
बचपन में मैंने विद्यालय की दीवारों पर पढ़ा था -
'पढ़ते सभी हैं , पर जानते नहीं क्या पढ़ें !'
तो निर्भर है कि हम क्या सीखते हैं...
महज शाब्दिक ज्ञान भी एक तरह का अज्ञान है ,
मोती वही पाता है जो सागर की गहराइयों में जाता है ,
एक घूंट सागर का पानी पीकर 'खारापन' बता देना पूर्णता नहीं !
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निरक्षर इज्जत पाते हें ...
अल्लाह
यह केसी सजा हे
अनपढ़ हें
जो लोग
काले गोरखधंधों से
रूपये कमाते हें ,
रूपये कमाकर
यही लोग
शहर में इज्जत
की जगह
पाते हें ,
पढ़े लिखे
बेचारों का क्या
वोह तो
इन बे पढों के यहाँ
नोकरी लगवाने के लियें
चक्कर लगाते हें ,
यह तो
बेचारे पढ़े लिखे हें
इनके रोज़गार तो बस
किताबों में ही
दफन हो जाते हें ।
अख्तर खान अकेला,
कोटा राजस्थान
http://akhtarkhanakela.blogspot.com/






15 comments:
जिसके पास पैसा है वो इज्ज़त पता है और पढ़े लिखे हो कर लोंग बेरोजगार रह जाते हैं ..सटीक अभिव्यक्ति
यह तो
बेचारे पढ़े लिखे हें
इनके रोज़गार तो बस
किताबों में ही
दफन हो जाते हें ।
यही तो कडवा सच है………………आज पढे लिखे का बस इतना ही महत्त्व रह गया है कि किसी अनपढ के हाथ की कठपुतली बन जाये।
Khan sahab khoob likha, ek nihayat hi kadvi sachhai he is desh ki,
aur ek sharmshar karne wali baat,
lekin kya kare vyavastha hi aisi ban chuki he,
"kya kare ab kuch ajeeb sa nhi agta,
mene halaaton se samjhota kar liya"
shaandar prastuti
ये एक त्रासदी है जिससे पार पाने कि मुहीम चलाने की जरूरत है.आज हम विमुख होते जा रहे हैं और वे मुखर. बेहद सुन्दर सन्देश देती कविता. शिक्षित समाज के पहरुए जाहिल और धन-लोलुप लोग कैसे हो सकते हैं?इसपर विचार जरूरी है.
sachchi baat
Rajeev ne sahi kaha.......:)
waise kavita ek dum sateek hai!!
वाकई विषम चक्र है.
भावपूर्ण रचना और उस पर बहुत अच्छी प्रस्तुति.
अकेला जी की रचना मे आज की व्यवस्था का सच छुपा है। बहुत अच्छी लगी रचना बधाई उन्हें।
कडवा सच....
कहा भी गया है कि पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो भाई किस्मत का खेल ...यह हमारे समाज की सबसे बड़ी बिडंबना है !
बहुत अच्छी रचना, बधाई !
ek dam sahi kaha...
बहुत सटीक रचना...
bahut sahi kaha hai kavita ne ..
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