ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवियित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()
परिकल्पना की नयी पहल :वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Tuesday, January 31, 2012

मैं वहीँ मिलूंगी... उसी नीले कुँए के पास



प्यार के सिरे जहाँ रह जाते हैं
उनको जब भी पाना हो ... वहीँ जाना
जो बचपन के गलियारे में रह जाते हैं
उनको पाने के लिए गुड़िया घर के दरवाज़े खोलना ...


रश्मि प्रभा

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मैं वहीँ मिलूंगी... उसी नीले कुँए के पास

मैं वहीं मिलूंगी
जहाँ हम इमली के बीजों से चौघडी खेला करते थे ..
जहाँ मैं बेर तोडा करती थी और तुम अमरुद की डाल पे बैठ के मुझे देखा करते थे..
जहाँ मैं चम्पक की कहानिया पढ़ के तुम्हे सुनती थी और तुम सुन के ठहाके मारा करते थे...
जहाँ हम बैठ के सोचा करते थे की कंचों में तारे क्यूँ दिखाई देते हैं...
मैं वही मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ मखनू अपनी कटी हुई पतंग के मंझे मांगने आ जाया करता था ..
जहाँ मैं परेता पकड़ा करती थी और तुम पतंग उड़ाया करते थे..
जहाँ काकी तुम्हारी भूगोल की कापी और बेलन ले कर आ जाया करती थी..
जहाँ शाम के कोहरे में हम मुह से धुआं निकाला करते थे..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ हर इतवार को जुलाहे चिलम पिया करते थे..
जहाँ हर मंगल को सरजू पगलिया ढोलक बजाया करती थी..
जहाँ मैं अपनी ओढ़नी और तुम अपनी कमीज़ पे बने फूलों के रंगों को तितलियों के पंखों में ढूँढा करते थे...
जहाँ हरहु साऊ के कबूतर कुँए के चबूतरे पे पड़े गेहूं चुगते थे..

मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ..
मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ एक बार तुम बिना बताये मीना के साथ बेर तोड़ने चले गए थे..
जहाँ मैंने इस बात पे घंटों आँखें सुजायीं थी..
जहाँ तुमने मेरी कापी में गुलमोहर के फूल बनाये थे..
जहाँ सरजू पगलिया ने बड़े लाड से हमें कच्ची कैरियां दी थीं..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ दूर से रेलगाड़ी दिखाई देती थी और हम उसे देख के खुश हो जाया करते थे ..
जहाँ नीले कुँए में झाँक कर हम दोनों एक दूसरे का नाम जोर जोर से पुकारा करते थे ..
जहाँ मैंने तुमसे कहा था अब माँ मुझे सजने सवरने को कहती है..
जहाँ तुमने मुझे पानी वाले रंग से बिंदिया लगायी थी..
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास ...

मैं वहीँ मिलूंगी
जहाँ शायद आज भी उस कुँए की दीवारों में हमारे नाम गूंजते होंगे..
जहाँ आज कोई बूढी पगलिया दिन में अमरुद बेचती होगी
जहाँ इमली के बीज अब पेड़ बन गए होंगे..
जहाँ काकी मखनू के लड़के को हमारी कहानियां सुनती होगी....
मैं वहीँ मिलूंगी
उसी नीले कुँए के पास....

इमली और कंचे लाना न भूलना....


Gargi Mishra

Monday, January 30, 2012

कुछ तो करो लोगों



दोष इसका है या उसका है , इसको बताने से पहले
अपने इस मुल्क के लिए कुछ तो कर जाओ लोगों ...


रश्मि प्रभा


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कुछ तो करो लोगों

अक्सर यहाँ वहां होने वाले दंगों के बाद लगी आग ने ये लिखने पर मजबूर किया मजबूरी इसलिए क्योंकि ऐसी ग़ज़लें खुशी में नहीं लिखी जातीं ।

आग ही आग है हर सिम्त बुझाओ लोगों
जल रहे बस्ती में इन्सान बचाओ लोगों

दुश्मनी खत्म हो और दोस्ती का हाथ बढे
हो सके गर तो ये एहसास जगाओ लोगों

दुश्मनी किस से है क्यों है ये अलग मसला है
नन्हें बच्चों पे तो मत दाओ लगाओ लोगों

टूटी ऐनक है जले बसते हरी चूड़ी है
जाओ बस्ती में ज़रा देख के आओ लोगों

बेखताओं को न मारो यही कहते हैं धरम
जो नहीं जानते ये उन को बताओ लोगों


जब के रावण था मरा , राम ने ये हुक्म दिया
साथ इज्ज़त के रसूमात निभाओ लोगों

दिल है बेचैन 'शेफा' मुल्क की इस हालत पर
अब भी खामोश हैं हम ख़ुद को जगाओ लोगों
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इस्मत जैदी

Sunday, January 29, 2012

नन्ही लौ और इंसान...!



असुर का साम्राज्य कितना भी बड़ा हो
अगर की खुशबू मन को सुकून देती है ...




रश्मि प्रभा

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नन्ही लौ और इंसान...!

अन्धकार भयावह है...
विस्तार लिए हुए है
रौशनी नन्ही सी है...
एक लौ में सिमटी हुई है

पर,
जब दोनों देखे जायेंगे
तब एक दूरी से
वह नन्ही लौ ही नज़र आएगी
और सिमटी हुई नन्ही सी लौ
अन्धकार पर भारी पड़ जायेगी!

देखने वाले को
दीया
बड़ी दूर से ही दिख जाएगा
विस्तृत होता हुआ भी
अन्धकार
नहीं दिख पायेगा

गुण तो
छोटी-छोटी पुड़िया में ही
आता है
और
अवगुणों की पूरी ज़मात पर
भारी पड़ जाता है

ज़िन्दगी
कुछ एक मूल सिद्धांतों पर भी
अगर अडिग रहे
प्रेम-दया-करुणा के भाव
मन में
सजग रहे
फिर,
जो एक
अप्राप्य सा लक्ष्य (?) जान पड़ता है-
इंसान होना!
दुर्लभ ही है
औरों के आँसुओं को
अपनी आँखों से खोना...;
वह स्वतः ही
सहज हो जाएगा
नन्हा दीया जो बन गया मन
वह साक्षात् पुण्यधाम ब्रज हो जाएगा

इंसानियत की बाती के प्रज्वलित होते ही
यह दीये वाला चरित्र
साकार हो जाएगा
देखना यह कलयुग फिर
स्वयं ही सतयुग का
अवतार हो जाएगा!!!




अनुपमा पाठक

Saturday, January 28, 2012

" बरगद –आत्मकथ्य"



अपनी विशालता को पहचानो
कितने पौधे तुमसे ऊष्मा पाते हैं
कितने राहगीर आराम ...
लाभ हानि तो हर रिश्तों में है
तो क्या अपने वजूद से रूठ जाएँ !...




रश्मि प्रभा

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" बरगद –आत्मकथ्य"

एक विस्तृत कानन का वह शहंशाह था ।
अहं था सबका भगवान कहलाने का
लटकी जटाओं में बच्चों का डेरा था ।
कोलाहल आस -पास ,मस्ती घंटों का
चबूतरे पर पंचायत का जमावड़ा था ।
प्रतिद्वंद्वी नहीं ,कोई दूसरा उस परिवेश का
सूखती झाड़ियों और दूब पर रौब था ।
पनप सका न कोई गवाह तात्कालिक इतिहास का
बियाबान के राजा ने तब जाना बांटने में सुख है ।
मोटे तने की बुजुर्गियत सुनती है पीड़ा एकाकी का
उष्णता नस -नस की यूँ ही सूख जाती है ।
अगले जन्म मुझे चंपा बनाना या बबूल काँटों का
दंश अकेलेपन का बरगद बन बहुत झेल लिया है ।
विशाल हो गया रस निचोड़ कर कण -कण का
एकाधिकार नहीं चाहिए ,छोटा होने में भलाई है ।
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कविता विकास

Friday, January 27, 2012

"संतुलन"



एक जीवन से दूसरा जीवन
संतुलन बनाने के लिए बहुत कुछ इधर उधर होता है
ठीक उसी तरह - जैसे किसी के आने पर कमरे की साज सज्जा बदलती है
पर .... स्पर्श और प्यार नहीं बदलता
हर रिश्तों का अपना अर्थ होता है ...


रश्मि प्रभा

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"संतुलन"

अबोध था मै भी कभी,
उंगलियां भी नन्ही रही होंगी जरूर,
पर धीरे धीरे वक्त के साथ,
कब मां की उंगलियां छूटी और,
मेरी नन्ही उंगलियां बड़ी होने लगीं,
याद नही,
वक्त और बीतता गया,
मां ने अपनी पसंद के दो हाथ थमा दिये और,
कहा यह जीवन संगिनी है,
ये नये हाथ ज्यादा रास आये,
सो ज्यादा मजबूती से थाम लिये,
क्रमशः स्वभाविक रूप से,
चार नन्हे हाथ और जुड़ गये,
इसी आपाधापी और जीवन की,
रिले रेस के बहाव में,
मां को लगा शायद,
मैं उनकी उंगलियों का स्पर्श,
कंही भूल गया हूं,
ऐसा कदापि नही हो सकता,
पर हां थोड़ा "संतुलन" बना पाने में,
जरूर विफ़ल रहा हूं,
नई और विरासत की उंगलियों में।
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अमित श्रीवास्तव

Thursday, January 26, 2012

फिर आ गया गणतंत्र दिवस


फिर आ गया
गणतंत्र दिवस
दिखलाने, बतलाने
सुनने-सुनाने
हालात, समस्यायें
उपलब्धियां गिनाने।
देखो… सुनो… पढ़ो… जांचो…
मगर
कुछ कहना मत।
सच!
क्योंकि सच कह दिया तो
गणतंत्र दिवस का अपमान हो जाएगा।
पड़ जाएगी मंद
मधुर ध्वनियां ढोलों की।
खुल जाएंगी गुत्थियां
नेताओं की पोलों की।
अपने ढोलों की पोल खोलना
किसने चाहा
कौन चाहेगा
अपनी खामियां
हर भ्रष्ट यहां छिपायेगा।
इसी छुपा-छुपी में इक दिन
सचमुच गणतंत्र छुप जाएगा।
इसलिए…
सुनो, पढ़ो और देखो
कुछ मत बोलो
एक बार फिर
गणतंत्र दिवस को।



कृष्ण कुमार भारतीय


शोधार्थी, हिन्दी विभाग,कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र,हरियाणा
अनाज मण्डी, कलायत, कैथल (हरियाणा)

Wednesday, January 25, 2012

चाय ...



चाय की मिठास सुबह की अलसाई धूप को मीठा बनाती है
तबीयत अपनी जगह है
पर फीकी पसंद .... चाय को चाय ही रहने दो
दवा न बनाओ ...



रश्मि प्रभा
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चाय

आज शक्कर अधिक हो गयी थी चाय में , बिलकुल सीरा लग रही थी ,चीनी जीभ पे कम होठों पर ज्यादा महसूस हो रही थी ,..सुबह की एक प्याली चाय में शक्कर अधिक मुझे भाई नहीं
मैं सोच रही थी की शक्कर तो मीठी है फिर ज्यादा होने पर भी क्यों अच्छा स्वाद नहीं आ पा रहा..
सही है, चाय में शक्कर का माप सभी के लिए अलग अलग है ..कोई ज्यादा ,कोई कम और कोई बिना शक्कर के ही चाय की चुस्की लेते है .
मुझे बराबर मात्रा ,पसंद है तो वहीँ मेरी कामवाली को दो चम्मच और...
मेरी सहेली तो बिना चीनी के ही पीती है .
यह मिठास तो ज़िन्दगी की मिठास की तरह है..
सो जोड़ दिया आज इस शक्कर का अनुपात ज़िन्दगी में घुली शक्कर से.
किसी किसी को मिठास ज्यादा अच्छी लगती है तो कोई खुश्क जीवन जिए जा रहा है , कहीं शक्कर का अनुपात बिलकुल राशन की दूकान पे चावल तौलते बनिए की तरह -न कम न ज्यादा ,तो कोई अपनी और दुसरे की आवश्यकता के अनुसार शक्कर की मात्रा घटा बढ़ा देता है और कहीं कहीं तो शक्कर के कई पर्याय है..
ज्यादा शक्कर से घुली ज़िन्दगी का अभिप्राय नहीं है ...वो अनावश्यक मिठास है जो मन के बाहर ही रह जाती है ...मिठास वो है जो तन और मन दोनों को छू जाए ..और फिर उसकी एक चुस्की ही सराबोर कर दे..
मिठास अथवा प्यार जीवन में शक्कर ही घोलते हैं ..
आज चाय के प्याले ने एक जीवन में शक्कर के महत्व को दर्शाया ..मेरा मार्गदर्शन हुआ ..
...मैंने अपनी कामवाली को एक कप चाय और बनाने के लिए बोला ,..इस बार शक्कर की मात्रा के बारे में उसे पता था ...

ऋतू

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण