ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं ,करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....

आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में कवयित्री रश्मि प्रभा के साथ .....

()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल
परिकल्पना की नयी पहल :वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

एक ऐसी ई-पत्रिका जिसमें  आप साहित्य ,संस्कृति और सरोकार से एकसाथ रूबरू होते हैं . जहां आपकी सदिच्छा के अनुरूप सामग्रियां मिलती है. जो आपकी सृजनात्कता को पूरे विश्व की सृजनात्मकता से जोड़ने को सदैब प्रतिबद्ध रहती है.              अपनी रचनाएँ इस ई-मेल पर भेजें :

Monday, May 28, 2012

भावनाओ के बंजर में भी फूल खिलते है....



सोचो , कुछ कदम बढ़ाओ
देखो कितनी हरियाली है
कितने लोग पास हैं ....

रश्मि प्रभा

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भावनाओ के बंजर में भी फूल खिलते है....

भावनाओ के बंजर में भी
फूल खिलते है
एक सहरा
तो अपना
बना के देखो!
पंक्तियों की कोंपले
भी फूटेंगी
कुछ शब्द तो
रेत में
बिखरा के देखो!
कविताओ की फसल
भी लहलहाएगी खूब
संवेदनाओं से
उन्हें
सींच कर तो देखो!

कुवंर जी (kunwarji's)

Saturday, May 26, 2012

उसकी खोज



मोह से मोक्ष की यात्रा
कभी प्राप्य कभी अप्राप्य ...

रश्मि प्रभा

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उसकी खोज

वह खोजती है
उन शब्दों का साहचर्य
जहाँ आत्मा के पार का संसार
जीवित होता है,
और बांधता है पूरा आकाश,
वह खोजती है
उन क्षणों का सौन्दर्य
जहाँ शब्दों के बीच का मौन
महाकाव्य रचता है
सरल संस्तुतियों के साथ,
वह खोजती है
उन आत्मीय संबोधनों के स्वर
जहाँ पीड़ा भी संवरती है
निर्वसन निराकार,
वह खोजती है
उस तोष के कुछ सूत्र
जहाँ अथाह एकांत में
किया था उसने
मोक्ष से सहवास

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सुशीला पुरी
''लिख सकूँ तो - प्यार लिखना चाहती हूँ ठीक आदमजात - सी बेखौफ दिखना चाहती हूँ"

Friday, May 25, 2012

एक नदी थी



एक नदी सी लड़की
चपल चंचल ...
गौर करो ,
खुद में त्रिवेणी लिए चलती है
यानि - मुक्ति !

रश्मि प्रभा

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एक नदी थी

वह एक नदी थी
जब तुमसे मिली थी
बहती थी अपनी रौ में
कल-कल करती....कूदती फांदती ...
प्यार की फुहारों से भिगोती
इठलाती थी इतराती थी
चंचल शोख बिजली सी बल खाती थी
पर...
तब तुम्हे कहाँ भाती थी

राह में इसके कंकड़ पत्थर भी तो थे
कुछ सूखे हुए फूल कुछ गली हुई शाखाएं भी तो थी
कुछ अस्थि कलश जो डाले थे किसी ने किसी अपने को मोक्ष प्रदान करने के लिए
कुछ टोने टोटके वाले धागे जो बांधे थे किसीने अपने पाप किसी और के सर मढ़ने के लिए
गठरी बंधी थी कामनाओं की.... वासनाओं की
जो बाँधी थी कुछ अपनों ने... कुछ बेगानों ने
और भी ना जाने क्या क्या था उसके अंतस में
था जो भी .... उसके अंतस में
ऊपर तो थी बस कल कल करती मधुर ध्वनि
तुम्हारी नजरें तो टिकी थी
बस अंतस की गांठो को तलाशने में
उस तलाश में तुमने नहीं देखा
उसकी पवन चंचलता को
क्या क्या नाम दिए तुमने उसकी चपलता को
तुम ढूंढते ही रहे
कि... कोई सिरा मिल जाए कि
बाँध पाओ उसे ...रोक पाओ उसे
और कुछ हद तक बांधा भी तुमने उसे
पर..क्या तुम्हे पता नही था ?
धाराएँ जब आती हैं उफान पर सारे तटबंधों को तोड़ जाती है
और अगर दीवारों में बंध जाती हैं तो नदी कहाँ कहलाती है
नदी का पानी जब ठहर जाता है कीचड़ हो जाता है
क्या तुम्हे पता नहीं था ?
पर जरा ठहरो ....
अपनी दीवारों पर इतना मत मुस्कुराओ
उम्मीद की एक किरण अभी भी बाकी है
कीचड़ में भी फूल खिलाने का हुनर नदी जानती है !!
कभी हार कहाँ मानती है !
नदी हमेशा मुस्कुराती है !


वाणी शर्मा

Thursday, May 24, 2012

मैं सोचती रही....




मैं सोचती रही
शब्‍दों की विरासत 
मिली थी तुम्‍हें 
या आत्‍ममंथन ने की थी रचना 
शब्‍दों की 
जब भी तुम भावनाओं के 
दीप प्रज्‍जवलित करती तो 
उनकी रोशनी से 
जगमगा उठती मंदिर की मूर्तियाँ
ईश वंदना में झुके हुए शीष 
घंटे की ध्‍वनि से 
खुद को तंरगित महसूस करते 
जैसे आशीष बरस रहा हो 
एक अधीर मन की छटपटाहट 
जिसे कहना कठिन था 
बस समझा जा सकता था 
पारखी नज़रों से
यही वरदान मिला था तुम्‍हें भी 
परखने का .. 
..............
मैने देखा है 
तुम्‍हारी आंखों में अपनापन 
बोली में सहजता 
संस्‍कारों की हथेली पर 
अखंड ज्‍योत जलती रहती है संयम की 
तेज हवाओं में भी 
उस लौ की स्थिरता  
तुम्‍हारे बुलंद इरादों का दर्श दिखलाती है
.... 
तम घबराता है 
सत्‍य अडिग रहता है 
भय हार जाता है जब तुम्‍हें डराकर 
ईश्‍वर को भी जब तुम कहती हो
मैं तैयार हूँ हर चुनौती के लिए
सोचो परिस्थितियाँ विचारमग्‍न होकर 
जस की तस 
उचित समय का इन्‍तजार करने लगें जब 
उन लम्‍हों का साक्षी 
कौन होगा सिवाय ईश्‍वर के 
जो देखकर सब 
अपनी मंद मुस्‍कान कायम रखता है 
विजय तो होनी ही थी 
विश्‍वास का बीज़ मंत्र विरासत में जो मिला था ...


सीमा सिंघल 

एक परिचय :
मैं सीमा सिंघल मेरे शब्‍दों में कहूं तो भावनाओं को व्‍यक्‍त करने का माध्‍यम कविता बखूबी करती है, अनुराग…समर्पण … कर्तव्‍य सिखाती हैं सच्‍ची भावनाएं जिसमें विचारों का ओज़ हो संयोजन हो शब्‍दों का वो जुड़ते हैं खुद से आत्‍ममंथन के रूप में बस इसीलिए तो मन को भाता है कविता लिखना …बचपन से ही पसन्‍द है लेखन का यह रूप … कभी आकाशवाणी रीवा से इनका प्रसारण तो कभी पत्र-‍पत्रिकाओ में प्रकाशन के बाद 2009 से ब्‍लॉग जगत में ‘सदा’ के नाम से जुड़ने के साथ सुखद परिणाम यह है कि मेरा प्रथम काव्‍य संग्रह ‘अर्पिता’ आप सब के बीच है ..आनेवाले कविताओं के संकलन अनुगूंज में भी आप पाएंगे मेरी रचनाओं को …. अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूंगी …जन्‍म स्‍थान- रीवा (मध्‍यप्रदेश) शिक्षा एम.ए. (राजनीतिशास्‍त्र) से वर्तमान में एक नि‍जी संस्‍थान में निजसचिव के पद कार्यरत हूं रूचियों में लेखन के अलावा पुराने सिक्‍के संग्रहित करना, पुराने फिल्‍मी गीत सुनने के साथ अमृता प्रीतम जी को पढ़ना अच्‍छा लगता है….. मेरा ई-मेल- sssinghals@gmail.comएवं ब्‍लॉग – http://sadalikhna.blogspot.com/


Wednesday, May 23, 2012

अब वक्त नहीं है , थोडा और रुकने का ......



जो थम गए आज भी
तो विनाश की आखिरी लहर आने को है ...

रश्मि प्रभा


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अब वक्त नहीं है , थोडा और रुकने का ......

मुझे " संत कबीर दासजी " का एक दोहा याद आता है ! " काल करे सो आज कर , आज करे सो अब , पल में परलय होएगी ,बहुरि करेगा कब " किन्तु हम हमेशा यही सोचते हैं ! काश , अगर हम थोड़ा और रुक जाते तो यह मोबाईल हमें और सस्ता मिल जाता , काश , थोड़ा और रुक गए होते तो शायद शादी के लिए लड़का - लड़की और अच्छी मिल जाती और ( साथ में दहेज़ भी ) अक्सर हम लोग इस तरह की बात अपने जीवन में एक -दो बार नहीं कई बार अपनी रोज की दिनचर्या में अपनों के साथ अपने दोस्तों के बीच करते रहते हैं ! कभी कभी लगता है कि , हम शायद सही कह रहे हैं ! 

हमने शायद जल्दबाजी में आकर कोई चीज खरीद्ली या फिर किसी को खरीदते देख या फिर भेड़ चाल में शामिल होकर कोई निर्णय ले लिया हो और जिसके फलस्वरूप हम बाद में अपने किये फैंसले पर पछता रहे हों ! किन्तु हम लोगों ने कभी इस बात पर गहराई से नहीं सोचा है , और बिना सोचे विचारे हम ये बोल देते हैं कि , थोड़ा और रुक जाते तो ये हो जाता या वो हो जाता ! बात ये सही है किन्तु उन लोगों के लिए जो किसी भी चीज , बात या समय का महत्व नहीं जानते ! क्योंकि समय पर किया गया कोई भी कार्य कभी गलत नहीं होता ! क्योंकि हमारे द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय के लिए सिर्फ और सिर्फ हम ही जिम्मेदार होते हैं ! और हर निर्णय को हम बहुत ही सोच समझकर लेते है और सोच समझकर लिए गए निर्णय पर हमें कभी पछताना नहीं चाहिए ! क्योंकि निर्णय वक़्त की मांग पर निर्भर करता है ! जीवन में हर चीज के दो पहलू होते हैं ! पर थोडा सोचना होगा ! 

अगर हम सब वक़्त की मांग पर निर्णय लेने में थोडा रुक जाएँ , तो क्या होगा ? और क्या हो सकता था ? इसका अंदाजा भी हम नहीं लगा सकते ! अगर हम अपने जीवन में थोडा रुक जाते तो कभी भी मंजिल को हांसिल नहीं कर पाते ! थोडा रुक जाते तो शायद हम आज भी अंग्रेंजों की गुलामी में जीवन व्यतीत कर रहे होते ! अगर हम थोडा रुक जाते तो कैसे करते एक सुनहरे भविष्य का निर्माण ! थोडा और रुक जाते तो कैसे देश का नाम हम विश्व में रोशन कर पाते ! ऐसा कुछ भी नहीं होता अगर हम सब थोडा और रुक जाते ! थोड़ा रुक जाते तो कभी ना बनते गौरवशाली इतिहास और ना ही स्वर्णिम भविष्य ! हम जहाँ थे वहीँ रहते ! गुमनाम और दुनिया जहाँ से अनजान ! ना हमारी कोई पहचान होती और ना ही हमारा कोई नाम होता ! अगर हम थोडा रुक जाएँ तो क्या होगा ? शायद हम इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते ! 

आज अगर हम थोडा रुक गए तो यह देश दुश्मनों के हाथों में बिकने में जरा भी वक्त नहीं लगेगा , देश के गद्दार इस देश को बेच देंगे और हम बुत बने सिर्फ देखते रह जायेंगे ! थोडा रुक गए तो धर्म और मजहब के नाम पर हम लोगों को आपस में लड़ाने वाले जीत जायेंगे , अगर थोडा रुक गए तो धर्म - मजहब की खाई और भी गहरी होती जाएगी ! इंसान , इंसानियत भूल जायेगा और हम खड़े होकर सिर्फ देखते रहेंगे और देखते रहेंगे अपनों की बर्बादी अपने संस्कारों का पतन ! थोडा रुक गए तो पूरी तरह ख़त्म हो जायेंगे बचे कुचे इंसानी रिश्ते जो पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में धीरे-धीरे गुम होते जा रहे हैं ! थोडा रुक गए तो कभी हासिल नहीं कर सकेंगे वो बुलंदी जिसकी चाह में , आज हम सब जी रहे हैं ! थोड़ा रुक गए तो भ्रष्टाचारी , घोटालेबाज , बेईमान एक दिन हमारा सौदा कर जायेंगे और हम कुछ ना कर पायेंगे ! क्योंकि अब वक़्त पूरी तरह बदल चुका है और साथ ही हमारे आस-पास का वातावरण !

सच कहता हूँ और आप भी इस बात को मान लीजिये कि , अब वक्त नहीं है थोडा और रुकने का ! अब वक्त आ गया है हिम्मत से आगे बढ़ने का और अपनी मंजिल को हांसिल करने का ! अब वक़्त आ गया है जागने का ना की थोड़ा रुकने का ! तो अब जाग जाओ और आगे बढ़कर इस देश को बचाओ !

अब ना कहना की थोड़ा रुक जाते तो .. क्योंकि हमने अपना सारा जीवन निकाल दिया थोड़ा और थोड़ा और के चक्कर में ! ( रुक जाना नहीं तू कहीं हार के ) ( एक छोटी सी बात )

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संजय कुमार चौरसिया
बचपन से लेकर आज तक जीवन के हर पहलु को बहुत करीब से देखा है मैंने ! आज भी लगा हुआ हूँ " जीवन की आपाधापी " में

Tuesday, May 22, 2012

हँसती हुयी औरत दुखी नहीं होती


औरत दुखी होकर भी दुखी नहीं होती
उम्मीदों का सूरज
उसकी हँसी के पूरब से निकलता है ...

रश्मि प्रभा


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हँसती हुयी औरत दुखी नहीं होती

सुनो, एक कविता लिखो
या यूँ ही कुछ पंक्तियाँ
जिन्हें कविता कहा जा सके
और इसी बहाने याद रखा जाए

लिखो तुम औरतों के बारे में
उनके दुःख-दर्द और परेशानियाँ
उनकी समस्याओं के बारे में
पर उनकी खुशियों के बारे में कभी मत लिखो

उनकी सहनशीलता, उदारता और
ममता के बारे में लिखो
उनके सपनों, आकांक्षाओं और इच्छाओं के बारे में
कभी मत लिखो.

बता दो दुनिया को औरतों के दमन के बारे में
उन पर हुए अत्याचारों को लिखो
दमन से आज़ादी के संघर्ष की गाथा
कभी मत लिखो

लिखो औरतों के आँसुओं के बारे में
उनके सीने में पलने वाली पीड़ा
पर उनकी खुशी के बारे में
कभी मत लिखो

औरत के आँसू ये बताते हैं
कि वो कितनी असहाय है
त्याग और तपस्या की मूर्ति
उसे ये आँसू पी लेने चाहिए

इन दुःख दर्दों को
मान लेना चाहिए अपनी नियति
हँसने के अपने अधिकारों के बारे में
नहीं सोचना चाहिए

कि हँसती है जो औरत खिलखिलाकर
दुखी नहीं होती
इसलिए औरत नहीं होती


आराधना चतुर्वेदी

Monday, May 21, 2012

ऐसा क्यो होता है



नियमों के उल्लंघन में
एक परिचय छुपा रहता है
छोटे छोटे अपराध से ही आरम्भ होता है

रश्मि प्रभा





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ऐसा क्यो होता है

ऐसा क्यो होता है ?
जंहा' फूल तोड़ना मना है '
'लिखा है '
वही पर सबसे ज्यादा फूल तोड़ते है |
जहा' नो पार्किंग 'होती है ,
वंही "विशेष "गाडिया खड़ी होती है |
जहा' धुम्रपान 'वर्जित है ,
वही "सूटेड बूटेड "
धुएं के छल्ले उडाते देखे जाते है |
जहा कचरा फेकाना मना है ,
वही पर
पोलिथिनो में बांधकर कचरा फेकते है
"कैन में पेट्रोल ले जाना मना है ,
वही पेट्रोल पम्प पर धड़ल्ले से
कैन भरी देखि जा सकती है |
हम कौनसी भाषा समझते है ,या की
समझनाही नही चाहते
मन्दिर की शान्ति को सराहते है ,
परन्तु
जूतों कीगंदगी
वहा फैला ही आते है
आप ही बताये
ऐसा क्यों होता है |





शोभना चौरे

वेदना तो हूँ पर संवेदना नहीं, सह तो हूँ पर अनुभूति नहीं, मौजूद तो हूँ पर एहसास नहीं, ज़िन्दगी तो हूँ पर जिंदादिल नहीं, मनुष्य तो हूँ पर मनुष्यता नहीं , विचार तो हूँ पर अभिव्यक्ति नहीं|

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण