ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवयित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

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एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Wednesday, September 29, 2010

निरक्षर इज्जत पाते हें ..


बचपन में मैंने विद्यालय की दीवारों पर पढ़ा था -
'पढ़ते सभी हैं , पर जानते नहीं क्या पढ़ें !'
तो निर्भर है कि हम क्या सीखते हैं...
महज शाब्दिक ज्ञान भी एक तरह का अज्ञान है ,
मोती वही पाता है जो सागर की गहराइयों में जाता है ,
एक घूंट सागर का पानी पीकर 'खारापन' बता देना पूर्णता नहीं !
रश्मि प्रभा





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निरक्षर इज्जत पाते हें ...


अल्लाह
यह केसी सजा हे
अनपढ़ हें
जो लोग
काले गोरखधंधों से
रूपये कमाते हें ,
रूपये कमाकर
यही लोग
शहर में इज्जत
की जगह
पाते हें ,
पढ़े लिखे
बेचारों का क्या
वोह तो
इन बे पढों के यहाँ
नोकरी लगवाने के लियें
चक्कर लगाते हें ,
यह तो
बेचारे पढ़े लिखे हें
इनके रोज़गार तो बस
किताबों में ही
दफन हो जाते हें ।

अख्तर खान अकेला,
कोटा राजस्थान
http://akhtarkhanakela.blogspot.com/

15 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जिसके पास पैसा है वो इज्ज़त पता है और पढ़े लिखे हो कर लोंग बेरोजगार रह जाते हैं ..सटीक अभिव्यक्ति

वन्दना said...

यह तो
बेचारे पढ़े लिखे हें
इनके रोज़गार तो बस
किताबों में ही
दफन हो जाते हें ।

यही तो कडवा सच है………………आज पढे लिखे का बस इतना ही महत्त्व रह गया है कि किसी अनपढ के हाथ की कठपुतली बन जाये।

ALOK KHARE said...

Khan sahab khoob likha, ek nihayat hi kadvi sachhai he is desh ki,
aur ek sharmshar karne wali baat,

lekin kya kare vyavastha hi aisi ban chuki he,

"kya kare ab kuch ajeeb sa nhi agta,
mene halaaton se samjhota kar liya"

shaandar prastuti

Rajiv said...

ये एक त्रासदी है जिससे पार पाने कि मुहीम चलाने की जरूरत है.आज हम विमुख होते जा रहे हैं और वे मुखर. बेहद सुन्दर सन्देश देती कविता. शिक्षित समाज के पहरुए जाहिल और धन-लोलुप लोग कैसे हो सकते हैं?इसपर विचार जरूरी है.

kishor kumar khorendra said...

sachchi baat

Mukesh Kumar Sinha said...

Rajeev ne sahi kaha.......:)
waise kavita ek dum sateek hai!!

M VERMA said...

वाकई विषम चक्र है.

Shah Nawaz said...

भावपूर्ण रचना और उस पर बहुत अच्छी प्रस्तुति.

निर्मला कपिला said...

अकेला जी की रचना मे आज की व्यवस्था का सच छुपा है। बहुत अच्छी लगी रचना बधाई उन्हें।

पूर्णिमा said...

कडवा सच....

mala said...

कहा भी गया है कि पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो भाई किस्मत का खेल ...यह हमारे समाज की सबसे बड़ी बिडंबना है !

गीतेश said...

बहुत अच्छी रचना, बधाई !

sakhi with feelings said...

ek dam sahi kaha...

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक रचना...

वाणी गीत said...

bahut sahi kaha hai kavita ne ..

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण