ज़िन्दगी के दर्द ह्रदय से निकलकर बन जाते हैं कभी गीत, कभी कहानी, कोई नज़्म, कोई याद ......जो चलते हैं हमारे साथ, ....... वक़्त निकालकर बैठते हैं वटवृक्ष के नीचे , सुनाते हैं अपनी दास्ताँ उसकी छाया में ।

लगाते हैं एक पौधा उम्मीदों की ज़मीन पर और उसकी जड़ों को मजबूती देते हैं, करते हैं भावनाओं का सिंचन उर्वर शब्दों की क्यारी में और हमारी बौद्धिक यात्रा का आरम्भ करते हैं....आप सभी का स्वागत है इस यात्रा में.....


()मुखपृष्ठ ()परिकल्पना () ब्लोगोत्सव ()ब्लॉग परिक्रमा () शब्द सभागार () प्रगतिशील ब्लॉग लेखक संघ () साहित्यांजलि () शब्द शब्द अनमोल ()चौबे जी की चौपाल.......
वटवृक्ष पर आपका स्वागत है , पधारने के लिए धन्यवाद !

Monday, March 25, 2013

गोरी होली खेलन चली......


आयी है रंगो की बहार
गोरी होली खेलन चली

ललिता भी खेले विशाखा भी खेले
संग में खेले नंदलाल...
गोरी होली खेलन चली ।

लाल गुलाल वे मल मल लगावें
होवत होवें लाल लाल...
गोरी होली खेलन चली

रूठी राधिका को श्याम मनावें
प्रेम में हुए हैं निहाल...
गोरी होली खेलन चली

सब रंगों में प्रेम रंग सांचा
लागत जियरा मारै उछाल...
गोरी होली खेलन चली

होली खेलत वे ऐसे मगन भयीं
मनुंआ में रहा न मलाल...
गोरी होली खेलन

तन भी भीग गयो मन भी भीग गयो
भीगा है सोलह शृंगार...
गोरी होली खेलन चली

झ्सको सतावें उसको मनावें
कान्हा की देखो यह चाल...
गोरी होली खेलन चली

कैसे बताऊँ मैं कैसे छुपाऊँ
रंगों ने किया है जो हाल...
गोरी होली खेलन चली

आओ मिल के प्रेम बरसायें
अम्बर तक उड़े गुलाल...
गोरी होली खेलन चली ।
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() रमा द्विवेदी
 जन्म : 01 जुलाई 1953/ स्थान: ग्राम पाटनपुर, जिला हमीरपुर, उत्तर प्रदेश, भारत कुछ प्रमुख कृतियाँ दे दो आकाश काव्य संग्रह, (2005)

Sunday, March 10, 2013

आरम्भ से - अशोक आंद्रे

Sunday, August 28, 2011

अशोक आंद्रे

साकार करने के लिए 
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कविताएँ रास्ता ढूंढती हैं 
पगडंडियों पर चलते हुए 
तब पीछा करती हैं दो आँखें 
उसकी देह पर कुछ निशान टटोलने के लिए. 
एक गंध की पहचान बनाते हुए जाना कि 
गांधारी बनना कितना असंभव होता है 
यह तभी संभव हो पाता है 
जब सौ पुत्रों की बलि देने के लिए 
अपने आँचल को अपने ही पैरों से 
रौंद सकने की ताकत को 
अपनी छाती में दबा सके, 

आँखें तो लगातार पीछा करती रहतीं हैं 
अंधी आस्थाओं के अंबार भी तो पीछा कर रहे हैं 
उसकी काली पट्टी के पीछे 
रास्ता ढूंढती कविताओं को 
उनके क़दमों की आहट भी तो सुनाई नहीं देती 
मात्र वृक्षों के बीच से उठती 
सरसराहट के मध्य आगत की ध्वनियों की टंकार 
सूखे पत्तों के साथ खो जाती हैं अहर्निश 
किसी अभूझ पहेली की तरह 
और गांधारी ठगी-सी हिमालय की चोटी को 
पट्टी के पीछे से निहारने की कोशिश करती है . 

कविताएँ फिर भी रास्ता ढूंढती रहती हैं 
साकार करने के लिए 
उन सपनों को- 
जिसे गांधारी पट्टी के पीछे 
रूंधे गले में दबाए चलती रहती है. 

Monday, March 4, 2013

आरम्भ से - रूपसिंह चंदेल



शनिवार, 8 मार्च 2008


उच्च शिक्षा

उच्च शिक्षा के अवरोधी



रूपसिंह चन्देल
मार्च,८ को महिला दिवस के रूप में मनाया गया. अमेरिका की विदेश मंत्री कोण्डालिसा राइस ने कहा कि भारत के विकास में वहां की महिलाओं का विशेष योगदान है. योगदान तो निश्चित है, लेकिन योगदान करने वाली महिलाओं का प्रतिशत कितना है! क्या कारण है कि महामहिम राष्ट्रपति को यह कहना पड़ता है कि हमारे यहां विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बहुत कम है. केवल विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, प्रबन्धन आदि अनेक क्षेत्रों में यह कमी विचारणीय है. 

आई.आई.एम. में छात्राओं की संख्या दस प्रतिशत के आंकड़े पार नहीं कर पाते. आई.आई..टी आदि संस्थानों की स्थिति भी ऎसी ही है. कारण बहुत स्पष्ट हैं. समाज में अस्सी प्रतिशत लोगों की सोच लड़कियों को लेकर अठारहवीं शताब्दी वाली ही है. किसी प्रकार अधिक से अधिक स्नातक तक शिक्षा दिलाकर विवाह कर देने तक. इसमें एक पहलू विवाह को लेकर उत्पन्न होने वाली स्थितियों से भी जुड़ता है. अधिक शिक्षिता लड़की के लिए कम से कम उतना शिक्षित वर चाहिए ही और शिक्षित लड़कों की कीमत चुका पाने की क्षमता सामान्य आदमी में नहीं होती. अर्थात दहेज-दानव का निरंतर फैलता जबडा़ लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलाने की आकांक्षा रखने वाले अभिभावकों को हतोत्साहित करता है और समाज (जो कि सदैव दकियानूस ही रहा है) की चिन्ता करने वाले लोग अपनी लड़कियों के स्वैच्छिक चयन को बमुश्किल ही स्वीकार कर पाते हैं. हलांकि इस दिशा में स्थितियां बदल रहीं हैं, लेकिन संख्या नगण्य ही है. लड़कियों के उच्च शिक्षित होने के लिए समाज की सोच को बदलने की आवश्यकता है.

हमारे समाज में हजारों इंदिरा नूयी और कल्पना चावला हैं, लेकिन उन्हें अवसर नहीं मिल पा रहे. इसके लिए अभिभावक जितना दोषी हैं, सरकार- व्यवस्था उससे अधिक दोषी हैं. जब उच्च-शिक्षा की बात आती है, राजनीति और अफसरशाही अपने वास्तविक रूप में दिखाए देते हैं. इसका एक ज्वलंत उदाहरण प्रबंधन संस्थानों में होने वाले सरकारी हस्तक्षेप के रूप में सामने आया. दूसरा रूप देखने को तब मिला जब विदेशी विश्वविद्यालयों ने उच्च शिक्षा के लिए भारत में अपने कैंपस स्थापित करने के प्रस्ताव किए, लेकिन राजनीतिक विरोध के कारण सरकार को उनके प्रस्ताव ठुकराने पड़े. आश्चर्यजनक रूप से विरोध करने वाले वे राजनैतिक लोग थे जो प्रगतिशीलता का दावा करते हैं , लेकिन प्रगति पथ पर अवरोध उपस्थित करने में वे ही सबसे आगे थे. यदि विदेशी विश्वविद्यालय अपने कैंपस यहां स्थापित करने में सफल होते तो जिस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए हमारे छात्रों को अमेरिका, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन आदि देशों में जाना पड़ता है वह उन्हें कम शुल्क में अपने ही देश में उपलब्ध हो जाती. कितने अभिभावक हैं जो अपने प्रतिभाशाली बच्चों को विदेश भेज पते हैं ! अर्थाभाव के कारण लाखों प्रतिभाओं को अपनी उच्च शिक्षा की आकांक्षा को दबाना पड़ता है. 

हार्वर्ड और येल जैसे विश्वविद्यालयों के कैंपस खुलने से न केवल लड़कों को लाभ मिलने वाला था बल्कि लड़कियों की दिशा-दशा में भी परिवर्तन होता. आज हमारे देश के अस्सी हजार छात्र अमेरिका और लगभग इतने ही आस्ट्रलिया में पढ़ रहे हैं. कारण जो भी हों, लेकिन विगत कुछ दिनों से वहां हमारे छात्रों को हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि हमारे यहां उच्च-शिक्षण सस्थानों की संख्या उच्च-शिक्षा पाने के आकांक्षी युवाओं के अनुपात में बहुत कम है. ऎसी स्थिति में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैम्पस स्थापित करने से उस कमी की पूर्ति किसी हद तक संभव थी. लेकिन रतनैतिक विरोध और अफसरशाही के चलते वह संभव नहीं हो पाया. एक तथ्य यह भी है कि विरोध करनेवालों के अपने बच्चे उच्च -शिक्षा के लिए अमेरिका आदि देशों में जाते हैं, क्योंकि वे लाखों खर्च करने की क्षमता रखते हैं . 

विरोध करने वाले क्या इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि वे आम आदमी के प्रतिभाशाली बच्चों को, जो अर्थाभाव के कारण में विदेशों पढ़ने नहीं जा सकते, आगे आने से रोकना चाहते हैं और अपने बच्चों के लिए स्थान सुरक्षित रखना चाहते हैं. वास्तविकता यह भी है कि महिला सशक्तिकरण, महिला विकास और उच्च-शिक्षा के नारे अधिक लगाए जाते हैं, कार्यान्वयन कम किया जाता है.उच्च-शिक्षा के प्रति व्यवस्था की उदासीनता का एक उदाहरण और है. वर्षों से अमेरिका का सी.एफ.ए. इन्स्टीट्यूट (Chartered Financial Analyst Institute) भारते में अपनी परीक्षा आयोजित करता आ रहा था. लगभग सात हजार छात्र प्रतिवर्ष इस परीक्षा में बैठते हैं. यह एक अंतराष्ट्रीय स्तर का कोर्स है. लेकिन अवरोधकों ने इसके भारत में आयोजित होने का विरोध किया. यहां के एक विश्विद्यालय ने सी.एफ.ए. के विरुद्ध मुकदमा डाल दिया. 

मुकदमा कोर्ट में और विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए श्रीलंका, नेपाल, सिगांपुर आदि पड़ोसी देशों में परीक्षा देने के लिए भागना पड़ रहा है.विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में कैंपस स्थापित करने का विरोध करने वालों को जानकारी अवश्य होगी कि चीन और मध्य-पूर्व एशिया के देशों ने बिना किसी हिचक के उन्हें अपने देश में कैंपस स्थापित करने की अनुमति दे दी है जबकि चीन को अपना रोल मॉडल मानने वाले अर्थात हर बात के लिए उनकी ओर देखने वाले हमारे राजनेता विरोध कर रहे हैं. वास्तविकता यह है कि चीन आदि ने विश्व-विकास की स्थिति को भलीभांति समझ लिया है, जबकि हमारे यहां के रजनीतिक और अफसर महज षडयंत्रों में जीने के आदी हो गये प्रतीत होते हैं. अतः जब उच्च-शिक्षा के लिए ही अवरोध उत्पन्न किये जा रहे हों तब लड़कियों की उच-शिक्षा के विषय में सोचा जा सकता है.

Friday, March 1, 2013

आरम्भ से - इस्मत ज़ैदी




शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009


ग़ज़ल

http://ismatzaidi.blogspot.in/2009_10_09_archive.html


टीवी पर दिखाई गई बाढ़ की तस्वीरों ने लिखवाई ये ग़ज़ल
अब के कुछ ऐसे यहाँ टूट के बरसा पानी
ले गया साथ में बस्ती भी ये बहता पानी
मेरी आंखों के हर इक ख्वाब ने दम तोड़ दिया
उन की ताबीर को दो लम्हा न ठहरा पानी
चंद बूँदें भी नहीं प्यास बुझाने के लिए
यूँ तो ताहद्दे नज़र सिर्फ़ है बहता पानी
अब जमीं है न ये बिस्तर है कहाँ पर बैठें
हम दरख्तों पे हैं और पैरों को छूता पानी
हर जगह तैरती बचपन की मेरी यादें हैं
मेरा संदूक बहा ले गया बढ़ता पानी
आज सैलाब बहा ले गया जाने क्या क्या
सारी uम्मीद खत्म करके ही उतरा पानी
जब ये उतरा है तो बीमारियाँ फैलाएगा
अब तलक सुनते थे है जान बचाता पानी

जब ये एहसास हुआ ज़ख्म लगा दिल पे शिफा
अब लहू हो गया सस्ता प है महंगा पानी

Thursday, February 28, 2013

आरम्भ से - रश्मि रविज़ा




Friday, January 22, 2010
ब्लॉग जगत एक सम्पूर्ण पत्रिका है या चटपटी ख़बरों वाला अखबार या महज एक सोशल नेटवर्किंग साईट ?

rashmiravija.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html






जब पहली बार ब्लॉग जगत से नाता जुड़ा तो ऐसा लगा जैसे पुरानी पत्रिकाओं की दुनिया में आ गयी हूँ.सब कुछ था यहाँ,कविताएं,कहानियां,गंभीर लेख,सामयिक लेख,खेल ,बच्चों और नारी से जुडी बातें. पर कुछ दिन बाद ऐसा लगने लगा..कि यह उच्चकोटि की एक सम्पूर्ण पत्रिका है या चटपटी ख़बरों से भरा बस एक समाचारपत्र??
और उस समाचार पत्र का भी Page 3 ही सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है जिसमे ब्लॉग जगत के स्टार लोगों की रचनाएं होती है.

कोई भी विवादस्पद लेख हो या किसी विषय पर विवाद हो तो बहुत लोग पढ़ते हैं.पर कोई सृजनात्मक लेख हो तो उसके पाठक बहुत ही कम हैं.जबकि हमारी कामना है कि ब्लॉग के सहारे हिंदी को अच्छा प्रचार और प्रसार मिले.यहाँ ज्यादा लिखने वाले वही हैं जो लोग अच्छे हिंदी साहित्य का मंथन कर चुके हैं.अगर वे लोग भी स्तरीय लेखन को बढ़ावा नहीं देंगे तो आने वाली वो पीढ़ी जो नेट और ब्लॉग के सहारे हिंदी तक पहुंचेगी,उन्हें हिंदी में उच्चकोटि की सामग्री कैसे उपलब्ध होगी?

एक लेखक मित्र ने सलाह दी 'असली लेखन तो पत्रिकाओं में ही हैं." उनकी बातें सही हो सकती हैं पर हम जैसों का क्या, जिन्हें हिंदी पढने लिखने का मौका बस ब्लॉग जगत में ही मिलता है.हिंदी पत्रिकाएं तो देखने को भी नहीं मिलतीं...उसमे शामिल होने का सपना हम कहाँ से देख सकते हैं? मुंबई में किसी भी स्टॉल पर अंग्रेजी, मराठी,गुजरती,मलयालम की पत्रिकाएं भरी मिलेंगी..पर हिंदी की नहीं..."अहा! ज़िन्दगी" माँगने पर वह गुजराती वाली 'अहा ज़िन्दगी' बढा देता है और' वनिता' मांगने पर मलयालम 'वनिता'.जब मैंने अपने पपेर वाले को धमकी दी कि अगर वह ये दोनों पत्रिकाएं नहीं लाकर देगा तो उसे पैसे नहीं मिलेंगे..तब उसने ये दोनों पत्रिकाएं देना शुरू किया.बीच बीच में भूल ही जाता है.दक्षिण भारत के शहरों में और प्रवासी भारतीयों के लिए तो बस ये ब्लॉग जगत ही हिंदी से जुड़े रहने का माध्यम है. अच्छा स्तरीय पढने को वे भी आतुर रहते हैं पर अच्छे लेखन को प्रोत्साहन ही नहीं मिलता.जब एक दो लेख,कविता या कहानी के बाद भी अच्छी प्रतिक्रियाएँ नहीं मिलेंगी तो लेखक यूँ ही हताश हो जाएगा. और आगे लिखने की इच्छा ही नहीं रहेगी.और क्षति होती है,अच्छा पढने की चाह रखने वालों की.

लोग कहते हैं,बलोग्जगत अभी शैशवकाल में है.पर अंग्रेजी में कहते हैं,ना morning shows the day .इसलिए अभी से ही ब्लॉगजगत में उच्च कोटि के लेखन को प्रोत्साहन देना होगा. अगर स्तरीय लेखन की नींव सुदृढ़ नहीं होगी तो हम ब्लॉग के सहारे हिंदी के उज्जवल भविष्य की कामना कैसे कर सकते हैं.??हिंदी सिर्फ बोलचाल की भाषा बन कर रह जायेगी.और इसके लिए क्या प्रयत्न करना है? हमारा बॉलिवुड और अनगिनत टी.वी.चैनल तो यह काम बखूबी अंजाम दे रहें हैं.

यह भी तर्क दिया जाता है, सबकी रुचियाँ अलग होती है...पर अगर अच्छा लेखन परोसा ही नहीं जायेगा तो रुचियाँ विकसित कैसे होंगी?

ब्लॉग जगत एक सोशल नेटवर्किंग साईट जैसा ही लगने लगा है.जिसकी नेटवर्किंग ज्यादा अच्छी है.उसका लिखा,अच्छा-बुरा सब लोग पढ़ते हैं.उसके हर पोस्ट की चर्चा भी होती है और बाकी लोगों को उस पोस्ट के बारे में पता चलता है. अब ये नेटवर्किंग का स्किल सबके पास नहीं होता.सबकी पोस्ट पर कमेन्ट करो सबसे आग्रह करो,अपनी रचनाएं पढने की.और कई लोगों के पास इतना समय भी नहीं होता.कितनी ही अच्छी रचनाएं कहीं किसी कोने में दुबकी पड़ी होती हैं.और किसी की नज़र भी नहीं पड़ती क्यूंकि उनके रचयीताओं के पास इतना वक़्त नहीं होता.

अगर स्तरीय लेखन को हम बढ़ावा नहीं देंगे तो फिर हम लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं कर सकते कि ब्लॉग्गिंग को गंभीरता से लिया जाए.

Wednesday, February 27, 2013

आरम्भ से - शोभना चौरे


 

शोभना चौरे
वेदना तो हूँ पर संवेदना नहीं, सह तो हूँ पर अनुभूति नहीं, मौजूद तो हूँ पर एहसास नहीं, ज़िन्दगी तो हूँ पर जिंदादिल नहीं, मनुष्य तो हूँ पर मनुष्यता नहीं , विचार तो हूँ पर अभिव्यक्ति नहीं


Tuesday, July 29, 2008

बेटियाँ 

उन्होंने एक ही रजाई में
अपने सुख दुःख बाटें है |
वाचलता से नही ,
एक दूसरे की सांसो से
एक ही रजाई में सोना,
उनका आपस में प्यार नही ,
उनकी मजबूरी थी |
क्योकि लड़कियों को हाथ पाँव पसारकर ,
सोने की अनुमति नही थी |
उनके उस घर (जो उनका कभी नही था )में ,
उनके दादा दादी ,पिताजी, चाचा,भाई सबका
बिस्तर पलंग प्रथक होता
सिर्फ़ थकी मांदी माँ और बेटियों का बिस्तर
साँझा होता था |
बिस्तर ही क्यो ?
उनके कपडे भी सांझे होते|

उनकी योग्यता ,उनकी प्रतिभा को
सदेव झिड्किया मिलती |
किनतु उन लड़कियों
ने अपने पूरे परिवार के लिए न जाने
कितने ही व्रत उपवास रखे
उनकी खुशहाली की कामना की |
क्योकि
वे उस परिवार की बेटिया थी.....

Tuesday, February 26, 2013

आरम्भ से - नीरज गोस्वामी





नीरज गोस्वामी
मुम्बई, महाराष्ट्र, India
अपनी जिन्दगी से संतुष्ट,संवेदनशील किंतु हर स्थिति में हास्य देखने की प्रवृत्ति.जीवन के अधिकांश वर्ष जयपुर में गुजारने के बाद फिलहाल भूषण स्टील 
मुंबई में कार्यरत,कल का पता नहीं।लेखन स्वान्त सुखाय के लिए.


Friday, September 21, 2007
जो सुकूं गाँव के मकान में है

वो ना महलों की ऊंची शान में है
जो सुकूं गांव के मकान में है

जब चढ़ा साथ तब ज़माना था
अब अकेला खडा ढलान में है

हम को बस हौसला परखना था
तू चला तीर जो कमान में है

लूटा उसने ही सारी फसलों को
हमने समझा जिसे मचान में है

बोल कर सच हुए हैं शर्मिंदा
क्या करें मर्ज़ खानदान में है

जिसको बाहर है खोजता फिरता
वो ही हीरा तेरी खदान में है

जिक्र तेरा ही हर कहीँ " नीरज"
जब तलक गुड तेरी ज़बान में है

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण