ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवयित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

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परिकल्पना की नयी पहल :वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Friday, September 3, 2010

मुक्ति !


कहते हैं समय ठहरता नहीं , मौसम बदलते हैं , तेवर बदलते हैं , चाँद भी पूर्णता से परे होताहै और अमावस की रात आती है ... यूँ कहें अमावस जीवन का सत्य है, एक अध्यात्म की खोज -जहाँ से ज्ञान मार्ग शुरू होता है . कभी राम, कभी कृष्ण , कभी बुद्ध , कभी साई, कभी श्री ... जो अमावस को प्रकाशमय करते हैं और कहते हैं - समय, मौसम, तेवर , पूरा चाँद सब तुम्हारे भीतर हैं , थोड़ी देर रुको खुद को पहचानो और जानो...........
वटवृक्ष एक ठहराव है, खुद को जानने का, दुनिया को बताने का.......

() रश्मि प्रभा

!!मुक्ति!!


मेरे पास चिट्ठियों का अम्बार था,
आदतन,जिन्हें संभाल कर रखती थी
गाहे-बगाहे उलटते-पुलटते,
समय पाकर लगा-
अधिकाँश इसमें निरर्थक हैं-रद्दी कागजों की ढेर!
फिर.....मैंने उन्हें नदी में डलवा दिया !
मेरे पास कुछेक सालों की लिखी डायरियों का संग्रह था,
फुर्सत में-
पलटते हुए पाया,
उनके पृष्ठों पर आँसुओं के कतरे थे-
बाद में ये कतरे किसी को भिंगो सकते हैं,
ये सोच-मैंने मन को मजबूत किया,
फिर उन्हें भी नदी के हवाले कर दिया!
अब,....मेरे पास कुछ नहीं,
सिर्फ़ एक पोटली बची है-जिंदगी के लंबे सफर की!
यादें, जिसमें भोर की चहचहाती चिडियों का कलरव है!
यादें,जिसमें नदी के मोहक चाल की गुनगुनाहट है!
दिल जीतनेवाली अटपटी बातों की मधुर रागिनी है!
बोझिल क्षणों को छू मंतर करनेवाले कहकहों की गूंज है
जीत-हार और रूठने-मनाने का अनुपम खेल है!
खट्टी-मीठी बातों की फुलझडी है
दिन का मनोरम उजास है,
रात की जादुई निस्तब्धता है,
छोटी-छोटी खुशियों की फुहार में भीगने का उपक्रम है
और कभी न भुलाए जानेवाले दर्द का आख्यान भी है!
ख्याल आता है,
पोटली को बहा देती तो मुक्ति मिल जाती!........
पर अगले ही क्षण हँसी आती है
- मुक्ति शब्द -प्रश्न-चिन्ह बनकर खड़ा हो जाता है,
जिसका जवाब नहीं!!!
तो, जतन से सहेज रखा है -
यादों की इस पोटली को
जिस दिन विदा लूंगी -
यह भी साथ चली जायेगी!


()सरस्वती प्रसाद








28 comments:

वन्दना said...

बेहद खूबसूरत शुरुआत की है ………………लेखकों और पाठकों को ये नया मंच उपलब्ध करवाने के लिये आपके आभारी हैं।
यादों की पोटली मे बहुत कुछ छुपा होता है और उसे जिस ढंग से उजागर किया है वो काबिल-ए-तारीफ़ है।

Pankaj Trivedi said...

"वटवृक्ष" के लिएँ ढेरों सारी बढ़ाई |
इतनी खूबसूरती से सजाया है और बहुत ही भावात्मक अभिव्यक्ति से जूडी कल्पना को साकार करना, ये बहुत ही बड़ी बात है | मैं इतना ही कहूँगा -
"रश्मि प्रभा- वह पारस है, जिसे भी छू जाएँ उसे सोना नहीं मगर खुद उसका ही मूल्य दिखती है, उन्हें आत्मा दर्शन करवाती है|"
अभिनन्दन

गीतेश said...

सचमुच एक और नयी परिकल्पना का साकार रूप है यह वटवृक्ष ,अच्छा लगा इसपर आकर !

पूर्णिमा said...

यह पहल अपने आप में नायाब है,वटवृक्ष के लिए कोटिश: बधाईयाँ

जेन्नी शबनम said...

watwriksh ki parikalpana aur uska saakaar roop bahut sundar laga. safalta ki aasha aur shubhkaamna hai.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत विचार ..वटवृक्ष तले शायद कुछ राहत मिले ...

मुक्ति कविता के भाव बहुत सुन्दर हैं ..हर एक की ज़िंदगी से जुड़े हुए ...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुन्दर शुरुआत है वाकई ..बधाई इस सुन्दर कविता के लिए

ज्योत्स्ना पाण्डेय said...

वटवृक्ष के लिए एक वटवृक्ष सरीखे व्यक्तित्व की रचना!!!
प्रारम्भ ही सुकून देने वाला है, तो आगे आगे देखिये होता क्या है ...
बहुत बहुत बधाई!

कविता भावप्रवण होने के साथ ही सहज ही कह जाती है, मोह को नदी में प्रवाहित कर दिया है, अब मैं मुक्त हूँ ..

अम्मा जी!
प्रणाम के शुभकामनाये....

mala said...

वाकई बहुत सुन्दर शुरुआत है ..

sada said...

तो, जतन से सहेज रखा है -
यादों की इस पोटली को
जिस दिन विदा लूंगी -
यह भी साथ चली जायेगी!

भावमय प्रस्‍तुति, वटवृक्ष्‍ा की शुरूआत बहुत ही गरिमामयी है, आभार के साथ्‍ा बधाई ।

ρяєєтι said...

वाह ...
वटवृक्ष की शुरुवात वटवृक्ष सी अम्मा से ... Ilu Ammaaa...

Arvind Mishra said...

सुन्दर रचना -बट वृक्ष इसलिए स्वागत योग्य है क्योंकि इसकी सभी शखाएं खुद एक बट वृक्ष बन जाती हैं कालांतर में -यह अभियान एक से अनेक बट वृक्षों को जन्म दे -शुभकामनाएं !

Babli said...

बहुत ही सुन्दर रचना! शुरुआत से लेकर अंत तक बहुत अच्छा लगा!

रवीन्द्र प्रभात said...

अरविन्द जी, इस पहल के पीछे यही पवित्र उद्देश्य छिपा है ......आप सभी से अनुरोध है कि आप भी इस पहल का हिस्सा बने, क्योंकि आगे इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की भी योजना है !

Udan Tashtari said...

वटवृक्ष एक ठहराव है, खुद को जानने का, दुनिया को बताने का......

उम्दा पहल!! शुभकामनाएँ.

indu puri said...

तो, जतन से सहेज रखा है -
यादों की इस पोटली को
जिस दिन विदा लूंगी -
यह भी साथ चली जायेगी!
ऐसा कैसे हो सकता है
हमने अपनी अपनी यादों की पोटली को खोला
कभी अकेले में
तो किसी अपने के सामने.
और पोटली से निकला बहुत कुछ हमारे पास आ गया है
वो कोई नही ले जा सकता अपनी यादों की पूरी पोटली अकेले क्योंकि वो उसकी अकेले की अमानत नही होती.
कुछ मात्र नितांत उसका होता है उसमे
तो कुछ सबके होते हैं......
तभी तो हमारे जाने के बाद भी रह जाती है
कई पोटलियाँ यहाँ
सब की अपनी अपनी
पर उनमे होती है हमारी भी यादें.
यादें चंचल युवती सी,
नटखट बालक सी
ठहरे बादल सी होती है
जो कभी अकेले होकर भी ही नही सकते अकेले'
वट वृक्ष फूले फले और हरा भरा रहे और चीर काल तक हमे अपनी ममता की छाँव में बैठाए रखे.

shikha varshney said...

बहुत सुन्दर शुरुआत

Divya said...

Amazing !....Congrats !

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही सार्थक और अच्छी शुरुआत .... वटवृक्ष के रूप में एक मज़बूत छत प्रदान करी है कवि और कविता के विकास के लिए ... बहुत बहुटी बधाई ...

sakhi with feelings said...

बहुत भावपूर्ण उअर विस्तृत दर्शन देती र्काहना..अम्मा जी को नमस्कार
और मोहने वाली रचना के लिए बधाई ...

दीपक 'मशाल' said...

बहुत-बहुत ही बेहतरीन लगी कविता मम्मी जी.. काफी कुछ हर एक सच्चे और संवेदनशील ह्रदय की कहानी है.. है मगर कविता..

वाणी गीत said...

एक अभिनव प्रयास ...
सफल हो... बहुत शुभकामनायें ..!

निर्मला कपिला said...

वट बृक्ष के लिये बहुत बहुत शुभकामनाये
। सरस्वती जी की रचना दिल को छू गयी शायद इन शब्दों मे जीवन जीने की प्रेरना भी है
फुर्सत में-
पलटते हुए पाया,
उनके पृष्ठों पर आँसुओं के कतरे थे-
बाद में ये कतरे किसी को भिंगो सकते हैं,
ये सोच-मैंने मन को मजबूत किया,
फिर उन्हें भी नदी के हवाले कर दिया!
अब,....मेरे पास कुछ नहीं,
बहुत अच्छी लगी रचना बधाई।

kishor kumar khorendra said...

bahut achchha

Suman said...

nice

kase kahun?by kavita. said...

vatvriksh bahut khoobsoorat padav,jindgi ki dhoop chhav ka...badhai.

Mukesh Kumar Sinha said...

Rashmi di aur Prabhat jee ka vatt vriksh jisme amma ne apne pahle post se ashirwad de di.......aur kya chahiye......sayad kabhi ham jaise pattiyan dikh jayen...:) falte fulte hue..!!

subhkamnayen.......vatt vriksha ko..!

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

सरस्वती जी कि इस सुन्दर रचना के साथ आपने वटवृक्ष का आरंभ किया था शायद ... अब वाकई मे आपका वटवृक्ष फ़ैल रहा है ..और और यहाँ आये पथिकों को छाया और विश्राम स्थली दे रहा है...

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण