
विषाक्त धरती बाँझ होने लगी है......
कैंसर,
आमंत्रित अतिथि बन रहे हैं
और हमें गर्व है .....
कि हम विकसित हो रहे हैं /

कौशलेन्द्र


................यही नाम है मेरा,
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार और राजस्थान में शिक्षा / पेशे से चिकित्सक / रुचि साहित्य में / समस्याओं का समाधान भारतीय संगीत में खोजने का प्रयास /बस इतना ही परिचय है मेरा .....

Thursday, December 16, 2010

काग के भाग बड़े सजनी



किसने ये जाना था , किसे ये खबर थी

आयेंगे ऐसे दिन भी ...

अपने लिखे के बदले भाव पर
रसखान भी रोते नज़र आयेंगे


रश्मि प्रभा




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काग के भाग बड़े सजनी



पितृपक्ष में रसखान रोते हुए मिले। सजनी ने पूछा -‘क्यों रोते हो हे कवि!’
कवि ने कहा:‘ सजनी पितृ पक्ष लग गया है। एक बेसहारा चैनल ने पितृ पक्ष में कौवे की सराहना करते हुए एक पद की पंक्ति गलत सलत उठायी है कि कागा के भाग बड़े, कृश्न के हाथ से रोटी ले गया।’
सजनी ने हंसकर कहा-‘ यह तो तुम्हारी ही कविता का अंश है। जरा तोड़मरोड़कर प्रस्तुत किया है बस। तुम्हें खुश होना चाहिए । तुम तो रो रहे हो।’
कवि ने एक हिचकी लेकर कहा-‘ रोने की ही बात है ,हे सजनी! तोड़मोड़कर पेश करते तो उतनी बुरी बात नहीं है। कहते हैं यह कविता सूरदास ने लिखी है। एक कवि को अपनी कविता दूसरे के नाम से लगी देखकर रोना नहीं आएगा ? इन दिनों बाबरी-रामभूमि की संवेदनशीलता चल रही है। तो क्या जानबूझकर रसखान को खान मानकर वल्लभी सूरदास का नाम लगा दिया है। मनसे की तर्ज पर..?’
खिलखिलाकर हंस पड़ी सजनी-‘ भारतीय राजनीति की मार मध्यकाल तक चली गई कविराज ?’ फिर उसने अपने आंचल से कवि रसखान की आंखों से आंसू पोंछे और ढांढस बंधाने लगी।
दृष्य में अंतरंगता को बढ़ते देख मैं एक शरीफ आदमी की तरह आगे बढ़ गया। मेरे साथ रसखान का कौवा भी कांव कांव करता चला आया। मैंने दो एक बार सातवें दशक की किसी हीरोइन की तर्ज पर ‘और लताजी की आवाज मंे ‘ चल कान न खा’’ कहा भी । पर वह कहां माननेवाला था। पित्पक्ष चल रहा है और वह मेरे किसी पुरखे की भूखी आत्मा की तरह मेरे पीछे मुक्ति के लिए पड़ा था। मगर मुक्ति अगर मिलनी होती तो एक ही पित्पक्ष में मिल जाती , पितृपक्ष बार बार क्यों आता। फिर वही पितृ , फिर वही तर्पणकर्ता ?...फिर वही कौवे...कौवे......!? इतने में फिर एक कौवा आया और मेरे कान के पास आकर जोर से चिल्लाया‘‘कांव कांव !!’’
मैंने झल्लाकर कहा -‘‘क्या है यार! बोर क्यों कर रहे हो। जाओ यहां से। मैं तुम्हे दाना नहीं डालनेवाला। न पूरी , न खीर...हमारे सारे पितृ खा पीकर मरे हैं। सब इतने चलते पुरजे थे कि एक जगह बैठकर नहीं रहते थे। अब तक तो दो तीन बार पैदा होकर स्वर्गीय हो चुके होंगे। जवान होकर किसी पर मर जाने की उनकी बुरी आदत थी। कोई कौवा नहीं बना होगा। क्या बने होंगे यह तुम नहीं समझोगे।’’ इतना कहते हुए मैं अंदर आ गया। दिमाग में मगर बचपन में पढ़ी कविता गूंजने लगी-
आज गई हुति नंद के भौनहि ,भोरहिं ते रसखान बिलोकी
धूर भरे अति सोभित स्यामजु ,तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी
खेलत खात फिरे अंगना ,पग पैंजनिया ,कटि पीरी कछौटी
काग के भाग बड़े सजनी! हरि हाथ सौं लै गयो माखन रोटी।

-अर्थात् एक सखि दूसरी सखि से कहती है कि हे सजनी! आज सुबह सुबह ही मैं नंद महाराज के घर चली गई और वहां मैंने रसखान को देखा। यहां रसखान में श्लेष अलंकार है। रसखान यानी रस की खान ..रस का भंडार। दूसरा अर्थ कवि का नाम ..रसखान..। खैर सजनी! मैंने क्या देखा कि रस-सागर धूल से भरे और सने हुए हैं ,मगर बहुत सुन्दर लग रहे हैं। उनके बड़े बड़े बालों की चोटी भी बड़ी सुन्दर लग रही है। वे खेल-खेल में खा रहे हैं और खा-खा कर खेल रहे हैं। सजनी! मेरा ध्यान उनके पैरों में की पैंजनियां पर है जो बज रही हैं और कमर पर भी है जिसमें पीले रंग की कछौटी यानी हगीज़ बंधी हुई है। हे सखी ! इसी समय वह घटना घटी, जिसका इतना हल्ला हो रहा है। यानी वही कौवे की हरकत...अच्छे भले खेलते हुए कन्हैया के हाथ से वह रोटी छीनकर एक कौवा ले उड़ा ,जिसमें मक्खन लगा हुआ था। रसखान कह रहें कि कौवा बड़भागी है जिसने हरि के हाथ से मक्खन-चुपड़ी रोटी छीन ली।
ठीक कह रहे हैं रसखान। मैं आह भरकर सोच रहा हूं। छीननेवाले बड़े भाग्यशाली होते हैं। बड़े भी और भाग्यशाली भी। मैं तो उस भुच्च संस्कारों का पालतू जीव हूं जिसमें छीनना पाप है। छीननेवालों को अपनी हिस्सा दे देना पुण्य है। ‘देनेवाला हाथ हमेशा ऊपर होता है’, इस आत्मघाती संस्कृति के हम चराग पुरुष हैं। चराग होने के चक्कर में अपना ही घर फूंककर फुटपाथ पर बैठे आल्हा गाते रहते हैं। कबीर भी उकसाते रहते हैं-चलो हमारे साथ। हम कटोरा लेकर उनके पीछे हो लिए।
इधर रसखान खुश हो रहे हैं कि कौआ हरि के हाथ से रोटी ले गया। टीवी में आ रहा है कि कौआ हमारे पूर्वज हैं। शास्त्रों में लिखा है। पंडित ने पहले कहा त्रेता से यह परम्परा चल रही है। किसी ने उसे बताया कि त्रेता के पहले सतयुग होता है , शास्त्रों में लिखा है तो उसने सुधार लिया। कहने लगा ,सतयुग से कौआ हमारे पितर हैं। डार्विन ने शास्त्रों की दुर्गत कर दी। उसने कहा -हम बंदरों से विकसित हुए हैं। बंदर हमारे पितर थे। ले भई ! हम उसके विकासवाद की लाज रखने के लिए कौओं की बजाय बंदरों की औलाद बन गए। हमारी वल्दियत बड़ी साफ्ट किस्म की है। समय पड़ता है तो हम गधे को भी बाप बना लेते हैं। बंदर और कौआ क्या चीज़ है।
फिल्हाल हम पितृपक्ष मना रहे हैं। कौओं को अपना पितर मानकर उन्हें खाना खिला रहे है। एक ही कोआ मुहल्ले के कई घरों में घूम रहा है। शुक्ला , खान , डेनियल ,अरोरा .. वह सबका पितर है। कईयों का आजा दादा है। तभी हम एक दूसरे को भाई कहते हैं और हमारा भाईचारा बना रहता है। हमारी संस्कृति विश्वबंधुत्ववाली है। हमारी दृष्टि की दाद दीजिए। कबूतरों को हम पोस्टमैन बनाते हैं और कौओं से कहते हैं पिताजी ! जाइये ! पूरी दुनिया को हमारा भाई बनाइये ! ये कौअे विदेश भी जाते होंगे। कई एंडरसन ,एनरान , बारबरा , स्वेतलाना वगैरह हमारे पितरों की हींग और फिटकरी लगे बिना हमारे वंशज हो गए हैं। भारत बहुत उदारवादी देश है। मेरा भारत महान है।
कहते हैं -देवता लोग आदमी बनने के लिए तरसते हैं। खासकर भारत का आदमी। पर मेरे पास प्रमाण है कि देवता लोग कौआ बनने के लिए भी तरसते हैं। स्वर्ग के राजा इंद्र का बेटा जयंत कौआ बनकर माता सीता के पास आशीर्वाद लेने आया था। उनके पैर पड़ने आया था। श्री राम गलत समझ गए। उन्होंने गलतफहमी में उसकी एक आंख फोड़ डाली।
उधर कौओं के हाई ब्रीड चीलों ने श्री राम का बड़ा साथ दिया। जटाऊ रावण से भिड़ गया और घायल होकर मर गया। बाद में उसके जुड़वा भाई संपाती ने आकाश में उड़कर देख दिया कि अपहृत माता सीता कहां हैं। बंदर, भालू , गिलहरियां , मगरमच्छ और मच्छर तक को गोस्वामी जी ने रामचरित में मित्रवत्-भूमिकाएं (फ्रेंडली एपीयरेन्स) दी हैं। कौअे को तो ऋषि भुशुण्डि की चरित्र भूमिका दी है। भगवान विष्णु के वाहन-सह-चालक गरुण उनके प्रिय श्रोता हैं।
देखिए , धीरे धीरे कौअे का व्यक्तित्व कैसा खुलते जा रहा है।
मुझे याद है कि आठवीं में मैं संस्कृत का बड़ा मेधावी छात्र था। भार्गव गुरुजी अब नहीं रहे वर्ना वे इसका प्रमाण देते। खैर जाने दीजिए...यही क्या कम है कि एक श्लोक मैंने तब पढ़ा था और वह आज भी याद है। श्लोक है-
काक-चेष्टा, वको-ध्यानं ,श्वान-निद्रा तथैव च ,
अल्पाहारी, गृहत्यागी विद्यार्थीं पंच लक्षणम् ।।

-अर्थात् कौअे जैसी कोशिशें करते रहो कि बार बार भगाए जाने पर भी उड़-उड़कर आओ या जाओ , बगुले जैसा ध्यान करो कि जैसे ही मछली सीमा में आई कि मारा झपट्टा। कुत्ते की नींद यानी सो रहे हैं मगर जरा सी आहट हुई कि लगा ,कहीं ये वो तो नहीं। अल्पाहारी यानी अपने घर में कम खाना और गृहत्यागी यानी अपना घर छोड़कर दूसरों के घर में कम्बाइंड स्टडी करना। ये पांच लक्षण बहुतों के बहुत काम आते रहे हैं। मुझे यह बड़ा व्यावहारिक श्लोक मालूम पड़ता है। एकदम प्रेक्टीकल। दुनिया का खूब अध्ययन करके किसी विद्वान ने यह श्लोक गढ़ा होगा। यहां उल्लेखनीय यह है मित्रों ! कि कौआ अंकल (पुरखे ) इस श्लोक में भी सम्मानपूर्वक फ्र्रंट सीट पर बैठै हैं। श्लोक उन्हीं से शुरू हुआ- ‘काक चेष्टा.......।’
कौआ मीरां बाई को भी प्रिय था। उसपर उन्होंने कविता लिखी। दोहा है-
कागा सब तन खाइयो, मेरा चुन चुन खइयो मास
दो नैना मत खाइयो जामे पिया मिलन की आस।

यहां कागा यानी काक.. कौआ। पहले काक का काका हुआ होगा, बाद में अपभ्रंश के नियम से कागा हो गया होगा। काका पिता के छोटे भाई को कहते हंै। पंजाब में तो बेटे को काका कहते हैं। साई लोग तो बात-बात पर एक दूसरे को काका कहते है। अब तो साई का पर्याय ही काका हो गया है।
कुलमिलाकर ,काका यानी कागा यानी कौआ हमारी सांस्कृतिक पहचान है। गंदी संदी चीजें खाना उसका स्वभाव है। हम उससे सालभर घृणा करते हैं और फिर सोलह दिन उसकी पूजा करते हैं। किसी पक्षी को यह स्थान प्राप्त नहीं है। कोई हमारा पुरखा या पूर्वज नहीं है। बंदर को चिड़ियाघर और तीर्थ स्थलों पर जरूर हम केला और चना देते हैं।
कौआ हमारे प्रेयसियों का प्रिय रासिद है। रासिद यानी रहस्य की बातों को चिट्ठी में लिखनेवाला, पोस्टमैन ,संवदिया। एक गीत है- ‘भोर होते कागा पुकारे काहे राम , कौन परदेसी आएगा मोरे गाम।’
-एक सखी डॉ.रामकुमार से पूछती है कि हाय राम ! सुबह सुबह यह कौआ क्यों चीख रहा है। बताइये न कौन परदेशी हमारे नगर आनेवाला है।’
राम जब जनक-ग्राम पहुंचे थे तो जानकी के कमरे के सामने कई कौअे ऐसे ही चिल्लाए होंगे। तब यह गाना बना। एक दूसरा गाना भी बना। विवाह योग्य कन्या चुपके-चुपके योग्य वर मिल जाने पर अपनी मां को इशारे से बता रही है- माई नी माई , मुंडेर पै मेरे , बोल रहा है कागा
जोगन हो गई तेरी दुलारिन मन जोगी संग लागा।

- इस कविता में थोड़ा कन्फ्यूजन जरूर है कि जोगन हुई तो जोगी से मन लग गया कि जोगी से मन लग गया तो जोगन हो गई। हालांकि ले दे के बात तो एक ही घटित हुई। यानी छोरी का लम्पट जोगी से मन लग गया क्योंकि मुंडेर पर कागा बोल रहा है।
इसीलिए गांव में कौओं को भगाने के लिए बिजूका लगाया जाता है जिसे अन्य शब्दों में कागभगौड़ा भी कहते हैं। कौओं को भगानेवाला झूठमूठ का आदमी। आगे चलकर इसी झूठ से दूसरा किस्सा बना। लोगों में ‘झूठ बोले कौआ काटे ’एक कहावत बन गई। यानी कौअे इस झूठ को समझ गए और आदमियों को काटने लगे।
और भी बहुत सी बातें हैं जो आपसे शेअर करनी है मगर नौकरी में जाने का वक्त हो गया है। देखूं कहीं घरवालों ने सारा खाना इन कौओं को तो नहीं खिला दिया। यह आशंका अभी और दस ग्यारह
दिन रहेगी। फिर निश्चिंतता से लिख सकूंगा कि मैं अकेला कौआ होउंगा जो मजे से पेटभर कर खा सकूंगा और सरकारी कार्यालय में जी भर ऊंघ सकूंगा। तब तक आप भी अपने अपने कौओं को निपटाइये, इस संस्कृत-निष्ठ निवेदन के साथ कि-
काक चंचु मार मार क्षीर में सुहास के ,
फिर अमा शिविर लगाने आ गई खवास के ।

शब्दावली:
काक - कौआ ,
चंचु - चोंच ,
क्षीर - खीर ,
सुहास - हंसी खुशी ,
अमा - अमावस्या,
शिविर - कैंप ,
खवास - खाने की घोर इच्छा। अघोरी।


My Photo
Dr.R.Ramkumar
Chhindwara,Seoni, Rajnandgaon, Bhilai, Nainpur,
शैक्षणिक: प्रारंभिक शिक्षा चौरई ,छिंदवाड़ा , सिवनी में , उच्च शिक्षा राजनांदगांव से। रायपुर , सागर और जबलपुर विश्वविद्यालयों से क्रमशः हिन्दी ,अंगे्रजी और दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधियां। हिन्दी में कबीरपंथी-ग्रंथ ’’ श्रीमद्सत्कबीर महापुराण एवं कबीरपंथी साहित्य परंपरा: एक आलोचनात्क अध्ययन ’’ विषय पर प्रस्तुत शोध-प्रबंध पर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ,जबलपुर द्वारा पी.एच-डी । रचनोद्यम: कविताएं ,कहानियां ,गीत ,ग़ज़ल , नाटक, व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में दखलंदाजी सन 1970 से। नवभारत ( नागपुर ,रायपुर ,जबलपुर ,भोपाल ),नवभारतटाइम्स ,पराग , कादम्बनी ,बच्चों का संसार ,देशबंधु ,सबेरा संकेत ,अमृतसंदेश , आमंत्रण ,नवभास्कर , दैनिकभास्कर ,नई दुनिया , छत्तीसगढ़झलक ,आमचर्चा ,गीतायन ,आरंभ ,आदि में प्रायः सभी विधाओं में लेखन। स्तंभ: तुम्हारा कुत्ता , हाले शहर हवाले शहर ,कालिन्दी अतिकाली ,अवगुन चित न धरो , नीर-क्षीर ,देख री आंखी सुन रे कान , अरे कांच के पर्दे , कुछ गिरियां कुछ बाजियां आदि। पुरस्कार: कविता ,निबंध ,गीत ,नाटक ,अभिनय ,निर्देशन के लिए , अखिल-भारतीय कहानी प्रतियोगिता में दो बार ,इससे ज्यादा भाग नहीं लिया।

Wednesday, December 15, 2010

बादलों से उतरा एक नूर सा जोगी


बड़ी लम्बी, गहरी नदी है..
पार जाना है...तुम्हे भी, मुझे भी...
नाव तुम्हारे पास भी नहीं,
नाव मेरे पास भी नहीं...
जिम्मेदारियों का सामान बहुत है...
बंधू,बनाते हैं एक कागज़ की नाव...
अपने-अपने नाम को उसमे डालते हैं॥
देखें,कहाँ तक लहरें ले जाती हैं...

कहाँ डगमगाती है कागज़ की नाव...
और कहाँ जा कर डूबती है!
निराशा कहाँ है?
किस बात में है?
कागज़ की नाव को तो डूबना ही है...
पर जब तक न डूबे...
देखते-देखते वक़्त तो गुज़र जायेगा...
और जब डूबे...
तो दो नाम एक साथ होंगे....




रश्मि प्रभा





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बादलों से उतरा एक नूर सा जोगी


बात सालों की है
दहलीज पर एक
जोगी आया
उसने मांगे कुछ अक्षर
पहले मैं सोच में पड़ गई
फिर
रब को याद किया और
मैंने दे दिये उसे अक्षर
उसने अक्षरोंकी माला गूंथी
आंखों से चूमी
और मेरी ओर बढ़ा दी
मुझे वो जोगी नहीं
बादलों से उतरा एक नूर सा लगा
मंत्रा के नूर से उजली हुई
वो माला मेरे सामने थी
मैं अडोल सी खड़ी रह गई
और सोचने लगी
कैसे लूं माला को
माला को झोली में लेने से पहले ही
मेरे पांव चल चुके कई काल
काल के चेहरे थे
कुछ अजीब
किसी के हाथ में पत्थर थे
तो किसी के हाथ में फूल
फिर अचानक
मैंने वो माला झोली में ली
और सीने से लगा ली
उपर से पल्ला कर लिया
पल्ले के अंदर बन गया इक संसार
अब कभी कभी पल्ला हटा कर
माला के अक्षरों को कागज पर रखती हूं
कभी उनकी कविता बनती है
तो कभी नज्म
जोगी का फेरा जब लगता है
कागज पर रखे अक्षरों को देखता हैं
मुसकुराता है
कहता है
यही तो मैं चाहता था
इनकी कविता बने
नज्म बने
और बिखर जाएं सारी कायनात में

मनविंदर भिम्बर

http://www।mereaaspaas.blogspot.com/

Tuesday, December 14, 2010

वो कलम...




आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकता
अग्नि नहीं जला सकती
पानी नहीं गला सकता
हवा नहीं सुखा सकती
आत्मा अमर है ... आत्मा एक कलम है , जिसकी नोक भावनाओं की धार पर होती है , कलम ,जो ---शस्त्र को काट सकता है
अग्नि को शांत कर सकता है
निर्मल पानी का स्रोत हो सकता है
वा
हवा
को संगीतमय कर सकता है
रश्मि प्रभा




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वो कलम...

काश ऐसी कलम ईज़ाद हुई होती
जो बस यूँही
चलती रहती बिना रुके
और मन की हर बात
लिख जाती
बिना चुप हुए बीच में...

जिसे सोचना पड़ता
कि, किस बात को लिखना है किस तरह???

वो तो बस
चलती मदमस्त पवन की तरह
और उड़ा ले जाती
इस गम और ख़ामोशी के बादलों को कहीं दूर...
या बहती उस चंचल नदिया की तरह
जो सारे कलरव खुद में समेटती
अग्रसर होती है अपनी मंज़िल की ओर...
और एक दिन,
शांत हो जाती है मिलकर
उस अथाह समुद्र से
जो जाने
कितनों का दुःख,
कितना शोर समेटे हुए है
अपने-आप में...
परन्तु तब भी शांत है...

पर कभी-कभी वो भी उछाल मारता है
लांघ कर अपनी सीमा
जताता है शायद,
कि,
अब उसका भण्डार भर गया है
या
उसकी कलम भी कहीं खो गयी है...
--

POOJA...
http://poojashandilya.blogspot.com/
http://poojanblogs.com/


ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण