ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवयित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल
परिकल्पना की नयी पहल :वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Monday, September 27, 2010

हिन्दी - अंग्रेजी का वाक् युद्ध

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा '.... स्वर में , बुलंद स्वर में गाना सहज है .
'हिंदी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा...'
पर शुरुआत होती है A B C D से ...
'तुम्हारा नाम क्या है से अधिक जमता है - WHAT IS YOUR NAME !'
माना , अंग्रेजी कई भाषाओं के बीच कड़ी का काम करती है , पर अपनी मातृभाषा के लिए अजीबोगरीब
प्रश्न , उसके लिए गुहार - कितना दुखद है !

रश्मि प्रभा
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!!हिन्दी - अंग्रेजी का वाक् युद्ध !!

अंग्रेजी ................................
तू हो गयी है आउट ऑफ़ डेट,
मार्केट में तेरा नहीं है कोई रेट
तू जो मुँह से निकल जाए,
लडकी भी नहीं होती सेट
तेरी डिग्री को गले से लगाए,
नौजवान रोते रहते हैं
तुझे लिखने , बोलने वाले,
फटेहाल ही रहते हैं
जिस पल से तू बन जाती है,
किसी कवि या लेखक की आत्मा
उसे बचा नहीं सकता फाकों से,
ईसा, खुदा या परमात्मा
मैं जब मुँह से झड़ती हूँ,
बड़े - बड़े चुप हो जाते हैं
थर - थर कांपती है पुलिस भी,
सारे काम चुटकी में हो जाते हैं
तुझे बोलने वाले लोग,
समाज के लिए बेकवर्ड हैं
मैं लाख दुखों की एक दवा,
तू हर दिल में बसा हुआ दर्द है
मैं नई दुनिया की अभिलाषा,
तू गरीब, गंवार की भाषा
मैं नई संस्कृति का सपना,
तू जीवन की घोर निराशा
ओ गरीब की औरत हिन्दी !
तू चमकीली ओढ़नी पर घटिया सा पैबंद है
तेरे स्कूलों के बच्चे माँ - बाप को भी नापसंद हैं
मैं नई - नई बह रही बयार हूँ
नौजवानों का पहला -पहला प्यार हूँ
मुझ पर कभी चालान नहीं होता
मुझे बोलने वाला भूखा नहीं सोता
मुझमे बसी लडकियां कभी कुंवारी नहीं रहतीं
शादी के बाद भी किसी का रौब नहीं सह्तीं
मुझको लिखने वाले बुकर और नोबेल पाते हैं
तुझे रचने वाले भुखमरी से मर जाते हैं
हिन्दी .........................................
मेरे बच्चे तेरी रोटी भले ही खा लें,
तेरी सभ्यता को गले से लगा लें,
सांस लेने को उन्हें मेरी ही हवा चाहिए
सोने से पहले मेरी ही गोद चाहिए
बेशक सारे संसार में आज,
तेरी ही तूती बोलती है
मार्ग प्रगति के चहुँ ओर,
तू ही खोलती है
पर इतना समझ ले नादाँ,
माँ फिर भी माँ ही होती है
शेफाली पाण्डे

मैं अंग्रेज़ी, अर्थशास्त्र एवं शिक्षा-शास्त्र (एम. एड.) विषयों से स्नातकोत्तर हूँ, लेकिन मेरे प्राण हिंदी में बसते हैं उत्तराखंड के ग्रामीण अंचल के एक सरकारी विद्यालय में कार्यरत, मैं अंग्रेजी की अध्यापिका हूँ मेरा निवास-स्थान हल्द्वानी, ज़िला नैनीताल, उत्तराखंड है अपने आस-पास घटित होने वाली घटनाओं से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती है बचपन में कविताओं से शुरू हुई मेरी लेखन-यात्रा कहानियों, लघुकथाओं इत्यादि से गुज़रते हुए 'व्यंग्य' नामक पड़ाव पर पहुँच चुकी है मेरे व्यंग्य-लेखन से यदि किसी को कोई कष्ट या दुःख पहुंचे तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ....!

10 comments:

ktheLeo said...

दरसल भाषा हमारी मानसिकता को दर्शाती है,जब तक हम इस सोच से निजात नही पायेंगे कि जो ,विदेशी है अच्छा है,बदलाव की सम्भावना कम है।

राजेश उत्‍साही said...

शैफाली तो शिक्षिका हैं वे यह बात अच्‍छी तरह समझती हैं। असल में यह बहस ही बेमानी है। और यह सोचना कि अंग्रेजी विदेशी भाषा यह अपने आप को सदियों पीछे ले जाने जैसा है। असल में हर बच्‍चे की अपनी एक मातृभाषा होती है। यह वह है जो उसके घर में बोली जाती है,उसके परिवेश में बोली जाती है।
वह हिन्‍दी हो सकती है,मराठी हो सकती है ,कन्‍नड़ हो सकती है,तमिल हो सकती है या फिर अंग्रेजी भी हो सकती है। इतना ही नहीं वह कुमांऊनी,गढ़वाली,भोजपुरी,मालवी,बुंदेली,अवधी भी हो सकती है। इस भाषा के परिवेश में जन्‍मा बच्‍चा जब स्‍कूल जाता है तो उसे वहां की औपचारिक भाषा सीखने में समस्‍या आती ही है। वह चाहे अंग्रेजी हो या फिर हिन्‍दी।
मैं यहां कर्नाटक में हूं। यहां के बच्‍चों के लिए हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों ही मुश्किल भाषाएं हैं। उसी तरह मप्र के बच्‍चों के लिए कन्‍नड़ और अंग्रेजी बराबर हैं।
इसलिए सवाल हिन्‍दी का नहीं है पहला सवाल मातृभाषा का है दूसरा सम्‍पर्क भाषा का।
मैं आपको बता दूं कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती है। केवल और केवल हिन्‍दी जानता हूं। पिछले डेढ़ साल से बंगलौर में हूं आजीविका के सिलसिले में। कोई समस्‍या नहीं है।
तो दूसरा सवाल यह भी है कि जो हमें आता है उसका उपयोग करें उसे बढ़ावा दें। नई भाषाएं सीखें। पर उनका उपयोग वहीं करें जहां उनकी जरुरत हो।

राजेश उत्‍साही said...

परिकल्‍पना समूह से यह एक अनुरोध है कि इस ब्‍लाग का नेवीगेशन जरा सरल कर दें। यह लोड होने में बहुत समय लेता है। और डाटाकार्ड पर तो खुलता ही नहीं है।

वन्दना said...

माँ फिर भी माँ ही होती है

सच कहा………………और यही अन्तिम सत्य है। बेहद उम्दा प्रस्तुति।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:):) बहुत बढ़िया वाक युद्ध ...

सुनील गज्जाणी said...

शेफाली जी
नमस्ते !
अच्छा मंथन है , हिंदी , विश्व कि तीसरी सब से ज़यादा बोली जाने वाली भाषा है , मगर विडम्बना ये ही है कि हम ही अपने बछो को हिंदी के बजाय इंग्लिश में बात करने का जोर देते है , जब कि प्रादेशिक बोली वाले हिंदी में ,इक और अपनी मात्र भाषा तो दूसरी और अपनी राष्ट्र भाषा के साथ दुर्व्यवहार कर रहे है दोष किसे दे ? मैं सम्मानिय राजेश जी कि बात से भी सहमत हूँ !
साधुवाद !

जेन्नी शबनम said...

shefali ji,
aapka vyang lekhan sadaiv prabhaavit karta hai. is baar to aapne un sabhi aam logon ki baat likhi hai jo aaj ke parivesh mein angreji ke karan maat khaate hain. sthiti dukhad hai lekin satya hai. achhi lekhni ke liye badhai.

Sadhana Vaid said...

आत्म मंथन के लिये प्रेरित करती एक सार्थक रचना ! अपनी राष्ट्र भाषा का तिरस्कार कर किसी भी भारतीय का सम्मान नहीं बढ़ेगा ! जब हम ही अपनी राष्ट्र भाषा को महत्त्व नहीं देंगे तो क्या विदेशी देंगे ? इस मानसिक दासता से मुक्त होना परम आवश्यक है ! चिंतनीय रचना के लिये बधाई स्वीकार करें !

वाणी गीत said...

माँ फिर भी माँ ही होती है ..अपनी मातृभाषा को सम्मान मिलना ही चाहिए ..
सही कहा ...
शेफाली जी का यहाँ मिलना सुखद है ...!

mala said...

भावपूर्ण चिंतनीय रचना

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण